महिलाओं का दैनिक जीवन का कार्यभार

इन्दु पाठक

ग्रामीण महिलाएँ सामान्यत: सामाजिक, आर्थिक व राजनीतिक क्षेत्र  में अपेक्षाकृत अलाभकारी स्थिति में देखी जाती हैं। पितृसत्ता पर आधारित व्यवस्था उन्हें अनेक प्रकार की विषमताओं, शोषण व दबावों को सहने को विवश करती है। यद्यपि संविधान के विभिन्न प्रावधानों तथा समय-समय पर की गयी कानूनी सुरक्षाओं के माध्यम से उन्हें समान दर्जा दिये जाने का भरपूर प्रयास किया गया है, परन्तु जमीनी हकीकत अभी भी पूरी तरह से बदली नहीं है। पारम्परिक मूल्य, धार्मिक  नियम, जाति व्यवस्था तथा विभिन्न प्रकार के सामाजिक बन्धन स्त्रियों को सीमित व बाधित करते हैं तथा उन्हें पारम्परिक भूमिकाओं के निर्वाह करने तक ही सीमित रखना चाहते हैं।

कैसी विडम्बना है कि घर-परिवार के कार्यों में अपना जीवन खपा देने वाली स्त्री की कार्य स्थिति के बारे में पूछे जाने पर प्राय: सुनने को मिलता है कि कुछ नहीं करती, केवल हाउस वाइफ हैं। मानो यह हाउस वाइफ होना कोई बहुत ही आरामदायक स्थिति है। असीमित घरेलू दायित्वों का निर्वाह करने के बाद भी ‘कुछ नहीं करतीं’ का तमगा सम्भवत: इसलिए कि उसके इन कार्यों का कोई ‘र्आिथक मूल्यांकन’ नहीं होता तथा इनके माध्यम से उसकी नगद आमदनी नहीं होती है। परन्तु सच तो यह है कि एक गृहिणी के रूप में स्त्री जितना कार्य करती है, उस प्रकार की सेवाएँ बाह्य स्रोतों से लेने पर एक परिवार को हजारों रुपया व्यय करना पड़ेगा। यही कारण है कि स्त्री के इन कार्यों का र्आिथक मूल्यांकन करने व उन्हें वैतनिक बनाने की माँग भी सुनाई देने लगी है।

उत्तराखण्ड के पर्वतीय ग्रामीण क्षेत्रों की महिलाएँ आज भी ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं। कृषि से सम्बन्धित अधिकांश कार्यों को उन्हें ही करना होता है। कुछ सामाजिक मान्यताओं के चलते खेत में हल चलाने के दायित्व से वे मुक्त हैं, परन्तु कृषि से सम्बन्धित अन्य कार्य रोपाई, निराई-गुड़ाई, फसल काटना, उसे सम्भालना आदि कार्य महिलाओं के द्वारा ही किये जाते हैं। पलायन इस क्षेत्र की एक प्रमुख सामाजिक समस्या है जिसने स्त्री को भी प्रभावित किया है। कार्य अवसरों के अभाव व शिक्षा की उचित व्यवस्था न होने के कारण इस क्षेत्र के पुरुष व युवा नगरीय क्षेत्रों की ओर प्रवास कर लेते हैं। ऑकड़े बताते हैं कि राज्य बनने के बाद पलायन में अधिक बढ़ोत्तरी हुई है। पलायन के परिणामस्वरूप ग्रामीण महिलाओं का कार्यभार और अधिक बढ़ जाता है, उन्हें न सिर्फ खेती के अधिकांश कार्यों को अकेले करना होता है बल्कि बच्चों व बुजुर्गों की देखभाल का दायित्व भी उनका ही माना जाता है। खेती के अतिरिक्त पशुओं की देखभाल, जलाने के लिए लकड़ी व पशुओं के लिए चारे की व्यवस्था, पानी लाना व घर के अन्दर के अन्य कार्य भी उसी के हिस्से आते हैं। पहाड़ की इस औरत की पहाड़ सी जिम्मेदारियाँ आज भी बदस्तूर बनी हुई हैं। कृषि भूमि की मालिक तो वह नहीं बन पाती परन्तु पुरुषों के पलायन के कारण इस भूमि के संरक्षण का कार्य वास्तव में स्त्री ही कर रही है। कृषि उत्पादन व प्राकृतिक संसाधनों के प्रबन्धन में वे निश्चित रूप से अधिक जिम्मेदारी का निर्वाह करती हैं। विभिन्न अध्ययनों से स्पष्ट होता है कि इन महिलाओं का दिन प्रात: 4.00 बजे से शुरू होकर रात 10-11 बजे तक चलता है और इस बीच वह निरन्तर कार्यरत रहती है। जल-जंगल-जमीन से सम्बन्धित कार्यों के अतिरिक्त घर के अन्दर के भी सभी कार्य उसके हिस्से में ही होते हैं। खेत अथवा घर के बाहर के कार्यों को मिल-जुलकर करने के दौरान होने वाली बातचीत या हँसी-मजाक को उनके मनोरंजन का समय माना जा सकता है। कभी-कभी तो कई दिन तक उन्हें बालों में कंघी करने का अवसर भी नहीं मिलता। पहाड़ी ग्रामीण स्त्री की यही स्थिति कमोबेश अभी भी बनी हुई है।
(Women’s workload of daily life)

उत्तराखण्ड सरकार के अर्थ एवं सांख्यिकीय निदेशालय द्वारा प्रायोजित शोध परियोजना जो कि पर्वतीय ग्रामीण महिलाओं की निर्णय प्रक्रिया में भागीदारी व उनके कार्यभार के आंकलन से सम्बन्धित थी, के अन्तर्गत पहाड़ी ग्रामीण महिलाओं की स्थिति की जांच की गयी। यह अध्ययन उत्तराखण्ड के कुमाऊँ मण्डल के अल्मोड़ा व नैनीताल जिलों की पर्वतीय ग्रामीण महिलाओं पर किया गया। उक्त दोनों जिलों से दो-दो विकासखण्डों तथा प्रत्येक विकासखण्ड में से दो-दो गाँवों का चयन किया गया। अल्मोड़ा जिले के हवालबाग विकासखण्ड में से धामस व मटैना, ताड़ीखेत विकासखण्ड में से बधाण व मगचौड़ा गाँवों का अध्ययन इकाई के रूप में चुनाव किया गया। इसी प्रकार नैनीताल जिले के बेतालघाट व ओखलकाण्डा विकासखण्डों से क्रमश: चापड़, छड़खैरना, खनस्यूं एवं महतोली इन चार गाँवों का चुनाव किया गया। इस प्रकार इन दोनों जिलों के कुल आठ गाँवों में अध्ययन कार्य किया गया। इन सभी गाँवों की कुल 320 महिलाओं के सर्वेक्षण के आधार पर ग्रामीण महिलाओं के कार्यभार की स्थिति को जाँचने का प्रयास किया गया। यहाँ यह ध्यान रखा गया कि अध्ययन हेतु ऐसे गाँवों को चुना जाय जहाँ अनुसूचित जाति के परिवारों की संख्या भी पर्याप्त हो जिससे अनुसूचित जाति व सामान्य वर्ग की महिलाओं का तुलनात्मक अध्ययन किया जा सके। इसके अतिरिक्त आयु के आधार पर भी महिलाओं की स्थिति की जाँच की गयी तथा इस आधार पर अध्ययन में सम्मिलित महिलाओं को 20 से 35, 35 से 50 तथा 50 से अधिक इन तीन आयु वर्गों में विभाजित किया गया।

महिलाओं के कार्यभार की जाँच उनके ‘घर के अन्दर’ की गतिविधियों तथा ‘घर के बाहर’ उनके द्वारा किये गये कार्यों के आधार पर की गयी। घरेलू गतिविधियों को भोजन बनाना, कपड़े धोना, घर की साफ-सफाई, बर्तन धोना तथा बच्चों व वृद्धों की देखभाल, इन पाँच भागों में विभाजित किया गया। इसी प्रकार घर के बाहर के कार्यों में कृषि, पशुपालन, चारे की व्यवस्था, जलावन की लकड़ी लाना तथा पानी लाना आदि को शामिल किया गया।

प्रस्तुत अध्ययन से यही प्रमाणित हुआ है कि आज भी पर्वतीय ग्रामीण महिलाओं का अधिकांश समय इन घरेलू व बाहरी क्रियाकलापों को निभाने में व्यतीत हो जाता है। संलग्न तालिका में उनके प्रतिदिन कार्य के घंटों को दिखाया गया है। आँकड़ों से स्पष्ट है इन महिलाओं को दिनभर में कुल 14.10 घंटे कार्य करना पड़ता है। इनमें भी बाहरी कार्यों में लगने वाला समय अपेक्षाकृत अधिक है (7.83 घण्टे)। कैसी विडम्बना है कि कृषि व घरेलू कार्यों के लिए उन्नत तकनीक वाले उपकरणों की उपलब्धता के बावजूद इन महिलाओं को आज भी लगभग 14 घंटे दिनभर कार्य करना पड़ता है। इन उपकरणों तक उनकी पहुँच नहीं है। अत्यधिक कार्यभार के कारण उनका अपना ‘खुद का समय’ जिसमें ये स्वयं अपने बारे में सोचें, अपने लिए कुछ करें, अपने शौक पर ध्यान दें, कुछ मनोरंजन के क्षण बिताएं, उनके पास नाम मात्र का ही है। इस नाममात्र के समय में कभी-कभार टी.वी. देख लेना ही उनके मनोरंजन व आराम दोनों का समय होता है।
(Women’s workload of daily life)

सारणी में आँकड़ों के जिलेवार आयुस्तर के अनुसार तथा जातीय आधार पर तुलनात्मक रूप से भी प्रस्तुत किया गया है। निष्कर्षों में इन विभिन्न आधारों पर विशेष अन्तर नहीं दिखाई दिया है। उच्चत्तम आयु वर्ग (50 से अधिक) की महिलाओं को इस रूप में अपवाद कहा जा सकता है कि उन्हें अपने दिनभर की गतिविधियों में अन्य आयु वर्ग की महिलाओं की तुलना में कम घंटे (13.13) कार्य करना पड़ता है। परन्तु उनका यह कार्यभार भी स्वयं में पर्याप्त है। जातीय आधार पर भी यह रोचक निष्कर्ष निकला है कि सामान्य वर्ग की महिला की तुलना में अनुसूचित जाति की महिलाओं को दिनभर में थोड़ा कम कार्य करना होता है। (13.71 घण्टे)। पूछने पर ज्ञात हुआ कि इस वर्ग के पुरुष घर के बाहर के कार्यों में महिलाओं को थोड़ा बहुत सहयोग देते हैं।

पर्वतीय ग्रामीण महिलाओं का दैनिक कार्यभार (घण्टों में)

विभिन्न श्रेणियाँ       बाह्य गतिविधियों     आन्तरिक गतिविधियों          प्रतिदिन व्य
में व्यय समय       में व्यय समय       कुल समय
जिला      अल्मोड़ा         7.93               6.01                             13.91    
नैनीताल                     7.73                      6.52                             14.25
आयु समूह  20-35          8.06                       6.47                             14.53
                35-50         8.19                       5.96                             14.15
50 से अधिक         6.78                        6.35                              13.13
जातीय श्रेणी  सामान्य         8.45                       5.95                               14.40
                   अनुसूचित 7.08                       6.63                                13.71
जाति   
                     कुल                  7.83                        6.27                                 14.10

कार्यों की भिन्नता के आधार पर यह देखा गया है कि घर के बाहर के कार्यों में महिलाओं का अधिकांश समय कृषि कार्य व जलाने के लिए लकड़ी इकट्ठा करने में व्यतीत होता है। चारे की व्यवस्था व पशुओं की देखभाल में लगने वाला समय दूसरे स्थान पर है। अब चूँकि गाँवों में भी अधिकांश घरों में यह सामुदायिक आधार पर नलों की व्यवस्था हो गयी है। अत: पानी लाने में इन महिलाओं को कम श्रम घण्टे व्यय करने पड़ते हैं। यहाँ यह भी बताना होगा कि जब यह अध्ययन किया गया था तो लगभग 60 प्रतिशत परिवारों में भोजन बनाने हेतु गैस की उपलब्धता थी परन्तु उसकी सहज आपूर्ति न होने के कारण 90 प्रतिशत से भी अधिक घरों में लकड़ी ही ईंधन का मुख्य स्रोत था तथा 80 प्रतिशत से भी अधिक घरों में लकड़ी इकट्ठा करने का कार्य केवल महिलाओं द्वारा ही किया जाता था। इस कार्य के लिए उन्हें औसतन 2 से 5 किमी. तक की दूरी तय करनी होती थी। पशुओं के लिए चारे की व्यवस्था के लिए भी उन्हें लगभग इतनी ही दूरी तय करनी पड़ती है।
(Women’s workload of daily life)

घर के अन्दर के कार्य विभाजन को देखा जाय तो स्पष्ट होता है कि इन महिलाओं का सर्वाधिक समय खाना बनाने तथा बच्चों व बुजुर्गों की देखभाल में लगता है। इस प्रकार अधिकांश बाहरी व आन्तरिक कार्यों का भार इन महिलाओं के कंधे पर होने के कारण उन्हें कठिन परिश्रम करना होता है तथा दिनभर में लगभग 13 से 14 घंटे तक निरन्तर व्यस्त रहना पड़ता है परन्तु चूँकि उनके ये सभी कार्य अवैतनिक हैं तथा इन कार्यों का कोई र्आिथक मापन भी नहीं होता, अत: इसके लिए न तो उन्हें किसी प्रकार की सामाजिक-र्आिथक स्वीकार्यता मिलती है और न ही उनकी सामाजिक प्रतिष्ठा में कोई बढ़ोत्तरी होती है।

कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि जल-जंगल-जमीन आज भी पहाड़ी ग्रामीण महिलाओं के जीवन का अभिन्न अंग बने हुए हैं। घर व बाहर के दोहरे दायित्व उनके जीवन को और भी अधिक कठिन बना देते हैं। एक ओर अत्यधिक कार्यभार और दूसरी ओर निर्णय प्रक्रिया में सीमित या नाममात्र की भागीदारी आज भी उनके जीवन की सच्चाई बनी हुई है। कुछ घरेलू मामलों में यद्यपि उनकी सलाह ली जाती है परन्तु आर्थिक-राजनीतिक जीवन में उनकी सहभागिता नाममात्र की ही देखी गई। अधिकारविहीन दायित्व इस पर्वतीय क्षेत्र की महिलाओं की आज भी नियति बनी हुई हैं।

मनोरंजन का उनके जीवन में बहुत कम स्थान है। यद्यपि अधिकांश घरों में टेलीविजन है परन्तु समय की कमी के कारण वे कभी-कभी टी.वी. देख पाती हैं। धार्मिक उत्सव, सत्संग, रिश्तेदारी या पास-पड़ोस में होने वाले शादी-विवाह, समय-समय पर आने वाले त्योहार आदि उनकी कठिन दिनचर्या में कुछ उल्लास व आनन्द के पल उत्पन्न करते हैं।
(Women’s workload of daily life)

कुछ उपायों को अपनाकर इन महिलाओं की कठिन दिनचर्या को र्आिथक रूप से लाभदायक भी बनाया जा सकता है, जो उन्हें सशक्त करने तथा उनके आत्मविश्वास को बढ़ाने वाला होगा। फूल-फल, सब्जी, मशरूम आदि के उत्पादन कार्य हेतु उन्हें प्रशिक्षित करना, पशुओं की गुणवत्ता में सुधार कर उन्हें अधिक लाभकारी बनाना, सिलाई-कढ़ाई, बुनाई जैसे व्यावसायिक कार्यों में महिलाओं को प्रशिक्षित करके उन्हें र्आिथक रूप से आत्मनिर्भर बनाने की ओर कदम बढ़ाया जा सकता है। कृषि कार्य में नवीन तकनीक का उपयोग कर तथा घरेलू कार्यों में सहायक उपकरणों की उपलब्धता के द्वारा उनके कार्यभार को कम किया जा सकता है। गाँव की महिला का कल्याण या उसके विकास के लिए किये जाने की चर्चा से अधिक उपयोगी होगा कि उसे स्वयं विकास प्रक्रिया में भागीदार बनाया जाय उसके लिए बनाये जाने वाले कार्यक्रमों व नीतियों के निर्माण में उसका खुद का मत भी लिया  जाय। उसका कल्याण करने की नीति से अधिक महत्वपूर्ण होगा कि उसे स्वयं इतना सशक्त बनाया जाय कि वे स्वयं अपना कल्याण कर सकें। इन महिलाओं की श्रम शक्ति में तो पर्याप्त भागीदारी है, आवश्यकता है उनके श्रम को र्आिथक रूप से लाभकारी बनाने की। इस हेतु शासन के स्तर पर तो प्रयास किया ही जाना चाहिए साथ ही गैर सरकारी संगठनों की भूमिका भी महत्वपूर्ण हो सकती है। इन सब उपायों से न सिर्फ पहाड़ की महिलाओं के पहाड़ से कार्यभार को थोड़ा कम किया जा सकता है, बल्कि उनकी सामाजिक-र्आिथक उपस्थिति को उन्नत कर उनके जीवन को अधिक अर्थपूर्ण भी बनाया जा सकता है।
(Women’s workload of daily life)

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