अलविदा मधु मैम

Obituary for Madhu Joshi
फोटो: अशोक पांडे

-अस्मिता साह बजाज

डॉ. मधु जोशी से मेरा प्रथम साक्षात्कार तब हुआ जब मैं डी.एस.बी. परिसर नैनीताल से एम.ए. अंग्रेजी प्रथम वर्ष की प्राइवेट परीक्षा दे रही थी। संयोगवश वे मेरे ही परीक्षा कक्ष में परीक्षा नियंत्रक बनकर आईं। उन पूरे तीन घंटों में वे उत्तर पुस्तिका व प्रश्न पत्र बांटने के कार्य से लेकर समय-समय पर दिशा निर्देश देती हुई पूरी सजगता से अपना कार्य करती रहीं। काम के प्रति ऐसी गम्भीरता कम ही लोगों में नजर आती है। उनकी शालीनता व शिष्टता उसी समय मेरे मन पर एक गहरा प्रभाव छोड़ गई थी।
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फिर जब अच्छे अंकों से उत्तीर्ण होने पर मैंने एम.ए. द्वितीय वर्ष के नियमित पाठ्यक्रम में प्रवेश लेकर परिसर जाना शुरू किया तो उनसे मेल-जोल बढ़ाने का अवसर प्राप्त हुआ। उनकी कक्षा अक्सर दिन की प्रथम कक्षा होती थी और वे वक्त की सख्त पाबंद थी। हालांकि देर से पहुंचने पर वे विद्यार्थी को कुछ न कहतीं पर फिर भी उनकी पैनी नजर स्वयं में ही एक अपराधबोध पैदा कर देती थी।

अंग्रेजी कविताओं की जटिलता कब सरलता में बदल जाती, यह उनके रोचक पढ़ाने के तरीके में पता ही न चलता। शान्त-सी प्रतीत होने वाली कक्षा में जब कभी इक्क-दुक्का विद्यार्थी प्रश्नों के तीर दागता तो मैम की आंखों में चमक भर उठती मानो कह रही हो कि चलो कोई तो इसे रुचि लेकर समझना चाहता है। उनका पाठ्यक्रम हमेशा कॉलेज द्वारा दी गई निर्धारित तारीख पर ही शुरू हो जाता और हमेशा निर्धारित समय से पहले खत्म।

वे नियमबद्ध तरीके से चलती थी पर इसका मतलब यह कतई नहीं था कि उनकी कक्षा में चुप्पी ही बनी रहती। कभी-कभी कई रोयक प्रसंगों पर चर्चा भी छिड़ जाती थी और क्योंकि उनसे ‘डर’ जैसी अनुभूति से हम अनभिज्ञ थे तो कई विद्यार्थी बढ़-चढ़कर अपना वक्तव्य प्रस्तुत करते क्योंकि गलत होने पर डांट खाने या व्यंग्य सुनने का तो सवाल ही नहीं पैदा होता था।
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चाहे मौसम कोई भी करवट लेता, मधु मैम की कक्षा हमेशा समयानुसार होती ही होती थी। मुझे याद है एक बार जब भारी बारिश के चलते कुछ ही छात्र अपनी उपस्थिति कक्षा में दर्ज करा पाए तो कक्षोपरांत मैम ने पुरस्कार स्वरूप सबमें ‘कुक़ीज’ बटवाकर बुझे से माहौल में खुशी भर दी।

वह नियम और सिद्धान्तों की पक्की जरूर थीं परन्तु कट्टर नहीं। एक बार अपनी बेटी की अस्वस्थता के चलते मुझे एक कक्षा से अनुपस्थित होना पड़ा। बाद में जब मैंने उनसे वह कविता फिर समझाने का अनुरोध किया तो उन्होंने थोड़ी हिचकिचाहट के बाद मेरा आग्रह स्वीकार किया। एक अंतराल के बाद उन्होंने स्वयं मुझे बताया कि अनुपस्थित विद्र्यािथयों को दोबारा वही पाठ पढ़ाने के पक्ष में वे कभी न थीं, पर मेरी साहित्य में रुचि, निष्ठा व मेरी अनुपस्थिति का वास्तविक कारण देख उन्हें अपना नियम तोड़ना पड़ा।
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जब मैं सहायक प्राध्यापक (संविदा) के पद पर नियुक्त होकर उनकी सहकर्मी बन अंग्रेजी विभाग में पहुंची तो उन्होंने बड़ी गर्मजोशी से मेरा स्वागत किया। हर सुबह विभाग का पहला दरवाजा मैम के कक्ष का ही खुला मिलता। उन्हीं से ‘गुड र्मािनंग’ कर काम की शुरूआत होती। कभी भी जब कुछ पूछने या समझने के लिए मैम के कक्ष में जाने का अवसर होता तो वे अपना बड़प्पन दिखाते हुए खुद ही प्रश्न का उत्तर ढूंढने के लिए ‘गूगल सर्च’ खोलकर मेरे सिर से सिर जोड़कर बैठ जातीं। अगर कोई स्वयं दे भी देती तो बड़े झिझकते हुए से स्वर में, जैसे कि वह हमें हमारी निरी अज्ञानता से परिचित न होने देना चाहती हो।

परन्तु मुझे अक्सर यह भी प्रतीत होता कि मधु मैम जितनी बाहर से सरल व सहज थीं, अंदर से कुछ जटिलताओं से जूझती रहती। कभी-कभी उनके कक्ष में महफिलों के ठहाके गूंजते तो कभी वे ऐसी शून्य भरी नज़रों से दरवाजे पर आए आगन्तुक को देखतीं कि वह दहलीज़ ना पार कर पाता। अगर किसी दिन वे चहकती सी विभाग के गलियारे में दिखाई देती तो शायद अगले ही दिन आपका अभिनन्दन उनको छू भी न पाता और बीच में ही कहीं खो जाता।

धीरे-धीरे यह तो प्रतीत होने लगा था कि वे अपने काम से सन्तुष्ट नहीं हैं, परन्तु फिर भी जब उन्होंने स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति लेने का ऐलान किया तो सभी पर मानो वज्रपात-सा हो गया। दुर्भाग्यवश मुझसे ही उन्होंने अपना आवेदन पत्र टाइप कराया। उनका यह कदम इतना निर्णायात्मक था कि इसमें संदेह की कोई गुंजाइश न थी। अगर कोई इस फैसले के खिलाफ उन्हें समझाने का प्रयास करता तो वे एक हल्की-सी मुस्कुराहट के साथ बहस में पड़ने से बचकर निकल जातीं। उनके विभाग से चले जाने के कई साल बाद भी हमसे वार्तालाप में अन्य विभागों के शिक्षक उनके जाने के पीछे की गुत्थी सुलझाने का प्रयास करते नज़र आते।

स्वाभिमानी वे इतनी थी कि अगर आपसे कोई चीज़ गलती से मांग भी लेतीं तो अगले ही दिन उसे लौटाना न भूलतीं। अगर आपकी दावत में शरीक होतीं तो उपहार सदा साथ लाती। इसी तरह विभाग में अपनी उपस्थिति के आखिरी दिन उन्होंने स्वयं ही जलपान की व्यवस्था करते हुए अपनी विदाई हंसते-हंसते ली। अब आज जब वे संसार से ही बिना शोर शराबे के रुखसत हो चुकी हैं तो चाहे हम इस दर्दनाक वास्तविकता का सामना करने के लिए अक्षम ही क्यों न माने, पर इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि मधु मैम अब बस यही कैद होकर रह गयी हैं, हमारी और आपकी स्मृतियों में।
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