फिल्म- मुक्ति की चाह की कहानी

कविता कृष्णपल्लवी

नागरिक स्वतंत्रता की एक राष्ट्रीय सीमा है, पर स्त्रियों की गुलामी की कोई सीमा नहीं है। बहुत कम फिल्में ऐसी बनी हैं जो एक स्त्री के बचपन से लेकर उसके बृद्धावस्था तक की गुलामी, घुटन और सपनों-उम्मीदों की टूटन को एक फिल्म में प्रस्तुत करती हों। ईरानी फिल्मकार मर्जिएह मेश्किनी की बहुचर्चित फिल्म ‘THE DAY I BECAME A WOMAN’ (वह दिन जब मैं औरत बन गयी) एक ऐसी ही फिल्म है, जो एक नौ साल की बच्ची, एक युवा स्त्री, और एक बृद्ध महिला की तीन अलग-अलग कहानियों के माध्यम से स्त्रियों की दासता, पाबन्दियों और अधूरी इच्छाओं को बेहद प्रभावी ढंग से प्रस्तुत करती है।

यह फिल्म तीन स्वतंत्र कहानियों का एक आकर्षक ऑडियो-विजुअल कोलाज है। इसमें रूपक, अन्योक्ति और अतियथार्थवाद (surrealism) का शानदार उपयोग किया गया है।

पहली कहानी हावा नामक एक बच्ची की है जिसे उसके नौवें जन्मदिन पर उसकी माँ और दादी यह एहसास दिलाती हैं कि वह अब औरत बन गई है और इसलिए अब उसकी कुछ विशेष जिम्मेदारियाँ हैं। उसे अब लड़कों के साथ नहीं खेलना चाहिए और बाहर निकलते समय चादोर (ईरानी लिबास जिससे चेहरे के अलावा शरीर का शेष ऊपरी हिस्सा ढँका जाता है) पहनना चाहिए। उसे लड़कों के साथ अब नहीं खेलना चाहिए। वह उदास हो जाती है लेकिन तभी उसे पता चलता है कि उसका जन्म दोपहर में हुआ था। वह जिद करती है कि दोपहर होने में अभी समय है। तब तक उसे अपने दोस्त हसन के साथ बाहर खेलने जाने देना चाहिए। उसकी मां उसे यह बताकर एक छड़ी देती है कि इस छड़ी को सीधा जमीन में खड़ा करने पर जब इसकी परछाईं इसके ठीक नीचे आ जायेगी तभी से तुम्हारा बचपन खत्म हो जाएगा और औरत के रूप में तुम्हारी जिम्मेदारियाँ शुरू हो जाएंगी। हावा परछाईं को अपनी उँगलियों से मापती रहती है और दोपहर होने तक का समय आखिरी बार अपने सबसे अच्छे दोस्त हसन के साथ बिताती है।
(THE DAY I BECAME A WOMAN)

दूसरी कहानी आहू नामक युवा स्त्री की है जो साइकिल रेस में हिस्सा लेती है। आहू रेस में सबसे आगे निकल जाती है लेकिन उसका पति घोड़े से उसका पीछा करने लगता है। वह उसे रोककर उसे वापस घर ले जाने की कोशिश करता है और उसे तलाक की धमकी देता है। जब वह वापस नहीं आती तब उसका पति एक मुल्ला को ले आता है। मुल्ला भी उसे समझाता है लेकिन जब आहू फिर भी साइकिल दौड़ जारी रखती है तो वह तलाक की आयतें पढ़ने लगता है। इसके बाद आहू का पूरा कुनबा घोड़े से उसका पीछा करते हुए उसे रोकने की कोशिश करता है और अंत में उसके भाई उसे रोकने में सफल हो जाते हैं।

तीसरी कहानी हूरा नामक एक बुजुर्ग नि:संतान महिला की है जिसे युवावस्था में एक पुरुष ने धोखा दिया था। हूरा के पास बुढ़ापे में एकाएक बहुत पैसा आ जाता है। उस पैसे से वह घर-गृहस्थी का सारा साजो सामान खरीद लेना चाहती है जो वह पहले पैसों की कमी की वजह से नहीं खरीद सकी थी। फिर भी उसे लगता है कि कोई सामान छूट गया है। कुछ बच्चों की मदद से वह उन सामानों को एक समुद्र के किनारे रखवाती है। सारा सामान खरीदने के बाद भी हूरा को लगता है कि कोई सामान छूट रहा है पर उसे ध्यान नहीं आ रहा। तभी साईकिल रेस में शामिल दो लड़कियां आती हैं। वे हूरा से पूछती हैं कि इस उम्र में इन सामानों का क्या कीजियेगा! अगर ये सामान हमें मिल जाये तो हम शादी कर नई जिन्दगी शुरू कर सकते हैं। हूरा कहती है कि वह जिन्दगी भर इन सामानों के लिए तरसती रही। फिल्म के अंत में दोनों युवा स्त्रियां और हावा जिसके सर पर चादोर है उसे अपने सामानों के साथ समुद्र में जाते हुए देखती हैं।
(THE DAY I BECAME A WOMAN)

फिल्म में हालाँकि तीन स्वतंत्र कहानियाँ दिखायी गई हैं, परन्तु तीनों को निरंतरता में देखने पर उनका कुल प्रभाव उनके अलग-अलग प्रभाव के योग से कहीं अधिक पड़ता है। इन कहानियों में उम्र के तीन अलग-अलग पड़ावों पर खड़ी तीन स्त्रियों की जिन्दगी और पितृसत्तात्मक समाज द्वारा उन पर थोपी गई बंदिशों को बेहद कलात्मक ढंग से प्रस्तुत किया गया है। पहली कहानी में 9 साल की बच्ची हावा की अपने दोस्त हसन के साथ खेलने की नैसर्गिक इच्छा का दमन उसकी माँ व दादी पितृसत्त्ता की काली चादोर से घोंट देती हैं। दूसरी कहानी में आहू साइकिल रेस में हिस्सा लेकर पितृसत्तात्मक सामाजिक ढाँचे के खिलाफ बगावत का बिगुल फूँकती है। उसका पति जब उसे तलाक की धमकी देता है तो वह बिना किसी झिझक के तलाक के लिए राजी हो जाती है। आहू के बागी तेवर को देख उसके खुद के कुनबे के लोग भी घोड़े से उसका पीछा करने लगते हैं। तीसरी कहानी में बुजुर्ग स्त्री हूरा के पास एकाएक पैसा होने पर वह घर- गृहस्थी का साजो-सामान खरीद कर अपनी अतृप्त इच्छाओं को पूरा करना चाहती है परन्तु वह ऐसा नहीं कर पाती क्योंकि उसे हमेशा यह महसूस होता रहता है कि अभी भी कुछ छूट गया है।
(THE DAY I BECAME A WOMAN)

हूरा के किरदार के जरिये फिल्मकार ने अन्योक्ति में यह दिखाने की कोशिश की है किस तरह से पितृसत्तात्मक समाज में बचपन और जवानी में स्त्री की आजादी को छीनकर उसकी सोच और उसकी चाहतों को केवल घर-गृहस्थी तक सीमित कर दिया जाता है और स्त्रियों के भीतर भी पितृसत्तात्मक मूल्य काबिज हो जाते हैं। मिसाल के लिए एक दृश्य में हूरा को जब एक बच्चा चुनना होता है तो वह गोरे बच्चे को अपने पास रुकने के लिए कहती है। फिल्म में यह भी दिखाया गया है कि घर-गृहस्थी के सभी साजो-समान खरीद लेने की क्षमता पा लेने पर भी स्त्री मुक्ति की चाहत पूरी नहीं हो सकती। यही वजह है कि हूरा को आखिर तक यह लगता रहता है कि कोई एक चीज है जो वह नहीं खरीद पाई है। इसके अतिरिक्त फिल्म में कई अन्य प्रतीकों का भी शानदार उपयोग किया गया है। फिल्म की सिनेमैटोग्राफी अद्भुत है और संगीत फिल्म के प्रभाव को कई गुना बढ़ा देता है। बहुत कम संवाद होने के बावजूद फिल्म दर्शकों को बाँधे रखती है।

फिल्म की कहानी निर्देशिका मर्जिएह मेश्किनी के पति मोहसिन मखमलबफ की है जो खुद ईरानी सिनेमा को नयी ऊँचाइयों पर ले जाने वाले फिल्मकारों में गिने जाते हैं।
(THE DAY I BECAME A WOMAN)
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