‘उत्तरा’ से जुड़े मेरे अनुभव

Article by Basanti Pathak
-बसन्ती पाठक

1984 का नशा नहीं रोजगार दो आन्दोलन एक ऐतिहासिक आन्दोलन था। इसने शराब से बर्बाद हो रहे समाज की बदहाली को उजागर किया और राष्ट्रीय स्तर पर महत्व हासिल किया। इस आन्दोलन के दौर में जुलूस, धरने प्रदर्शन हमारी रोजमर्रा की जिन्दगी का हिस्सा बन गए। इसलिए जब आन्दोलन में ठहराव आया तो एक बेचैनी होने लगी। उस समय हम लोग समाज में कोई सार्थक भूमिका निभाने को निरंतर आतुर थे। (Article by Basanti Pathak)

हमारे बीच लगातार यह बात आ रही थी कि हमें महिलाओं के लिए एक ऐसी पत्रिका निकालनी चाहिए जो उनके मुद्दों को केन्द्र में रखे। क्योंकि महिलाओं के मुद्दों को अन्य पत्र-पत्रिकाओं में जगह नहीं के बराबर मिलती थी और पहाड़ की महिलाओं के मुद्दों को तो कहीं जगह नहीं मिलती थी। सामान्यत: महिलाओं के लिए पत्र-पत्रिकाओं में जो सामग्री आती वह बुनाई करना, अचार बनाना या एक अच्छी गृहिणी बनने के तौर तरीकों पर केन्द्रित होती। यह ठीक है कि अगर कोई घर बसाता है तो पुरुष को अच्छा गृहस्थ और महिला को अच्छी गृहिणी होना ही चाहिए पर महिलाओं के कष्टों, उनकी अपनी खास समस्याओं, तकलीफों, उनके संघर्षों पर कोई गंभीर बात बहुत कम या नाममात्र को होती। उन दिनों दिल्ली से ‘मानुषी’ नामक पत्रिका निकलती थी, जो महिलाओं के मुद्दों पर आधारित थी। इसने हमें बहुत प्रेरित किया। इस विचार  मंथन  के दौर में गिर्दा, शेखर पाठक, राजीव लोचन साह आदि से भी प्रारंभ से ही बातचीत होती रही।

सबसे पहले तो हम ने अपने आप में ही यह स्पष्ट होना था कि ‘उत्तरा’  निकालने के पीछे हमारा उद्देश्य क्या है। सामग्री कैसी होगी, कौन हमारे पाठक होंगे। हमारे लिए यह जरूरी था कि हमारी पत्रिका  ग्रामीण महिलाओं तक पहुंचे तो यह भी आवश्यक था कि वहां पर जो भी अच्छी बुरी घटनाएं घट रही हैं, उन्हें पत्रिका में आना चाहिए। इस सब पर हमें आगे काम करना था। यह भी मन  में था  कि पत्रिका को उत्तराखंड की महिलाओं पर केन्द्रित तो किया जाय पर इसके साथ ही देश-दुनिया की महत्वपूर्ण  घटनाएं भी अवश्य आयें। क्योंकि यह साफ होने लगा था कि पत्रिका को निकालने के पीछे हमारा उद्देश्य महिलाओं में जागरूकता पैदा करना है और इस तरह की पत्रिका को अपनी आमदनी के लिए विज्ञापनों पर भरोसा करना ठीक नहीं क्योंकि विज्ञापन हासिल करने के लिए पत्रिका का स्वरुप उस समय चलने वाली पत्रिकाओं सरिता, मुक्ता, गृहशोभा जैसी ही बनाना होगा जो हमारे लिए अस्वीकार्य था, इसलिए हमें मित्रों और सहयोगियों के भरोसे ही पत्रिका निकालनी होगी, यह स्पष्ट होता जा रहा था।

‘नशा नहीं रोजगार दो’ आन्दोलन के दौर में हमें महिलाओं से सम्बन्धित कुछ घटनाओं पर काम करने का मौका मिला और इस आन्दोलन से पूर्व  यानी 1983 में ‘जागर’ जो एक सांस्कृतिक संगठन था और  गिर्दा के संरक्षण में बना था के तहत हमने नाटक, जनगीत आदि के माध्यम से शराब के मुद्दे को लेकर  भवाली से श्रीनगर( गढ़वाल) तक एक दस दिवसीय पदयात्रा की जिसका मुख्य उद्देश्य गांव-गांव जाकर नशे की हालत के बारे में जानना इसमें भी मुख्य रूप से महिलाओं से वहां के हालात के बारे में जानना था। तब मैं बी.ए. प्रथम वर्ष में पढ़ती थी। नशे के तंत्र के बारे में ज्यादा नहीं जानती थी। लेकिन ये मालूम था अगर  पहाड़ को किसी ने सबसे ज्यादा  बर्बाद किया तो वह शराब है। इस यात्रा में महिलाओं से इस सम्बन्ध में अलग-अलग अनुभव  मिले।  तब मुझे बहुत गहराई  से महसूस हुआ कि महिलाओं की दिक्कतें अलग तरीके की  होती हैं लेकिन उन्हें अनदेखा किया जाता है। यह भी लगा कि इन समस्याओं को समस्या ही नहीं माना जाता। यहीं से महिलाओं की समस्याओं को देखने का नजरिया बदला और  मुझे ‘उत्तरा’ के शुरूआती सफर से जुड़ना और अर्थवान लगने लगा।
(Article by Basanti Pathak)

इसलिए नैनीताल में जब एक महिला को उसके पति द्वारा जला दिए जाने की खबर आई तो हमने सोचा क्यों न इस पर तत्काल कार्रवाई शुरू की जाए। कानूनी पेचीदगियों को हम नहीं जानते थे इसलिए तत्काल घर से झोले में एक बड़ा सा टेप रिकार्डर डाल कर पीड़िता के सामने रखा और कहा, अब बता तेरे साथ क्या हुआ। तुझे हम न्याय दिलाएंगे। वह धीरे-धीरे पूरा विवरण बताने लगी। उसका बयान पूरा होने के बाद हमें लग रहा था कि हमने एक बड़ा केस हल कर दिया। हम तीनों -प्रदीप तिवारी, महेश और मैं गिर्दा के कमरे में गये। जब हम इस घटना के बारे में बताने लगे तो वे बहुत ध्यान से सुन रहे थे। गिर्दा बीच में कभी टोकते नहीं थे। पूरी बात सुनने के बाद उन्होंने बहुत धैर्य से कहा, चलो तुमने एक काम कर लिया है। लेकिन यह बयान उस पीड़िता को न्याय दिलाने के लिए काफी नहीं है। इससे अपराधी को सजा नहीं हो पायेगी। बयान की लीगल वैल्यू तभी मानी जाएगी जब मजिस्ट्रेट  की मौजूदगी में बयान होंगे। अगले दिन ए.डी.एम. की मौजूदगी में उसके बयान लिये गये। तब प्रशासन से काम लेना आज से  ज्यादा  सहज था। ये अनुभव बाद में  बाद में हमारे  काम आये।

खैर पत्रिका के लिए जहां एक ओर  सहयोगियों से आर्थिक पक्ष और प्रकाशन के लिए चर्चा चल रही थी। एक मुख्य काम रजिस्ट्रेशन करवाना था।  यह काम दिल्ली से होना था। आज की तरह इन्टरनेट  नहीं था कि आनलाइन काम हो जाए। पत्रिका के लिए आठ नाम तय किये गये। सावित्री कैड़ा और मैं दोनों दिल्ली को रवाना हुए। वहां उस समय जनता दल के सांसद डॉ. महेन्द्र पाल के घर में हम पांच छ: दिन रहे। दिल्ली हम दूसरी दफा जा रहे थे, मन में बहुत दहशत थी कि कहीं कोई जो थोड़ा बहुत  पैसे हमें टिकट और नाश्ते-पानी के वास्ते मिले हैं, कहीं चोरी न हो जायेंं। हम एक दूसरे से बातचीत भी नहीं कर रहे थे। डर के मारे हमारे हाल खराब थे। शाम के पांच बजे पाल साहब के घर पहुंचे। वहां नेताओं को देखकर अन्दर जाने में संकोच हुआ, इसलिए थोड़ी देर में अन्दर जायेंगे, इसी इन्तजार में बाहर ही बैठ गये। बाहर भयंकर गर्मी हो रही थी, पसीने से लथपथ पसीना पोंछ रहे थे, थकान के मारे उब रहे थे। नैनीताल से चले तो आये थे रजिस्ट्रेशन करवाने पर अब सोच रहे थे क्यों ये मुसीबत खुद मोल ले बैठे। ़हम  कुछ समझ नहीं पा रहे थे। नेताओं की आवत-जावत लगातार जारी थी, इसी बीच पाल जी के घर में काम करने वाला एक लड़का  जो हल्द्वानी से था, बाहर आया, थोड़ी बातचीत की हाल पूछा और हमें अन्दर ले गया। वहां जाकर प्राण में प्राण आये। थोड़ी गर्मी से राहत मिली। शाम को पाल जी भी आ गये। अगले दिन  हमें अपने काम करने निकलना था। किस बस से जाना होगा, कहाँ जाना होगा, यह जानकारी हमने हासिल की और खाना खाकर जल्दी सो गए। अगले दिन लगभग दस बजे रजिस्ट्रेशन आफिस गये  पत्रिका पर बात हुई। बाबू लोगों ने विस्तार से पूछा और कहा कि पांच छ: दिन लग जायेंगे। बीच  में दो तीन बार  हम रजिस्ट्रेशन अफिस यह सोच कर जाते रहे कि ये लोग कल को यह बहाना न बनाएं कि आप लोग तो आये ही। नही एक दिन तो हम दिनभर उस अफिस में बैठे रहे ताकि थोड़ा दबाव उन पर बने। यह संकोच तो उनके मन में था ही कि इन लड़कियों से कैसे घूस मांगी जाय इसलिए वे काम को लटका कर हमें परेशान करने लगे। अफिस के बाबू लोग अपनी आपसी बातों  में हम पर तंज करते हुए कहते, ओहो, तो अब लड़कियां पंजीकरण करवाएंगी, महिलाओं की पत्रिका निकालेंगी। इस पर भी हम अपने चेहरे पर बिल्कुल घबराहट नहीं लाते। हमने खुद से  कहा ये पत्रिका तो हम ही चलाने वाले हैं, और कोई क्यों हमारा रजिस्ट्रेशन करवायेगा। हालांकि उनमें से एक ऐसे भी व्यक्ति थे जिन्होंने हमारा हौसला बढ़ाया।

महानगर की भागादौड़ी से हम पहली बार दो चार हुए थे। अन्तत: हम रजिस्ट्रेशन करवाने में सफल हुए। पत्रिका का नाम उत्तरा सबको पसन्द आया लेकिन एक बात जो मन में कुछ दिन तक खटकती रही, वह थी पत्रिका के नाम के साथ  महिला पत्रिका शब्द का जुड़ जाना, हम चाहते थे महिला पत्रिका का ठप्पा न लगे लेकिन उनका कहना था, यह सम्भव नही है। छ: सात दिन बाद हम बहुत खुश होकर लौटे। ‘उत्तरा’ का एक बहुत बड़ा काम हो गया। आर्थिक सहयोग भी साथियों की मदद से धीरे धीरे होने लगा। अब पत्रिका का लेखन कार्य शुरू होना था। कुछ लोगों से लिखने के लिए भी कहा गया। साथ ही यह भी तय हुआ कि हम सब को भी कुछ कुछ लिखना शुरू करना चाहिए मैं और कमला पंत क्या लिखा जाय, इस असमंजस में थे। जब हम पहले पहल लिखने बैठे तो  विषय क्या था यह तो अच्छे से याद नहीं है लेकिन हमने बहुत सारे पन्ने फाड़े, यह अच्छे से याद है। आखिर में लेख तैयार हो ही गया। उस दिन की खुशी अपार थी।
(Article by Basanti Pathak)

लेखन के साथ यह भी तय करना था कि पत्रिका का साईज और छपाई कैसी हो। पत्रिका की प्रिंटिंग आज की तरह आसान नहीं थी। अन्त मे मेरठ से छपना तय हुआ, वहां हमारे मामाजी रहते थे। उन्होंने  इसमें काफी मदद की। किस प्रेस से छपेगी, ये उन्हीं की मदद से हो पाया। ओम प्रिंटिंग प्रेस मेरठ से इसका प्रकाशन शुरू हुआ और ये गजब का संयोग था कि प्रेस के मालिक जिन्हें हम पंडितज्जी कहते थे, की दो लडकियां सहयोग करती और ‘उत्तरा’ की प्रेस लाइन होती ‘ओम प्रिंटिंग प्रेस मेरठ में मधुबाला और राजबाला  के सहयोग से प्रकाशित’। पंडितज्जी से हमारे पारिवारिक रिश्ते बन गए और जब मेरे बेटे का नामकरण था तो पंडितज्जी उपहार और आशीर्वाद लेकर आये।

पहले पहल प्रूफ रीडिंग बड़ी कठिन लगी। प्रूफ रीडिंग कई बार होती ताकि गलतियाँ न हों। उत्तरा के पहले अंक का मुखपृष्ठ यशोधर मठपाल जी द्वारा बनाया गया जो बहुत आकर्षक लगा। डमी लेकर उमा जी और मैं मेरठ गये। करीब हफ्ते भर बाद पत्रिका छप कर आ गयी। पहली पत्रिका को देखकर कितना अच्छा लगा, यह शब्दों में बयां करना कठिन है। पहली बार में कितनी प्रतियां छपीं, मुझे ठीक से याद नहीं है। अब इसे पाठकों तक पहुंचाने की व्यवस्था करनी थी। संसाधन बहुत कम थे, इसलिए आफिसों में जाकर हमने टाईप किये हुए रद्दी के कागज मांगने शुरू किये जिससे हम पत्रिका रैप कर भेज सकें। पते हाथ से लिखे गए। एक अंक के जाने के साथ ही दूसरी के लिए सामग्री जुटाने की तैयारी शुरू हो गई।

हमें अब बाहर जाकर रिपोर्टिंग का कार्य शुरू करना था। हमने सबसे पहली ग्राउंड  रिपोर्टिंग भौनडांडा, जो पौड़ी जिले से लगता हुआ अल्मोड़ा जिले का अन्तिम गांव था, से की थी। वहां के ग्राम प्रधान का पत्र आया था कि हमारे गांव की दो महिलाएं गायब हो गई हैं। दोनों मां-बेटी थीं। विधवा मां और जवान बेटी कई दिनों  से लापता हैं। बहुत खोजने के बाद भी कहीं नहीं मिलीं। ये दोनों अपनी गुजर-बसर जैसे तैसे कर रही थी। आप लोग इस मामले में हमारी मदद करें। इस मामले को समझने के लिए ताकि इस आधार पर प्रशासन से बात की जा सके और इसकी रिपोर्ट ‘उत्तरा’ में छपे, कमला पन्त और मेरा वहां जाना तय हुआ। उन दिनों कमला पन्त हल्द्वानी ही ज्यादा रहती थीं। जाने से पहले हमने इलाके के बारे में जानकारी हासिल की। शराब आन्दोलन के दौर में कई इलाकों के लोगों से हमारा संपर्क हुआ था इसलिए जानकारी मिलने में ज्यादा समय नहीं लगा। उन दिनों इस तरह के मामले बहुत कम हुआ करते थे इस कारण यह केस अपने आप में सनसनी फैलाने वाला था।

हम हल्द्वानी होते हुए रामनगर पहुंचे और वहां से हमने मर्चुला के लिए के लिए जीप ली। उसके बाद पैदल भौनडांडा जाना था। यह जगह मर्चुला से लगभग सात-आठ किलोमीटर दूर थी। लगभग ग्यारह बजे मर्चुला से रवाना हुए एक चाय की दुकान में बैठकर चाय पीने के बहाने लोगों से गांव का हाल जानने के लिए पूछताछ  शुरू की। लोग एक-दूसरे का मुंह ताकने लगे और एक-दो तो बीड़ी सुलगाते हुए वहां से चलते बने। कुछ लोगों ने हमसे कहा आतंक का जैसा माहौल है। आप दो महिलाएं ऐसा जोखिम वाला काम क्यों कर रही हैं। लोगों ने यह भी बताया कि पहले तो इस इलाके में कभी ऐसा हुआ ही नहीं। अब बहू बेटियां भी सुरक्षित नहीं हैं। आजकल मौसम खासा गर्म था और हमें 3 किलोमीटर की चढ़ाई चढ़नी थी। अक्टूबर  की तेज धूप में हम लोग पैदल चल पड़े। छोटे बड़े साल के पेड़ और लाल मिट्टीवाले इस सुनसान क्षेत्र में तीन किलोमीटर की चढ़ाई के बाद थोड़ी घबराहट कम हुई। मर्चुला से लेकर कुछ किलोमीटर तक अजीब सा माहौल था। कभी लगता कोई हमारा पीछा कर रहा है हम दोपहर लगभग ढाई बजे एक कच्ची सड़क में पहुंचे। अब इस सड़क ही सड़क पैदल चलना था बैग में एक छोटी सी पानी की बोतल, नींबू के अचार के टुकड़े  और चार पराठे थे। क्योंकि पहले ही हमें बता दिया गया था रास्ते में कुछ भी नहीं मिलेगा।
(Article by Basanti Pathak)

रास्ता कच्चा होने के कारण हवा में उडती धूल चेहरे पर लग रही थी जो बहुत परेशान करने वाली थी। लगभग दो किलोमीटर चलने के बाद हमें एक ऊंची जगह से बच्चों के बोलने की आवाज सुनाई दी। उस उदास से माहौल में  हमें उन आवाजों ने एक मधुर एहसास कराया। डर का माहौल एक ही पल में समाप्त हो गया। हमने यह भी सोचा कि पीने का पानी भी मिल जायेगा। इस उम्मीद से हम आगे बढ़ने लगे। स्कूल लगभग एक किलोमीटर की दूरी पर था। गांव भी नजदीक ही होगा, ऐसा अनुमान हमने लगाया। छुट्टी से पहले ही हम स्कूल में पहुंचे गये थोड़ी देर सुस्ताने के बाद हमने पानी मांगा तो थोड़ा पानी हमें मिला। हमने यहां बैठ कर पानी, नमक और अचार के चंद टुकड़ों के साथ दो-दो पराठे खाये।

लगभग 6 बजे हम भौंनडांडा पहुंचे। वहां के लोगों को हमारे आने की सूचना मिल गई थी। सबसे पहले गांव के प्रधान जी जिन्होंने ने हमें पत्र भेजा था, के घर गए। हमें वही रुकना था। चाय पीकर वे हमें कुन्ती और विमला का घर दिखाने ले गए। माँ का नाम कुंती और बेटी का विमला था। घर की कई चीजें ऐसे ही टूटी थीं। जैसे कि चप्पलें, घास बांधने की रस्सी, बर्तन वगैरा। घर में खूब बड़ा चाख था जो बड़े कायदे से लाल मिट्टी से लीपा गया था। उसे देख कर लग रहा था कि मां-बेटी बहुत अच्छे से रहती थीं। उन लोगों का भी यही कहना था। घर का पूरा हाल देखकर हम वापस पधान जी के घर आ गये और यहीं  रात को खाना खाकर गाँव के और भी  लोग बैठने आ गये इस घटनाक्रम से गांव में डर और सनसनी का माहौल था, महिलाओं से भी  हुई बात हुई वे भी बहुत घबराई पहली बार ऐसा मामला हुआ है कुछ महिलाओं ने कहा, अब तो कहीं भी जाने में डर लग रहा है कुछ लोगों ने यह भी कहा कि रामगंगा नदी के उस पार एक आलीशान होटल बना है। उनका कहना था कि महिलाओं को अगवाकर  वहीं ले जाया गया है। वह एक सांसद का होटल है, ऐसा बताया गया। अलग-अलग अटकलें लगाई जा रही थी।

सुबह जल्दी उठ हम गांव में महिलाओं और पुरुषों से मिलकर और सूचनाएं लेकर करीब 10 बजे वहां से चल पड़े। हमें आज फिर सात किलोमीटर चलने के बाद मर्चुला से गाड़ी पकड़नी थी। रात को 8 बजे हम नैनीताल पहुंचे। दूसरे दिन अपने साथियों से अनुभवों को साझा कर हमने उत्तरा के लिए रिपोर्ट लिखी। इस केस से सम्बंधित एक ज्ञापन बनाया गया और डी.आई.जी. से लेकर एस.पी. अल्मोड़ा और उत्तर प्रदेश सरकार को दिया गया और ‘अमर उजाला’ और ‘जनसत्ता’ के लिए भी लिखा और स्थानीय समाचार पत्रों में भी रिपोर्ट दी ताकि खबर ज्यादा से ज्यादा लोगों तक बात पहुंचे। घटनास्थल में पहुंच कर रिपोर्ट लाना  उस समय मुख्य लक्ष्य था।
(Article by Basanti Pathak)

कुछ ही समय बाद हमें एक और घटना की सूचना मिली। वह एक अच्छी खबर थी। अल्मोड़ा जिले के मानिला नाम के एक छोटे से गांव में एक गरीब महिला ने अपनी विधवा बहू की दूसरी शादी की थी। यह खबर बहुत बड़ी खबर थी क्योंकि गांव की एक सीधी-साधी गरीब महिला ने यह निर्णय लिया। इस खबर की पूरी जानकारी लेने के लिए कमला पंत और मैं दोनों के फिर फील्ड में जाने और ‘उत्तरा’ के लिए रिपोर्ट तैयार करने की बात तय हुई। अल्मोड़ा से हमने मानिला के लिए बस पकड़ी। मानिला में हमें हमारे परिचित चौहान जी मिले और उन्होंने हमें उस महिला नंदी देवी के घर तक पहुंचाया। मगर नंदी देवी एकदम सीधी-साधी सामान्य ग्रामीण महिला थी। उसने सबसे पहले हमसे खाने के लिए पूछा और स्वादिष्ट खाना खिलाया। बातें शुरू हुईं तो हमने कहा आपने तो एक बहुत बड़ा काम किया है मगर उसने बहुत ही सामान्य तरीके से जवाब दिया, देखो मैं कम उम्र में ही विधवा हो गयी थी। इसलिए विधवा का दर्द क्या होता है, यह मैंने देखा और सहा ठहरा। अब मेरी बहू के ऊपर जब वही दु:ख पड़ा तो मैं नहीं चाहती थी कि वह जिंदगी भर दुखी रहे। इसलिए मैंने यह फैसला लिया. हमने पूछा लोगों ने आपका विरोध नहीं किया? तो नंदी देवी बोली अब विरोध तो नहीं किया पर सीख देने लगे कि ऐसा ठीक नहीं रहेगा पर मैंने जो सोच लिया उससे पीछे क्यों हटना मैं कोई पाप तो कर नहीं रही थी किसी का घर ही बसा रही थी.

इतनी बड़ी बात नंदी देवी इतनी सरलता से कह गयी मानो कोई बात ही ना हो। लगा सिर्फ किताबें पढ़ कर ही ज्ञान नहीं आता, जिन्दगी के अनुभव हमें समझदार बनाते हैं। यह भी लगा कि पहाड़ की महिलाएं खुद एक पहाड़ की तरह मजबूत हैं। इनको जब सही नेतृत्व मिल जाए तो ये समाज को बदल कर रख दें। नंदी देवी के साथ हुई बातचीत ‘उत्तरा’ में छापी गयी। आज ‘उत्तरा’ अपनी जिम्मेदारी के 30 साल पूरे कर चुकी है। इसका सफर कभी सरल नहीं रहा। हर तरह की मुश्किलें सामने आती रहीं। र्आिथक पक्ष प्राय: कमजोर ही रहा। कई बार लगा कि अब शायद इसका प्रकाशन बंद हो जायेगा मगर हम सब की हिम्मत और सहयोगियों की मदद इसे निरंतर आगे ले जा रहे हैं। मेरी कामना है कि ‘उत्तरा’ निरंतर पूरी सृजनात्मकता के साथ आगे बढ़ती रहे।
(Article by Basanti Pathak)

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