‘हे ब्वारी’ की संघर्ष गाथा

चन्द्रकला

उत्तराखण्ड आन्दोलन के भावनात्मक, सामाजिक, राजनीतिक पक्ष और राजनैतिक पार्टियों की सत्ता लिप्सा और नेताओं के छल-प्रपंच, 2 अक्टूबर 1994 को उत्तर प्रदेश पुलिस प्रशासन द्वारा उत्तराखण्ड आन्दोलनकारियों को दिल्ली जाने से रोकने के लिए उन पर चलायी गई गोलियों-लाठियों, व महिलाओं के साथ की गयी यौन हिंसा आदि विषयों को आधार बनाकर लिखा गया त्रेपन सिंह चौहान का उपन्यास ‘यमुना’ कुछ वर्ष पूर्व चर्चा में आया था।

उत्तराखण्ड राज्य मिलने के बजाय यमुना जैसी जुझारू महिलाओं को मुजफ्फरनगर के नारसन में लाठी, गोलियों के साथ ही गहरे घाव भी मिले। राज्य बनने के बाद मुजफ्फरनगर के दोषियों को सजा दिलवाने की आवाजें जिस तरह शनै: शनै: खामोश पड़ती चली गयी यमुना जैसी महिलाओं की त्रासदी भी कहानी बनती चली गयी॥

पहाड़ की औरतों के निरन्तर संघर्षरत जीवन से प्रेरित होकर ही शायद त्रेपन सिंह चौहान ने यमुना की खोज खबर लेने के अपने सहयोगियों के सुझाव को स्वीकार किया और ‘हे ब्वारी’(हे बहू) के माध्यम से पहाड़ के वास्तविक जीवन, पूंजी व राजनीति की विषभरी यारी को यमुना की वर्तमान जीवन परिस्थितियों से जोड़ते हुए हमारे समाज की चुनौतियों को सामने लाने का साहस किया है।

पाठकों के लिए ‘यमुना’को महसूस किये बिना ‘हे ब्वारी को समझना मुश्किल है। ‘यमुना’उत्तराखण्ड का अतीत है तो ‘हे ब्वारी’वर्तमान! ‘यमुना’ उत्तराखण्ड राज्य के सपने बनने का समय है तो ‘हे ब्वारी’सपनों के दरकने व वर्तमान व्यवस्था के यथार्थ से रूबरू होने का दौर! ‘यमुना’ की त्रासद पीड़ा में जज्बा है तो ‘हे ब्वारी’ हताशा में भी लड़ते रहने की प्रेरणा!

अपने समाज की गहरी पकड़ को बनाये रखते हुए पक्षधरता व संवेदनशीलता से लिखा गया तीन सौ छियासठ पृष्ठों व इक्कतीस उपशीर्षकों में विभक्त ‘हे ब्वारी’उपन्यास में राज्य बन जाने के बाद से वर्तमान समय की उत्तराखण्ड की स्थितियों को सिलसिलेवार पिरोने का प्रयास किया गया है। पहले पाँच उपशीर्षक मुजफ्फरनगर में यमुना के साथ हुई यौन हिंसा के कारण उसके मन में उपजा अपमानजनक डर व अवसाद, पति गबरू का यमुना के प्रति बदला हुआ नजरिया, पंजाब में मनोचिकित्सक का यमुना के मन का भूत भगाने की प्रक्रिया के साथ-साथ डाक्टर के परामर्श के बाद दोनों पति-पत्नी का उस अन्यायपूर्ण घटना को महज़ एक हादसा समझकर उबर जाना और यमुना का वापस गांव जाने का मन बना लेना तथा मालिक के परिवार में आन्दोलनकारी होने से प्राप्त सम्मान को दर्शाया गया है।

छठे उपशीर्षक ‘बुझे हुए चूल्हे की कालिक’को साफ करते हुए यमुना अपनी सहेली कमला से गांव की खोज-खबर लेती है। ‘एक निरन्तर लड़े जाने वाले युद्घ’ के बाद पूरा उपन्यास यमुना व उसके आपसपास के पात्रों के वर्तमान व भविष्य के लिए किये जाने वाले संघर्ष पर ही खत्म होता है। उपन्यास उत्तराखण्ड की माँ, बेटी, बहू, सास के जीवन के विभिन्न पहलुओं को तो उजागर करता ही है, गाँव समाज के आपसी सम्बन्धों व पुरुषों की भूमिका को भी नजरअन्दाज नहीं करता।

जमुना को रीख के हमले के बाद रिखादी नाम से पुकारा जाना, बन्दरों व सुअरों का फसलों, सब्जियों व फलों को बरबाद करना और जंगलात का ग्रामीणों के प्रति उपेक्षापूर्ण रवैय्या। बेरोजगार युवाओं व पुरुषों का पलायन, फौजी रूप में जैसे नौजवानों के युद्घ में मारे जाने से बिखरती जिन्दगियाँ ही मिल पायीं। उत्तराखण्ड के दूर-दराज गाँवों को ‘जिस रोड पर थोड़ी देर पहले गाड़ी आयी थी व उसके पति को परदेश ले गयी। आखिर हमारी जिन्दगी है किसलिए?…. सत्रह साल की थी जब उसका ब्याह हुआ था ….. इतनी बड़ी जिन्दगी दोनों ने एक सूनेपन में गुजार दी, अपने आदमी को बेबसी में परदेश जाते देख रही है। यमुना अपने बेटे मनोज को परदेश नहीं भेजने का फैसला करती है।’
Struggle story of ‘Hey Bwari’

उत्तराखण्ड के युवाओं को रोजगार देने के नाम पर खेती की जमीन को औने-पौने दामों में पूंजीपतियों को देकर औद्योगिक इकाइयां शुरू की गयी हैं लेकिन यहां के युवाओं को ठेका मजदूर बनाकर 12-12 घण्टे काम करवाया जाता है और उनके शरीर का खून चूसकर कारखाना मालिक अपना मुनाफा बढ़ा रहे हैं। इस बिन्दु में लेखक ने सिडकुल के मजदूरों की वास्तविक स्थितियों का वर्णन किया है।

अलग राज्य बनाने की घटिया राजनीति से शुरू हुई जल-जगंल-जमीन की लूट-खसोट आज नये रूपों में जारी है। शराब की बिक्री, लकड़ी, जमीन और खनन का बढ़ता व्यापार, नदियों को रोककर पूरे उत्तराखण्ड में बाँधों का निर्माण और जन-जीवन की उपेक्षा, विशालकाय गाड़ियों व बुलडोजरों के खातिर पहाड़ों को तबाह करना जारी है। पहाड़ के विकास नहीं, विनाश को आतुर जनविरोधी नीतियों के पैरोकार सरकारी अधिकारी व पुलिस प्रशासन, आम जनता के दमन-उत्पीड़न व शोषण के लिए किस रूप में जिम्मेदार हैं, अपने हक-हकूकों के लिए जनता द्वारा किये जाने वाले विरोध प्रदर्शनों की दिशा बदलने में एनजीओ (गैर सरकारी संस्थाएँ) क्या हथकण्डे अपनाते हैं, पूरे उपन्यास में बखूबी यह सच्चाई परत-दर-परत खुलती चली जाती है।

कच्ची हो या पक्की, हम सारी दारू का विरोध करते हैं। यमुना तन गई थी। …. देखो आप नहीं मानेंगी तो ….. भेजना पड़ेगा। ‘एस.डी.एम. अब धमकी पर उतर आया था। एक ओर शराब की दुकान खोलने के लिए होने वाले सरकारी प्रयास और शराब के विरोध में उतरे ग्रामीणों का आन्दोलन है तो दूसरी ओर फत्तू, दीपक, सोहन जैसे दलाल व शराबी ठेकेदारों का साथ देते नजर आते हैं। प्रधान, पटवारी, एस़.डी.एम़ द्वारा ग्रामीणों को जेल भेज देने का डर दिखाकर किस तरह बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध करवाने के बजाय गाँव-गाँव तक दारू पहुँचायी जाती है, शराब की राजनीति किस तरह हमारे समाज को खोखला कर आपसी सम्बन्धों में दरार पैदा करती है का सटीक दर्पण है ‘हे ब्वारी’।

बाजारवादी आधुनिकता के साधन मोबाइल फोन व डिश टीवी आने से आपस में मिटती दूरियां व बनते-बिगड़ते रिश्ते, शादी-ब्याह में वीडियो कैमरे की महिमा और कॉकटेल पार्टी के आयोजन से गांव की खण्डित होती एकता को गहरे उतरकर देखा है लेखक ने। पहाड़ी संस्कृति, गढ़वाली किस्से, मुहावरों को ग्रामीण महिलाओं की बोली के रूप में व्यक्त करना, उनकी जीवन शैली, सुख-दुख रीति रिवाजों, खेत-डगरों व बच्चों की जिन्दगी को संवारती घर की जिम्मेदारियों के साथ-साथ गांव समाज से सरोकार आदि विभिन्न आयामों को देखा जा सकता है ‘हे ब्वारी’में। कमला की बहू मीना, बेटी फुरकी और रूपम की मां समा के बहाने लेखक ने पहाड़ की उन तमाम बहू-बेटियों की पीड़ा को व्यक्त करने का प्रयास किया है जिनके पति बेरोजगार हैं या दिहाड़ी मजदूरी करके किसी तरह घर का गुजारा चलाते हैं। दुल्हन के शादी के रंगीन ख्वाब खेतो-डंगरों व ससुराल वालों के लिए काम करते हुए टूटते चले जाते हैं।

मशकबीन व ढोल बजाने वाला किडू व उसके परिवार के साथ होने वाला व्यवहार, दलितों की दयनीय स्थिति को चिन्हित कर एक प्रश्न के रूप में सामने लाया गया है। किडू का बेटा मोनू पण्डित जटाधार से निवेदन करता है ‘देखो गुरूजी आप लोग भी हमसे छूआछूत करते हैं। आपके पास कोई ऐसा मंत्र नहीं है कि आप हमारे घर पर हवन कर हमको भी सवर्ण बना दें…..।’ मोनू का यह आग्रह, जटाधर बामण का हंगामा, मोनू की पिटाई और पिता किडू का अपना गम व अपमान भूलने के लिए रात भर मसक बजाकर रोना मार्मिक है ।

लोन कथा सरकारी तन्त्र व स्वरोजगार के झूठे दावों की पोल भलिभांति खोलती दिखती है। संजीव मास्टर वर्तमान व्यवस्था में बदलाव किये बिना जनता की समस्याओं का समाधान न हो पाने का विचार रखने वाला नौजवान है। वह यमुना को मौजूदा सत्ता व पूंजी के गठजोड़ में पिसती आम जनता और शासक वर्ग की असलियत से वाकिफ करवाता है। ‘मामी, सत्ता एक उदंड सांड जैसी होती है़…. उसकी नकेल पूंजीपतियों के हाथ में होती है …..।’ हीराकणी के बहाने बांध बनाने वाले अपरिचितों की सच्चाई संजीव ही यमुना को बताता है और आन्दोलन की रणनीति बनाने का आश्वासन भी देता है। यमुना को गांव वालों को फिर एक लड़ाई के लिए संगठित होने को प्र्रेरित करती यमुना पुलिस प्रशासन व बांध कम्पनी के लिए एक चुनौती बनती चली जाती है। हम इस दारू के दैत से हार गै, अब सरकार डाम दे रही है हमें। डाम को हमारे यहां शरील डामना (दागना) कैते हैं …. लड़ना ही होगा इस राक्षस से भगाना होगा यहाँ से ….. ‘यमुना की आंखें भर आयी।’

यमुना और अन्य औरतों को भी कई लालच दिये जाते हैं। ‘आप सब आन्दोलनकारी हैं आपने जो झेला है, आप सबसे पहली हकदार हैं…..’। वह बोली साब, मैं आन्दोलनकारी हूँ और आगे भी रहूँगी। …. चुप कराने वाला ऐसा सार्टिफिकेट तो मुझे कतै नि चाहिए …..। यह पक्तियाँ उत्तराखण्ड में आन्दोलनकारी सार्टिफिकेट बनाने, सुविधाएं हासिल करने वालों और आरक्षण दिलवाने की राजनीति करने वालों के मुँह पर जोरदार तमाचा है।
Struggle story of ‘Hey Bwari’

हक-हकूकों की वास्तविक लड़ाई की धार को कुन्द करने वाली व्यवस्थापरक, गैर सरकारी संस्थाओं (एनजीओ) के संचालक चन्द्र जी जैसे को बेनकाब करना इस उपन्यास का एक और महत्वपूर्ण पहलू है। संजीव यमुना को उनके असली मकसद को समझाता है। कोई भी आन्दोलन फंडिंग ऐजेन्सियों के माध्यम से नहीं चल सकता …… जब आप मांग पर आते हैं तब आप …… जिसके खिलाफ लड़ाई शुरू हुई है …..। ये आन्दोलन व्यवस्था पर धूल झाड़ने के आन्दोलन हैं। बाँध विरोध में एकजुट ग्रामीणों को बिना हिंसा के महज खेतों को बचाने के अपराध में जेलों में ठूंस देना और बच्चों, डंगरों का वीरान पड़ना, कम्पनी का पुरुषों को नौकरी देने का झाँसा देकर आपस में फूट डालने में सत्तापक्ष सफल होता है। लेकिन यमुना का पति गबरू जब जेल में उससे मुलाकात करने जाता है तो उसका कम्पनी के दलाल से बात न करने का तेवर प्रेरणादायी है।

यमुना के कमजोर पड़ गये शरीर पर मालिश करते हुए बहू उसके घावों के बारे में पूछती है क्या है जी ये? यही है उत्तराखण्ड राज! यही है उत्तराखण्ड आन्दोलन का सार्टिफिकेट, सजा मिल रही है मुझे। सास के लगातार आन्दोलनरत रहने और उसके संघर्ष व जज्बे को पहली बार महसूस कर पाती है बहू।

गमदी को बाघ का उठा ले जाना, संजीव व रेन्जर का आपसी संवाद, मुआवजे का चैक लेने के बजाय बहू के गहनों की पोटली देकर अपने बच्चों का भविष्य व गाँव वालों का सुख चैन लौटा देने का आग्रह, यमुना की बेबसी को व्यक्त करता है। लड़ो, हमें तब तक लड़ना होगा, जब तक हम जीत नहीं जाते, अपने बच्चों को बचाने के लिए हमें लड़ना ही होगा। लड़ने के लिए लोगों को उकसाने के आरोप में यमुना के परिवार सहित कई ग्रामीणों व संजीव मास्टर को सबक सिखाने के लिए शासक वर्ग व पूंजीपतियों के लिए पुलिस प्रशासन का तीखा दमन चक्र चलता है कभी न खत्म होने वाली लड़ाई जारी है …..।

अन्त तक पहुँचते-पहुँचते लेखक पाठक के मन के अन्तद्र्वन्द्व को तीव्र करने में सफल होता है। वर्तमान शोषणकारी व्यवस्था, झूठे लोकतन्त्र व सत्ताधारियों की वास्तविक तस्वीर का आयना दिखाना काबिलेतारीफ है। प्राकृतिक बिम्बों, प्रतीकों स्थानीय राजनीति में उलझे लोगों की मन:स्थिति, पात्रों का सटीक चयन व मिश्रित भाषा शैली, उपन्यास को पठनीय बनाती है। उपन्यास के अन्तिम भाग में घटनाओं को तेजी से समेट देना जरूर कुछ खलता है। भाषा की दृष्टि से भी यह उपन्यास महत्वपूर्ण है। सभी पात्रों के मुख से गढ़वाली मिश्रित हिन्दी बुलवाई गई है।

लेकिन उत्तराखण्ड को सम्पूर्णता में समझने व पहाड़ की महिलाओं के जीवन की कठिनाइयों, संघर्ष व दृढ़ता को केन्द्र में रखकर लिखी गयी इस संघर्षगाथा को सलाम!

पुस्तक का नाम – ‘हे ब्वारी
लेखक – त्रेपन सिंह चौहान
प्रकाशक- साहित्य उपक्रम, दिल्ली, 2014
मूल्य – रु. 150/-
पृष्ठ- 366
Struggle story of ‘Hey Bwari’
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