कहानी : उत्तरायणी

सुजाता

संक्रान्त आने को चार दिन ही बचे थे, उत्तरायणी मेले की तैयारी में आस-पास वैसे ही खूब चहल-पहल हो जाती है- तम्बू गाड़ने की आवाज, छोटे-बड़े टैम्पू की खड़-खड़, सब हमारे घर के नीचे सड़क से होकर गुजरते थे। गाँव भी रोज बढ़ती रौनक के साथ खुद को मेले में जाने के लिए तैयार करता रहता। साल भर का यही तो एक उत्सव है पूरे इलाके का। भयानक ठिठुरन के बाद धीरे-धीरे सूरज का उत्तर दिशा में बढ़ना गर्मी लौटाने का संकेत भी है यह मेला। सारे नाते-रिश्तेदार, सखी-मित्र सभी यहीं तो मिल पाते, मेला पूरे सात दिन चलता। समोसे-जलेबी की खुशबू, आलू के गुटके व अरसे की सुगन्ध महीनों बाद भी जीभ में पानी भर लाती। मेरे लिए तो यह मेला वैसे भी खास था- इसी में आज से कोई बत्तीस-पैंतीस साल पहले अपने भाई-भाभी और भतीजे के साथ मैं अपने गाँव से सात किलोमीटर पैदल चलकर आई थी- नया सूट और नई चप्पल पहनकर। हमारे गाँव के और भी बहुत से लोग साथ थे। कई दिन पहले से जाना तय हो गया था। हर साल एक बार तो मेले में जरूर ही आना होता था- कभी बाबू के साथ, कभी माँ, दादी, बड़ताऊ…. इस बार भाई-भाभी। पिछले महीने से ही मेरे ब्याह की बातें जोर-शोर से चलने लगी थी। गाँव में मेरी उमर को लेकर खूब बातें होतीं- ”क्या बीस की पूरी करके ही इसे ससुराल भेजोगे?” पर चाचा ने घर में सबको बोल दिया था- ‘छोटी उमर में नहीं ब्याहनी है, देखा इसकी बुआ का हाल, पहला बच्चा होने पर ही मर गई। बहन गई पर भतीजी के लिए कोई जल्दी नहीं है।’ मेरे साथ की सभी लड़कियाँ भी अपने ससुराल जा चुकी थीं, सरला तो मुझसे तीन साल छोटी थी, पर दशहरे पर उसकी भी शादी हो गई। जहाँ से मेरा रिश्ता आया था उनकी एक ही शर्त थी- ”लड़का दिल्ली में नौकरी करता है, वो तो पहले लड़की देखेगा।” तभी मेले में देखना-दिखाना तय हुआ। अपने ब्याह की कल्पना तो मैं कब से करती आ रही थी, पर आज तो राह चलते जो अच्छा-सा दिखने वाला लड़का, मर्द मिलता उसी से मैं अपने होने वाले पति की सूरत मिलाकर खुद ही झेंप जाती। भाई-भाभी मुझे अपने बीच में चला रहे थे। मेले में शिवबाड़ी के पास मिलना तय था। लाज और खुशी से मेरे पैर जमीन पर नहीं पड़ रहे थे। सात-आठ लोग आये थे मेरी ससुराल की तरफ से। तीन औरतें थीं- इनकी भाभी, बहन, बुआ। मैं भतीजे की उंगली पकड़े खड़ी रही, चाहकर भी सर नहीं उठा पा रही थी। इनकी बुआ पास आकर बोली- ”भई, लड़की को देखकर तो मना करने का कोई सवाल ही नहीं, बड़ी सुन्दर है। बस नन्दन, भी हाँ कर दे।” और नन्दन प्रसाद ने भी हाँ कर दी। महीने भर में मैं मेले के उस छोर पर बसे गाँव से इस छोर पर बसे खूब ऊँचाई वाले गाँव में आ गई। बहुत कुछ बदल गया, मैं सुमित्रा से नन्दू की बुआरी हो गई, सूट की जगह साड़ी में लिपटी रहने लगी और बड़े से घर में पन्द्रह छोटे-बड़े सदस्यों का हिस्सा बन गई। तब ‘ये’ दस दिन साथ रहे। पता ही नहीं चला कि वो दिन कैसे बीत गए। सब मेरी सुन्दरता और काम करने के तरीके की खूब तारीफ करते। मैंने अपनी भाभी से खाना बनाना अच्छी तरह सीखा था, खूब शौक से सबको बना कर खिलाती। उस दिन ‘इन्हें’ वापस दिल्ली अपनी होटल की नौकरी पर जाना था- बड़ी घबराहट हुई और दुख भी। जाते हुए बोल गये- ”मौका मिलते ही आऊंगा।”

रोज के घर-खेत के कामों में मैं भी औरों के साथ जुट गई। मेरे ससुर नहीं थे, बातों-बातों में चाची सास ने बताया- ”वो जिन्दा हैं या मर गये, हमें नहीं पता। नन्दन की छोटी बहन के जन्म से कभी पहले आये थे, हो गये बाईस-चौबीस साल, सुना है कि कहीं शहर में ही अपना दूसरा परिवार बसा लिया है। तेरी सास तो नन्दन को भी नौकरी पर नहीं भेजना चाहती थी। बड़े बेटे देव को तो उन्होंने साफ मना कर दिया था। पर नन्दन नहीं माना। मजबूरी भी तो थी, बहनों की शादी के बाद कर्ज भी खूब हो गया था। गाँव के रमेश ने ही नौकरी लगाई है उसकी कहीं दिल्ली में।” उसके बाद सास से मेरी सहानुभूति भी जुड़ गई। वो कभी बहुत चिड़चिड़ी हो जाती थीं, तब खूब कोसतीं सारे परिवार को, अपने बच्चों को, कभी-कभी खूब रोती भी। बीमार भी बहुत रहने लगी थीं। रसोई भी अब चाची के साथ मिलकर ही संभाल पाती थी। अपनी जेठानी और चाची की बुआरियों के साथ मैं खेत जंगल के कामों में जाने लगी थी। जंगल से लकड़ी लाते एक दिन जोर से चक्कर आया और मैं मुँह के बल गिर गई। जेठानियों और साथ चलती हुई औरतों ने मेरा खूब मजाक उड़ाया- ”लो भई निशानी दे गया इसका पति। शरीर मजबूत रख ऐसे चक्कर खायेगी तो कैसे पालेगी उसे।” मेरे खाने का सभी ध्यान रखते, जबरदस्ती भी खिलाते। बड़ा मन हुआ ‘इन्हें’ बताऊँ, जेठानी से कहा तो उसने मजाक में उड़ा दिया- ”अब क्या एक-एक खबर उसे देगी, छुट्टी मिलते ही आयेगा तब बता देना।” एक बार बीच में मायके भी गयी, सोचा यहाँ से चिट्ठी लिखकर खबर कर दूँ पर लाज से न पता पूछ पाई और न किसी से कह पाई। वो रात बड़ी डरावनी थी, दर्द से तड़प कर लगा अब नहीं बचूंगी, लगा काश ‘तुम’ साथ होते। अगली दोपहर तक दर्द से तड़पती रही। सास, चाची और भी बहुत-सी औरतों ने हाथ पैर मले-तब सोहन पैदा हुआ था। गाय को बाहर बाँध मुझे और सोहन को उस टूटे हुए कमरे में रखा गया- कमजोर बेटे को मैं रातभर सीने से लगाये बैठी रहती। ‘तुम’ आये तो- सड़क पर ही बेटा होने की खबर मिल गई थी। खूब खुश हुए थे- दो-तीन महीने का बेटा गोद में लिये तुम पैंसा जोड़ने की चिन्ता करने लगे थे। दस दिन रहकर फिर नौकरी पर चले गये। तुमने बताया था कि दूसरी नौकरी बदल ली है इसलिए छुट्टी नहीं है। जाते हुए थोड़े से रुपये मेरे हाथ में रख गये थे। बाकी कुछ माँ को देने होते और थोड़े चाचा को- वो ही हमारी और घर की देखभाल करते थे।
(Story Uttrayani)

वे दिन बड़ी तेजी से बीते, साल-दो साल में ‘वो’एक बार आते। मैं सोहन के बाद सरला और राघव की माँ बन गई थी और फिर पेट से थी। इस बीच घर और खेत का बँटवारा हो गया था। ऊपर एक कमरा और नीचे का एक टूटा कमरा हमें मिला था- चाचा-चाची और उनके दो बहू-बेटों के कमरे भी बँट गये थे। मैं सास जी और तीन बच्चों के साथ बँटे हुए घर-खेत संभालने लगी। जेठ जी अपने परिवार के साथ नीचे सड़क पर छोटा-सा घर बनाकर रहने चले गये थे, वहीं उन्होंने दुकान खोल ली थी। उनके बेटे और बेटियाँ स्कूल जाने वाले हो गये थे। सुबह-शाम जेठ जी आकर खेत-खलिहान देख लेते और मुझे हिदायत दे जाते, अपने बच्चों के लिए दूध भी ले जाते। अक्सर सास के पास बैठकर कहते- ”बस सोहन भी स्कूल जाने लायक हो जाय तो उसे भी अपने साथ ले जाऊंगा।” रानो के पैदा होने पर तो सबने यही कहा- ”यह तेरा दूसरा जन्म है अब सोचना मत बच्चों के बारे में।” बहुत खून बहा था, पहले ही शरीर में नहीं था। महीनों उठते-बैठते आँखों के आगे अंधेरा छा जाता। कैसे रोटी पकाती, गाय की देखभाल करती, आस-पास से लकड़ियाँ और घास बटोरती?…. याद ही नहीं। कभी-कभी गाँव की कोई भाभी-चाची दयाकर थोड़ी लकड़ी या घास दे जाती। सोहन और सरला भी काम में जुटने लगे थे। सास जी का खाँस-खाँसकर बुरा हाल था, उन्हें अक्सर साँस का दौरा पड़ता था। कैसे कटा वो समय याद करके भी हैरानी होती है- बस रानो का सुन्दर फूल सा चेहरा देखकर जीने का जोश आ जाता। सोहन और सरला भी एक-दम उमर से बहुत बड़े हो गये थे समझदार, कोई जिद न करने वाले बच्चे। राघव भी अक्सर बीमार रहता, बड़ा कमजोर सा था। ‘ये’ लम्बे समय से नहीं आये थे- गाँव के और नौकरी पर गये मर्दों की तरह। मायके में भी माँ-बाबू जी के मरने के बाद किसने कितने दिन मेरी सुध लेनी थी।

रानो पैदल चलने लगी थी, बिलकुल गुड़िया सी। दिनभर अपने भाई-बहन के लिए खिलौना बनी रहती, सास जी भी खूब लाड़ लड़ातीं। उन दिनों परिवार में आपस में बड़ा तनाव रहने लगा था। चाचा के लड़के और जेठ जी में कई बार झगड़े होते। जेठ जी तो अपने घर चले जाते, पीछे से गुस्से का उबाल मुझ पर और मेरे बच्चों पर निकलता। चाची और भाभियों ने भी बात करना बहुत कम कर दिया था। घास और लकड़ी को जाते तो अपने दुखड़े मैं भी दूसरी औरतों की तरह रो लेती। हेमा हम सब से समझदार थी। उसका पति तो ब्याह के बाद एक बार भी नहीं आया। उसका मायका भी बड़ी दूर पहाड़ पर था। हमारे सामने वो खूब रोती और हमें हिम्मत भी देती। बाहर का काम करने के लिए लोग भी उसके लिए तैयार रहते थे। पर गाँव की दूसरी औरतें उसे अच्छा नहीं मानती थी, कहती- ”ये तो बिगड़ी हुई औरत है।” उसी ने मुझे राशन की दुकान वाले से मिलवाया। दुकान बहुत दूर थी। मैं कभी-कभार सोहन को भेजकर सामान मँगवा लेती…. अब तो हेमा के साथ वो मेरा भी थोड़ा बहुत सामान ला देता था। एक दिन देर शाम को चीनी लेकर वो मेरे घर आया और बोला- ”दूर से आया हूँ कम से कम चाय तो पिला दे।” मैं बच्चों और सास जी को खाना खिलाकर रसोई ही समेट रही थी। वो सीधा रसोई में ही चला आया मुझे बड़ा अजीब लगा। भद्दी हँसी के साथ वो बोला- ”डर क्या रही है, हेमा तो बोल रही थी तुझे हमारी जरूरत है। राशन नहीं लेना है क्या….?” और उसने मुझे पीछे से कसकर पकड़ लिया मेरी तो साँस ही रुक गई। चीख भी नहीं पा रही थी, तभी पैर लगने से थाली गिर गई। सोहन ने कमरे से ही पूछ लिया- ”क्या हुआ माँ?” वो गुस्से से चला गया। जाते-जाते बोला राशन चाहिए तो खबर भेज देना तभी आ जाऊंगा। मैं रातभर रोती रही और काँपती रही- ‘तुम्हें’ बहुत याद किया। मेरे हाथ में बिल्कुल पैसे नहीं रहते थे, कभी-कभी थोड़े बहुत जेठ जी दे जाते वो चार दिन भी नहीं चलते थे। मेरे बच्चे अपने ताऊ के बच्चों के पुराने कपड़े पहन लेते और मैं जेठानी की पुरानी धोती पहन लेती थी। चायपत्ती, चीनी, माचिस, नमक….. कहाँ से मंगवाती। सब डब्बे खाली पड़े थे- मैं भी समझदार हो गई थी और सोहन को भेजकर राशन की दुकान पर खबर भिजवाई कि हमें राशन चाहिए- बस फिर लगातार राशन आने लगा।
(Story Uttrayani)

उस दिन गाय बीमार थी। जेठ जी अपने बच्चों के लिए दूध नहीं ले जा पाये, मुझे बहुत डाँट कर गये, बोले- ”तू बिल्कुल निकम्मी औरत है, मैं कब तक पालता रहूँगा तुम सबको। तेरा घरवाला सबको मेरे पल्ले छोड़ गया है।”  मैं गाय की सेवा में लगी रही। कभी किसी के कहने पर कुछ पिलाती, तो कभी कुछ खिलाती। डर था, गाय नहीं रही तो बच्चों को कब तक काली चाय पिलाऊंगी। दूसरी गाय तो मैं किसी हालत में खरीद नहीं सकती थी। सोने से पहले एक बार और गाय को देखने कमरे से निकल कर चली। आँगन पार गाय बाँध रखी थी। पीछे-पीछे रानो भी माँ-माँ करती दौड़ पड़ी। मैं गाय को पुचकार ही रही थी….. ऐसा लगा कुछ आँगन में कूदा और एक सीना चीरती चीख के साथ रानो गायब हो गई। मैं रानो की चीख के साथ पलटी, सोहन और सरला भी दौड़ आये। चाची और उनकी बहुएँ भी ”क्या हुआ” कहते हुए मेरी तरफ दौड़े। मुझे तो बड़ी देर बाद समझ में आया….. रानो को गुलदार उठाकर ले गया था। गाँव के लोग मशाल जलाकर, डण्डे लेकर जंगल की तरफ दौड़े। मुझे लगातार अपने तीन बच्चों का रोना सुनाई दे रहा था पर मैं कुछ भी नहीं बोल पा रही थी, न हिल पा रही थी। रानो का बचा खुचा शरीर गाँव के लोग लेकर आये, रात को जेठ-जेठानी भी आ गये थे। मुँह अंधेरे ही रानो को पता नहीं कहाँ दफना आये?…. मुझे उसका चेहरा भी नहीं दिखाया। हेमा कहती थी- ”क्या दिखाते तुझे कुछ बचा ही नहीं था।” मैं महीनों पागलों की तरह जंगल की तरफ भाग जाती…. ”रानो”- ”रानो” चिल्लाती। मुझे विश्वास था कि वो जंगल में अकेली भटक रही होगी। इतनी छोटी-सी बच्ची भूखी-प्यासी भी होगी। सब समझाते कि ”वो अब नहीं आयेगी-मंगल का मुन्ना, पुष्पा की नातिन वापस आई हैं क्या?” वो दहशत भरे डरावने दिन थे- लगता ‘तुम’ आओगे तो मैं तुम्हें बताउंगी कैसे प्यारी थी रानो, गोल-गोल आँखों वाली, लम्बे घुंघराले बालों वाली….. ‘तुमने’ तो उसे एक बार भी नहीं देखा। गाँव के लोगों ने तब तुम्हारा पता खोजा था- तुम नहीं मिले, कहीं और चले गये थे बिना किसी को कुछ बताये।

सोहन भी जेठ जी के यहाँ चला गया, उसे स्कूल जाना था। अक्सर रोकर मेरे पास भाग आता। उसे वहाँ जरा भी अच्छा नहीं लगता। मैं उसे खूब समझाती, डाँटती भी-फिर सरला को भी जल्दी ही उसके साथ भेज दिया। छ:-सात दिन बाद दोनों घर मिलने आते। और भी कमजोर हो गये थे। चाची का छोटा बेटा तीरथ अपनी ताई की कभी-कभार दवा ला देता था। सास की खाँसी तेज हो गई थी। उनका चेहरा खाँसते हुए डरावना लगता था, मैं और राघव उनकी पीठ-पैर मलते रहते। कभी-कभी तीरथ दवा बदलकर भी लाता रहता। मेरे पास पैसे नहीं होते तो वो माँगता भी नहीं था। एक दोपहरी दवा लेकर आया बोला- ”तू कितनी सुन्दर होती थी जब आई थी। अपना ध्यान रखाकर, नहीं तो हम जैसों ने तेरी तरफ देखना भी बन्द कर देना है।” मेरा हाथ पकड़कर वो दबाता चला गया। मैं फिर रो पड़ी- ‘तुम्हें’ याद करके।

पंडितों के यहाँ शादी थी। उनकी बेटी और भाभी से मेरी अक्सर बातें होती रहती थी। जेठ-जेठानी भी सब बच्चों के साथ आये थे। शाम को खाने पर जाना था। मेरे बच्चे तैयार हो गये, वो बड़े खुश थे। सास ने मुझे भी जाने को कहा, मैं धोती बदलने चली तो जेठानी बोली- ”तू कहाँ चल दी, ऐसे मौकों पर तुम्हारी जैसी औरतें नहीं जाती। पूजा है वहाँ- नन्दन जिन्दा है या मर गया ये भी तो नहीं पता।” कितना बड़ा सच था ये पर बड़ा कड़वा लगा। मुझे बहुत बुरा लगा था। सास के पास बैठकर मैं रोती रही। उनकी सूखी आँखें भी भीग गई थी- ”मुझे देख मैं भी तो सारी जिन्दगी ऐसे ही सुनती रही, और देख कितनी ही तो हैं गाँव में ऐसी। तू क्यों इतना बुरा मान रही है?”

गाँव के मन्दिर में जागरण था। सारे गाँव का खाना उस दिन वहीं था। सारी औरतें मिलकर काम करतीं-कोई सब्जी काटती, कोई आटा गूँथती, बर्तन धोती- पकाने के लिए पंडितों के लड़के आ जाते। गाँव के जवान लड़के परोस देते, लड़कियाँ भी आकर खूब काम करती। मैं तैयार भी नहीं हुई जाने को, खुद ही सब सीख लिया था। तभी मन्दिर के रास्ते आती पंडितानी और उसकी बहू ने आवाज लगाई- ”क्यूँ भई सोहन की माँ, मन्दिर नहीं जा रही हो? काम न करना पड़े सो घर बैठी है। विधवा तो नहीं तू? चल-चल बड़ा काम है वहाँ।” मन्दिर में बर्तन माँजते-माँजते मैं लगातार यही सोचती रही- मैं हूँ क्या?

एक रात बड़ी निराशा हुई। इतने बादल गरजे और बिजली चमकी लगा सारा गाँव ही बह जायेगा। मकान इतनी जोर से हिला कि लगा अब गिरा तब गिरा। सास जी चार-पाँच दिन से कुछ खा भी नहीं पा रही थी। उस रात इतनी तेज खाँसी का दौरा पड़ा कि मैं घबराकर राघव को दादी के पास बिठा चाची के परिवार को बुलाने दौड़ी। फिर नीचे बूढ़े ताऊ के परिवार को भी आवाज लगाई। सास ने अपने कमजोर झुर्री भरे हाथों से मेरा हाथ पकड़ा। शायद कुछ कहना चाह रही थी, नहीं कह पाई….. उस दिन मुझे लगा कि मैं बिल्कुल अकेली हो गई। रातभर तूफान के बाद बारिश थम गई थी। तड़के ही जेठ-जेठानी भी आ गये, आते ही रोते हुए माँ की लाश से लगकर मुझ पर दहाड़े- ”हमें तूने रात को क्यों नहीं बुलाया? हम माँ को मरने नहीं देते।” तब मैंने ‘तुम्हें’ खबर करने को बोला था। तुम्हारी माँ अक्सर कहती थी- ”कभी आये न आये मेरा नन्दन, मेरे मरने पर जरूर आयेगा।”
(Story Uttrayani)

उसे लगता था तुम्हारे पिताजी का उन्हें छोड़कर चले जाना तुम्हें सबसे ज्यादा दर्द देकर गया था। तुम माँ के और ज्यादा लाड़ले और उन्हें समझने वाले बेटे बन गये थे। माँ का संस्कार करने को उनका बड़ा बेटा था। तुम्हारी बहनें भी आईं थीं- खूब रोईं, उनका मायका खत्म हो गया था। तुम्हारी छोटी बहन ने तुम्हें खोजने के लिए बहुत लोगों से बातचीत की, खबर भेजी, डाकघर से टेलीफोन भी किये। पता चला दिल्ली तो तुम कई साल पहले ही छोड़ गये थे, बम्बई थे या पता नहीं कहाँ? हाँ जो बात पता चली वो यह, कि तुमने तो कबकी वहाँ शादी कर ली थी। सरला और राघव के बराबर तो तुम्हारे वहाँ बच्चे भी थे। पता नहीं क्यूँ-मुझे न रोना आया न दहशत हुई। लगा, बड़ा सुना-सुनाया सा किस्सा है। पर जब भी सास जी का झुर्री भरा, सूखा-सा पीला चेहरा याद आता तो लगता- ‘तुम्हें’ तब आना चाहिए था।

सास जी की कर्मकाण्ड पूजा के बाद सब मेहमान चले गये थे। राघव को भी स्कूल भेज दिया था, मैं उस घर में अब अकेली हो गई थी। जेठ जी का आना बढ़ गया था। उन्हें मेरी अब बड़ी चिन्ता हो गई थी। बीड़ी से भूरे हुए उनके भद्दे दाँत और गन्ध मैं बहुत बार करीब से महसूस करने लगी। एक रात वो वहीं रुक गये। उनका भी तो घर था, मैं क्या कहती, बोले- ”देख भई सुमित्रा, मुझे ही जब दोनों घर और सब बच्चे देखने हैं तो जरूरी है कि दोनों घरों में मेरी भी देखभाल बराबर की जाये….।” और मेरा शरीर बीड़ी की बदबू से भर गया। आज मैंने ‘तुम्हें’ बीड़ी की लिजलिजाती बदबू की तरह याद किया था- थूक भर आया था मेरे मुँह में।

दसवीं करते ही सरला का ब्याह तय हो गया था। मेरी एक ही शर्त थी, लड़का बाहर नौकरी न करता हो। नौकरी करे तो सरला पहले दिन से ही उसके साथ जायेगी। दादी की दुआ का असर था तभी तो सरला को महेश मिला था। बहुत समझदार-अपनी दुकान थी उसकी। पढ़ा तो दसवीं तक ही था, पर बहुत मेहनती। फेरों के समय पण्डित जी बोले- ”कन्यादान कौन करेगा?” जेठ जी जेठानी के साथ आगे बढ़े। जेठानी के शब्द- ”और कौन करेगा, हम तो हैं ही”, मुझे तीर जैसे लगे। मैं पीछे दुबक गई थी। बाद में जेठ मुझे कोहनी मारकर भद्दी हँसी के साथ बोले- ”ले भई, आज से तो पण्डित जी ने पक्की तरह तेरे बच्चों का बाप भी मुझे ही बना दिया है। अब तो तुझे कोई परेशानी नहीं ना?” विदाई पर सरला बहुत सुन्दर लग रही थी, मुझे रानो की बहुत याद आई।

सोहन शरीर से मजबूत, लम्बा चौड़ा निकला। सब कहते अपने बाप जैसा है। सच कहूँ मुझे तो अब याद नहीं-उसका बाप कैसा था? वो फौज में भर्ती हो गया था। पहली बार जब ड्यूटी से आया तो सबके लिए सामान लाया। मेरे लिए भी ”नई धोती”-बरसों बाद मिली उस धोती को सीने से लगाकर मैं बहुत रोई थी। बरसों बाद हाथ पर रुपये भी आये। अब मैं राशन नगद मँगवाती थी।

सोहन का ब्याह सरला ने ससुराल के रिश्तेदारों में करवा दिया था। लड़की बारहवीं के बाद भी पढ़ना चाहती थी। कभी-कभी मेरे पास भी आकर रह जाती, नहीं तो ज्यादातर सोहन के साथ क्वार्टर में ही रहती थी। राघव शरीर का पतला दुबला था पर दिमाग का तेज। पढ़ने में ही लगा रहता। जेठ जी भी पढ़ाई के लिए उसे पैसे देने में कंजूसी नहीं करते। सोहन भी कभी-कभी उसकी किताबों के लिए अलग से पैसे भेज देता। जेठ जी के बच्चों की शादी भी हो गई थी। एक लड़का खेत सम्भालता, उसकी बहू ज्यादा गाँव में ही मेरे साथ वाले कमरे में रहती। अच्छी है, अपनी सास से ज्यादा मुझे मानती। राघव बैंक में बाबू की परीक्षा पास कर गया था। सोहन और सरला भी अपने परिवार के साथ तब गाँव आये। हमने मन्दिर में जागरण कर गाँव वालों को खाना खिलाया। मेरा राघव सब से कह रहा था- ”बस अब माँ को मैंने अपने साथ ले जाना है। यहाँ गाँव में अकेली नहीं रहेगी। ” सोहन और सरला भी यही चाहते थे, पर मैं नहीं जाना चाहती थी। बहुत डर था- शहर में कहाँ रह पाऊंगी? अपने लोग नहीं होंगे, मोटर गाड़ी का शोर….. सोच-सोच कर ही मेरा दम घुटता। कितनी बार राघव लेने आया पर मैं कोई न कोई बहाना पहले ही ढूँढ कर रखती और अगली बार पर बात टाल देती।
(Story Uttrayani)

इन पैंतीस सालों में संक्रान्त के कितने ही मेले लगे और गुजर गये। एक बार जब बच्चे छोटे थे तो सब को मेला जाते देख रो रहे थे, तब चाची के साथ मैं उन्हें भी ले गई थी। फिर कभी नहीं गई, न बच्चों ने जिद की। वो जानते थे माँ के पास पैसे नहीं रहते। बड़े होकर अपने दोस्तों के साथ जरूर कभी-कभार गये। इस बार फिर मेला लगने की चहल-पहल शुरू हो गई। वैसे ही लोगों का आना-जाना, सड़क पर लगातार गाड़ियों का गुजरना जारी है। कल सोहन और सरला भी अपने परिवार के साथ आ रहे हैं। राघव तो आज रात को ही पहुँच जायेगा। मेरी इच्छा थी, इस बार सब साथ में मेला देखें, फिर मैं राघव के साथ गाँव छोड़कर शहर में रहूंगी। मेले जाने को सब तैयार थे, तभी मुझे कुछ याद आया- ”तुम चलना शुरू करो, मैं तुम्हारी हेमा चाची को भी लेकर आती हूँ।” बक्से से राघव की दी ”नई धोती” निकाल मैं हेमा के घर चल दी। वह भी तो बरसों से मेले नहीं गई, न ही उसने ”नई धोती” पहनी। ननद, जेठानी की पुरानी धोती पहन कर तो मेले में नहीं जायेगी वो। आज ”नई धोती” पहनकर ही मेरे साथ जायेगी।

अब यह गाँव छूट जायेगा- वैसे भी खेत-खलिहान के अलावा इतने बरसों में यहाँ कुछ रह भी नहीं गया है। कितने ही घर खाली खण्डहर हो गये हैं। बस, खेतों की पहरेदारी करते बड़े बुजुर्ग, मेरी जैसी जिन्दगी जीती चार-पाँच औरतें, नाम मात्र के जानवर-यही अब गाँव है।

सच बताऊँ तो कितनी ही बार लगा- काश तुम एक बार आते। अब तो तुमसे पूछे जाने वाले सवाल भी मुझे याद नहीं रहे। पर पिछले साल जब नारायणी का घरवाला तीस साल बाद वापस लौटा तो उसे देखकर मैं डर गई थी। काला पड़ा कंकाल-सा, खाँसी से दोहरा होता, डरावनी आँखों के साथ…. मैंने देवता को याद किया था- ”ना, तुम कभी न लौटना”। तभी मैंने मन बना लिया था, मैं गाँव छोड़कर बच्चों के पास चली जाऊंगी। तुम कभी लौटे तो भी मैं तुम्हारा सामना कभी नहीं करना चाहूँगी-कभी भी नहीं।
(Story Uttrayani)
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