उत्तरा का कहना है

महामारी के इस दौर में सारा विश्व तकलीफ में है और विषम परिस्थितियों से जूझ रहा है। ऐसे में कभी तो लगता है, सब कुछ खत्म हो रहा है। कोविड से होने वाली मौतें, इलाज के लिए तड़पते मरीज, भटकते परिजन, श्मशान में र्अिथयों की कतारें, नदियों में बहती लाशें, रोजी-रोटी से महरूम होते लोग। अवसाद का गहरा समन्दर है। आपसी रिश्तों में सहानुभूति बांटने में लोग अक्षम हैं। अपने ही घरों में कैद लोग अपने निकट सम्बन्धी, परिजनों के साथ दुख नहीं बांट पा रहे हैं। बीमार के प्रति हमदर्दी शक और अपने बचाव की चिंता में तब्दील हो गई है। इससे भी घोर निराशा की बात यह है कि व्यवस्था से लोगों का विश्वास उठ रहा है। इस त्रासद समय में देश के कुछ राज्यों में हुए विधानसभा और निकाय चुनाव और कुम्भ जैसे आयोजनों ने बहुत सारे प्रश्न खड़े किए हैं- यदि किसी आपात स्थिति में मध्यावधि चुनाव कराये जा सकते हैं तो क्या इस समय ये चुनाव टाले नहीं जा सकते थे ? समय से पहले कुम्भ के आयोजन की हड़बड़ी क्यों थी? जनता के प्रति क्या हमारी चुनी हुई सरकार की कोई जवाबदेही नहीं बनती? जबकि जनता का एक-एक व्यक्ति सत्ता की निगाहों के घेरे में है।

 पश्चिम बंगाल में चुनाव आयोग ने आठ चरणों में चुनाव कराये जो किसी विधान सभा चुनाव के इतिहास में सबसे लम्बे चले। जब मार्च से देश में कोविड के केस बढ़ने लगे थे तब देश के प्रधानमंत्री और गृहमंत्री मरती हुई जनता के प्रति अपनी जिम्मेदारी दिखाने की जगह अपनी पार्टी के प्रचार को अपना यानी देश के प्रतिनिधियों का (देश के भरोसे को तोड़ते हुए) समय दे रहे थे। कोरोना की विभीषिका के बीच चरमराती स्वास्थ्य सेवायें चुनाव प्रक्रिया को संक्षिप्त कराये जाने की मांग कर रही थीं। न्यायालय भी निर्देश दे रहे थे लेकिन सर्वोच्च पदों पर आसीन जनप्रतिनिधि केवल सत्ता पर काबिज रहने की कोशिश में अपनी ताकत चुनाव प्रचार में झोंक रहे थे। अंतिम चरण के चुनाव में बंगाल में हिंसा भी देखने को मिली। जिसे ‘खेला होबे’ का नाम देकर भुनाने की कोशिश की गई। चुवाव प्रचार में भ्रष्ट राजनीति का चेहरा खुलकर सामने आया। राजनेताओं के भाषण प्रतिपक्ष की छीछालेदारी करते नजर आये। वे जनता और जनपक्षधारिता की नहीं, अपने महिमामंडन और दूसरे की अयोग्यता, कमजोरी, भ्रष्टाचार के मुद्दों में उलझे रहे। राज्य के आर्थिक संसाधनों और मशीनरी के साथ-साथ मानव संसाधन यानी जनता का भी दुरुपयोग हुआ। बड़ी-बड़ी चुनावी रैलियों में बिना किसी सुरक्षा के जनता को झोंक दिया गया। ऐसा नहीं है कि किसी को चिंता नहीं थी। लोग सवाल उठा रहे थे, अपील कर रहे थे, कोर्ट जा रहे थे। चुनाव प्रक्रिया पर अदालतों ने भी कई बार सवाल उठाये और दिशा-निर्देश जारी किए, जिन्हें लगातार अनसुना किया गया। सत्ता के मद और सत्त्ता पर काबिज होने की लालसा ने आम जनता के हित को कहीं पीछे छोड़ दिया।

     पश्चिम बंगाल के चुनाव परिणाम ऊपरी तौर पर भाजपा के बढ़ते वर्चस्व को तोड़ते नजर आये और जनाधार पर विश्वास बनता दिखा, लेकिन वास्तविकता अलग है। ममता बनर्जी ने एक कद्दावर नेता की छवि बनाई है। अगर थोडा पीछे जाकर देखें तो कांग्रेस से अलग होकर तृणमूल कांग्रेस के गठन के बाद वह 2011 में सत्ता में आने के बाद से अपना वर्चस्व बनाये रखने में सफल रही हैं। वह लगातार तीसरी बार पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता में आई हैं लेकिन भाजपा ने भी इन 10 वर्षों में राज्य में 80 सीटों के साथ मुख्य विपक्षी दल के रूप में अपनी छवि बनाई है। कांगे्रस और वाम दल हाशिये पर आ गये हैं। यह भी भूलने की बात नहीं है कि भाजपा ने तृणमूल कांग्रेस का हाथ पकड़कर ही बंगाल में अपनी पैठ बनाई थी। लेकिन इन सात सालों में भाजपा का जो जनविरोधी और कहा जाय तो देशविरोधी चरित्र सामने आया है, उसके कारण पश्चिम बंगाल में पूरा छल-बल आजमाने के बाद भारतीय जनता पार्टी को जो पराजय मिली, उससे इस देश के तरक्कीपसन्द लोगों को उम्मीद की किरण दिखने लगी है। इस बात को समझते हुए भी कि ममता बनर्जी की जीत से कोई क्रान्ति नहीं होने वाली है। ममता बनर्जी अपने ढंग से बंगाल को चलाती रहेंगी। लेकिन भाजपा की जीत से जो तात्कालिक निराशा पैदा होती, वह नहीं हुई।
(Editorial)

     पिछले वर्ष अमरीका में हुए राष्ट्रपति चुनावों में डोनाल्ड ट्रम्प को अपनी सत्ता गंवानी पड़ी थी, जिसे बडे़ परिवर्तन के रूप में भी देखा गया और शासकीय असफलता के भी। ट्रम्प ने भी आसानी से अपनी हार स्वीकार नहीं की चाहे वह सार्वजनिक बयान हों या अदालत का दरवाजा खटखटाना। दलों में आपसी झगड़े, अराजक स्थितियां और हिंसा का माहौल पैदा किया गया। बंगाल के चुनाव में भी यही कहानी दोहराई गई।

     मौजूदा समय में राजनीति केवल अपनी सत्ता बनाये रखने के प्रयासों तक सीमित हो गई है। योजना आयोग नीति आयोग में बदल गया है। यहीं से योजनाओं की जगह नीतियों ने ले ली है। हमारे पास योजनायें ही नहीं हैं। शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार जैसे बुनियादी मुद्दे एकदम हाशिये में चले गये हैं। सरकारें अनुदान योजनाओं के आधार पर अपना जनाधार बना रही हैं। पश्चिम बंगाल में ममता की जीत के पीछे एक बडा कारण माना जा रहा है- विवाह पूर्व एवं विवाह के समय लड़कियों कोे दिया जाने वाला अनुदान हो या बेरोजगारी भत्ता, अल्पसंख्यकों तथा दलितों को स्कॉलरशिप, बुजुर्गों-विधवाओं को पेंशन, किसानों को मुआवजा, मृत्यु पर भी आर्थिक सहायता मुहैया कराना आदि। किसी भी अवसर पर सीधे-सीधे भुगतान किया गया। महिला कल्याण योजनाओं में सीधे महिला को नकदी भुगतान ने महिलाओं के वोट दिलाये। स्थानीयता का भी आग्रह था। भाजपा की हिन्दुत्व की अस्मिता के बर-अक्स बांग्ला अस्मिता का सवाल भी मौजूद रहा।

देश में फैली महामारी से बिगड़ते हालात देखकर हर कोई जान रहा था कि चुनाव निपटते ही लॉकडाउन लगा दिया जायेगा, वही हुआ भी। चुनाव के अलावा कुम्भ का आयोजन भी भीड़ बढ़ाने और उसमें दी गई छूट से संक्रमण फैलाने वाला सिद्घ हुआ। आम जनता के साथ-साथ साधु-संत, ड्यूटी में तैनात पुलिसकर्मी, डॉक्टर तथा प्रशासन से जुड़े लोग इससे प्रभावित हुए। उत्तर प्रदेश में चुनाव ड्यूटी के दौरान संक्रमित अध्यापकों की मौतों पर आज भी राजनीति चल रही है। जहां दुनिया के कई देशों में कोविड-महामारी से निपटने में असमर्थ होने पर स्वास्थ्य मंत्रियों को अपने पद से हटना पड़ा, हमारे देश में केरल में बहुत अच्छा काम करने पर स्वास्थ्य मंत्री शैलजा को हटा दिया गया।

नेतागण इस महामारी को दैवी आपदा का दर्जा देने लगे हैं। अन्धविश्वासों से घिरी हुई जनता निराशा के कगार में पहुॅँच कर टोने-टुटकों का सहारा लेने लगी है। हाल ही में कोयम्बटूर में कोरोना देवी के नाम से एक मंदिर बन गया है जिसमें काले पत्थर से बनी मूर्ति की स्थापना की गई है। 150 साल पहले जब प्लेग का प्रकोप चल रहा था तब यहाँ मरियम्मा देवी का मंदिर बना था, जहाँ लोग आज भी पूजा करते हैं। अर्थात् हम आज भी वहीं हैं, जहां 150 साल पहले थे। इससे भ्रष्ट होती व्यवस्थाओं पर लगा प्रश्नचिह्न और भी बड़ा हो जाता है कि व्यवस्था से पैदा टूटन की जवाबदेही कहाँ और किससे मांगी जाय?

यह भी आज के दिन एक बड़ा सच है कि चुनावी रैलियों और कुम्भ के घमासान में रमे हुए नेताओं के पास दिल्ली की सीमाओं में छह महीने से घर-बार छोड़कर आये हुए, जाड़ा-गर्मी-बरसात झेल रहे इस देश के अन्नदाता किसानों तक जाकर उनकी बात सुनने का वक्त नहीं है। सच पूछें तो जनता की उन्हें परवाह ही नहीं। चाहे वह आन्दोलन करती हुई मरे, चाहे महामारी से। आज जरूरत है कि किसान आन्दोलन संविधान को बचाने का, नागरिकता संशोधन विधेयक को वापस कराने का, मजदूरों के हक बचाने का, देश को बेचने, देश की संस्थाओं को निजी हाथों में जाने से रोकने, अन्धविश्वासों-रूढ़ियों का खण्डन कर वैज्ञानिक चेतना का विकास करने का आन्दोलन बने। देश को जिन स्थितियों में आज पहुंचा दिया गया है, हमारा हर कदम देश को बचाने के लिए उठना है। क्योंकि किसान मूल है हमारे जीवन का और यह देशव्यापी आन्दोलन बनता जा रहा है। कोरोना महामारी ने हमें एक बार फिर प्रकृति की ओर लौटने के लिए, गाँवों की ओर लौटने के लिए प्रेरित किया है। शायद यही मानवता को बचाने का भी रास्ता हो।
(Editorial)

श्रद्धांजलि

इस बीच कोरोना महामारी ने देश के कई नागरिकों, साहित्यकारों, लेखकों, बुद्धिजीवियों, वैज्ञानिकों, डॉक्टरों, फिल्मकारों, कलाकारों, संगीतकारों, बच्चों व बुजुर्गों को हमसे छीन लिया है। शुरूआत से उत्तरा के सहयोगी व सदस्य रहे, जीवन सिंह मेहता, मथुरा दत्त मठपाल, शेरसिंह बिष्ट, तारादत्त पाण्डे ‘अधीर’, सुन्दरलाल बहुगुणा, दिवाकर भट्ट, राजेन्द्र उपाध्याय भी अब हमारे बीच नहीं है। प्रेमा मेहता, माया जोशी, खड्ग सिंह वल्दिया, रघुवीर चंद भी इस बीच दिवंगत हुए। सभी के प्रति उत्तरा परिवार की हार्दिक श्रद्धांजलि।
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