सम्पादकीय – अक्टूबर-दिसंबर 2017

संजय लीला भंसाली की फिल्म पद्मावती के बहाने एक बार फिर स्त्री के प्रति अपनी संकीर्ण मानसिकता का देशवासियों ने खुले आम प्रदर्शन किया है। यद्यपि इसमें एक ओर यह बहस भी चल रही है कि पद्मिनी की कहानी ऐतिहासिक नहीं है। मध्यकालीन सूफी कवि मलिक मुहम्मद जायसी ने अपने महाकाव्य पद्मावत में लोककथाओं का आधार लेते हुए इसे रचा है। इतिहास अलाउद्दीन खिलजी और रानी पद्मिनी के परस्पर प्रसंगों से अनभिज्ञ है पर इतिहास हो या कल्पना या लोक की थाती, पद्मावती ने लोगों के भीतर छुपे दुराग्रह उजागर कर दिये हैं।

जौहर की प्रथा तो निश्चित ही अस्तित्व में थी। वैसे ही जैसे सती प्रथा थी। पति की मृत्यु के बाद उसकी जलती चिता में पत्नी को जिन्दा जला देना, यह मनुष्यता के लिए गौरव की बात किस पहलू से सिद्ध हो सकती है, हमें नहीं पता। पति की मृत्यु के बाद समाज एक स्त्री को सम्पत्ति के अधिकार से च्युत करके, सांसारिक सुखों से उसे वंचित करते हुए, दूसरों के लिए सुलभ भोग्या बना कर उसकी मृतक जैसी स्थिति बना देता है और इस सबका हवाला देते हुए उसे मानसिक रूप से तैयार कर देता है कि वह पति की चिता में जीवित ही जल जाये और बाकी का समाज उसकी मूर्ति स्थापित कर सती मैया की पूजा करता रहे। आज राजपूत महिलाएँ अगर कहती हैं कि हम तो बचपन से ही सती मैया के चौरे में मत्था टेकते हुए बड़े हुए हैं, हम उनका अपमान सहन नहीं कर सकते तो ऐसी महिलाओं की मुक्ति कहीं नहीं है।

सती यदि एक महिला को जबरन जिन्दा जलाना है तो जौहर सामूहिक जीवनदाह है। यह जो स्वेच्छा की बात कही जाती है, यह तो भरी जाती है उनके भीतर, वैसे ही जैसे आज भरी जा रही है।

आखिर क्यों करती थीं स्त्रियां जौहर? उनकी देह को दुश्मन हाथ न लगाये, न छुए, इसीलिए। उन्हीं स्त्रियों के पति अगर युद्ध में विजेता की भूमिका में हों तो वे भी विजित जातियों की स्त्रियों के साथ वैसा ही बर्बर व्यवहार तो करेंगे। मध्यकाल में ही क्यों जायें, आज भी दुनिया भर में जहाँ युद्ध हो रहे हैं, स्त्रियाँ बर्बरता का शिकार बनती जा रही हैं। अपने महान भारत देश के वीर पुरुषों का ही सन्दर्भ लें तो बांगलादेश और श्रीलंका में इन्होंने क्या किया? देश विभाजन की दास्तान दोहरायी जाये तो स्त्रियों को शिकार बनाकर बदला लेने की एक से एक कहानियाँ मिल जायेंगी। तो स्त्रियों को चाहिए कि पुरुषों का शिकार बनने से पहले ही वे सामूहिक आत्मदाह कर लें। कम से कम आने वाली पीढ़ियाँ सम्मान तो देंगी।

स्त्री देह को पवित्रता, मर्यादा का प्रतीक बनाकर, दुनिया से छुपाकर, बचाकर रखने की कोशिशों ने उसे इतना कमजोर बना दिया है कि इक्कीसवीं सदी में भी निर्भया जैसी घटनाएँ होने पर चारों ओर से सुरक्षा-सुरक्षा की पुकार उठने लगती है। सुरक्षा तो पूरे समाज को चाहिए। स्वास्थ्य भी चाहिए। स्वस्थ स्त्री-पुरुष जो शारीरिक रूप से ही नहीं मानसिक रूप से भी स्वस्थ हों। जो मनुष्य हों, भेड़िए नहीं।
(Editorial October-December 2017)

लेकिन जिस तरह पद्मावती का प्रसंग उछाला जा रहा है, हर माध्यम से अन्धाधुन्ध प्रचार के जरिये, भड़काऊ भाषा और हिंसा की धमकियों के द्वारा, उस माहौल में पुरुष भेड़िये बन जाते हैं और स्त्रियाँ सम्मोहित होकर उनके जाल में फँस कर असुरक्षित हो जाती हैं। यह एक आहत करने वाला प्रश्न है कि स्त्रियों को अपने ही आस-पास मौजूद हमलावरों से सुरक्षा क्यों चाहिए? जबकि मध्यकाल में अपने राज्य विस्तार का आकांक्षी वह हमलावर दूर दिल्ली का सुल्तान था। आज तो बिना युद्घ और बिना आक्रान्ताओं के स्त्रियों की सुरक्षा की बात उछाली जाती है।

तेरहवी या चौदहवीं शताब्दी की नायिका पद्मिनी के सम्मान की चिन्ता में आज की नायिका दीपिका की नाक कटाने की धमकी देकर क्या ये लोग स्त्री के गौरव को बढ़ा रहे हैं?

अगर आजकल बनने वाली अधिकांश हिन्दी फिल्मों को देखा जाय तो स्त्री का सम्मान तो हर जगह टूटता है। पुरुष पात्रों की भड़कीली भाषा, इशारे, करतूतें, और उन पर निसार होती स्त्रियाँ, भड़कीले श्रंगार में लिपटी हुई, स्त्रियों के प्रति क्रूर व्यवहार करती हुई और प्रशंसित होती हुई, इन बातों से भरपूर फिल्में स्त्रियों के आत्मसममान को नीचे ही गिरा रही हैं पर जो लोग आज पद्मावती के बहाने शोर गुल कर रहे हैं, वे उन्हीं फिल्मों से भरपूर आनन्द उठाते हैं। और उन्हीं बातों को आदर्श रूप में स्थापित-प्रचारित करना चाहते हैं। औरतों को वे अपनी मिल्कियत समझते हैं। इन्दौर के भाजपा के विधायक  का यह कहना कि जिनके घर की औरतें हर रोज शौहर बदलती हैं, वे जौहर की महिमा क्या जानें, यही सूचित करता है। वे घर-परिवार की इज्जत के रूप में औरत को देखते हैं लेकिन उनकी नजर में औरत का अपना सम्मान, अपना अस्तित्व कुछ महत्व नहीं रखता। पुरुष जब औरतें बदलते हैं तो यह उनके पौरुष का बड़प्पन हो जाता है। इससे भी औरतें ही छोटी सिद्ध होती हैं लेकिन जब औरतें पुरुष बदलती हैं तब भी वे ही बदचलन सिद्ध की जाती हैं। यह आश्चर्यजनक है कि लोकतंत्र के ये रक्षक अपने घर की औरतों की इज्जत की बात करते हुए  दूसरी औरतों की इज्जत की बात एकदम ही भूल जाते हैं। राजपूत या ब्राह्मण स्त्रियाँ, वैश्य या दलित स्त्रियाँ, आदिवासी या जनजातीय स्त्रियाँ, हिन्दू-मुस्लिम या ईसाई स्त्रियाँ- यह बाँटने की नीति स्त्रियों को उनके अधिकारों से वंचित करने की साजिश है ताकि वे एक स्त्री के रूप में, एक इन्सान के रूप में अपनी गरिमा को न पहचानें और एक होकर संघर्ष न कर सकें।

सच तो यह है कि स्त्री के सम्मान की परिभाषा बदलनी पड़ेगी और स्वीकार करनी पड़ेगी। प्रेम को भी प्रेम की तरह देखना होगा।

यह सब कहने का आशय यह नहीं है कि पद्मावती को लेकर खड़ा किया गया वितंडावाद केवल एक स्त्री-प्रश्न है। यह दक्षिणपंथी विचारधारा जन्य काण्ड है, राजनीति से प्ररित है, चुनावों की पृष्ठभूमि में हो रहा है, अभिव्यक्ति की आजादी पर बढ़ता जा रहा संकट है, इससे कोई इन्कार नहीं। यह पानसारे, दाभोलकर, कलबुर्गी और गौरी लंकेश की हत्या की अगली कड़ी है। इसके खिलाफ खड़े होकर हम सबको बोलना होगा, लड़ना होगा। लेकिन स्त्रियों को कब तक इस तरह मोहरा बनाया जाता रहेगा। कब वे इसके खिलाफ खुद खड़ी हाकर बोलेंगी।
(Editorial October-December 2017)

उत्तरा के फेसबुक पेज को लाइक करें : Uttara Mahila Patrika