पिंकी की मम्मी

स्वाति मेलकानी

तीसरी मंजिल की सीढ़ियाँ तंग थी। निशा सोच रही थी कि अगर पंकज हर बार की तरह बड़ा सा बैग लेकर आएगा तो उसे बैग को सीढ़ियों से ऊपर पहुंचाने में परेशानी होगी। साल में एक बार छुट्टी पर आने वाले फौजी साल भर के प्यार और सामान को बैग में भरकर एक ही बार में पहुंचा देने का प्रयास करते हैं। पिछली बार पंकज को यह नया किराये का घर पसन्द नहीं आया था। उसने कहा था, ”यहां बाजार में बहुत शोर है, न जाने क्यों तुमने यहां कमरा ले लिया, जबकि तुम्हें खुद एकान्त पसंद है।”

पर निशा ने काफी सोच समझकर यह घर किराये पर लिया था। जब से पिंकी पैदा हुई तब से वह किसी वीरान और अकेली जगह पर रहने की बात ही नहीं सोच पाती। रोज सुबह नौ बजे उसे ऑफिस जाना होता है और शाम पाँच बजे तक घर वापस पहुँचती है। तीन साल की पिंकी दिन भर कामवाली के भरोसे छूटी रहती है। बाजार से दूर रहने पर उसे कोई कामवाली नहीं मिल पाती जबकि यहां आने पर उसे आसानी से एक औरत मिल गई जो साढ़े तीन हजार रुपया महीना में दिन भर पिंकी की देखभाल करती है। जिस दिन निशा की छुट्टी तो कामवाली की भी छुट्टी।

निशा रोज सुबह ऑफिस जाने से पहले पिंकी के लिये खाना, दूध और फल रखकर जाती है। कामवाली उसे दोपहर में खिलाकर सुला देती है। एक बार पड़ोसी बता रहे थे कि कामवाली सारे फल खुद खा जाती है, पर निशा के पास पिंकी की देखभाल के लिए और कोई विकल्प नहीं है। इतने कम पैसों में कोई भी कामवाली दिनभर बच्चे की रखवाली नहीं करना चाहती। इतना पैसा तो आजकल दो घंटे में चार घरों के बर्तन मांजकर भी मिल जाता है। फिर छोटे बच्चे को हर किसी के भरोसे पर नहीं छोड़ सकते।

पंकज फौज में है और निशा सरकारी दफ्तर में क्लर्क है। पंकज के मां-बाप बूढ़े हैं और दोनों छोटे भाई कॉलेज में पढ़ रहे हैं। पिंकी की देखभाल के लिए कोई साथ नहीं आ सकता। कई बार निशा को लगता है कि अगर उसकी एक छोटी बहिन होती तो वह उसे कैसे भी मनाकर अपने पास बुला लेती। इससे उसे पिंकी की देखभाल में बहुत सहूलियत होती। पर जो नहीं है, सो नहीं है, उसके बारे में क्या सोचना। निशा रोज सुबह पांच बजे उठकर मशीन की तरह सारे काम करती है। साढ़े आठ बजे तक पिंकी की मालिश, नहलाना, और नाश्ता कराकर तैयार कर देती है। कामवाली को साढ़े आठ बजे का समय दिया है। पर वह हमेशा देरी से आती है। अगर नौ बजने में पांच मिनट तक भी वह पहुंच जाये तो निशा दौड़ती-भागती ऑफिस पहुंच ही जाती है।

आज पंकज आने वाला है। निशा की नींद सुबह चार बजे टूट गई। पंकज ने फोन पर बताया था कि वह आठ बजे तक पहुंचेगा पर निशा सुबह छ: बजे से ही कई बार बालकनी के नीचे झांक आई है। बेचैन रहने की उसकी पुरानी आदत है।
(Story by Swati Melkani)

सात बज चुके थे। पिंकी अभी तक सो रही थी। निशा ने पिंकी के पास जाकर उसके सिर को सहलाया। पिंकी का निर्दोष चेहरा और सपनीली आंखें निशा में प्राण भर देती हैं। पिंकी के आने से उसे अपने अस्तित्व की नई सार्थकता हासिल हुई थी। ऑफिस और घर की दोहरी जिम्मेदारियों के बावजूद निशा हर सुबह पिंकी को देखकर खुद को नई ऊर्जा से भर लेती है। ऑफिस से घर पहुंचते ही पिंकी का मुस्काता चेहरा उसकी दिन भर की थकान को गायब कर देता है। जब से पिंकी बोलने लगी है तब से उसने न जाने कितनी बार भाषा के पहले आविष्कारक को हजारों साधुवाद दे डाले हैं। पिंकी के जन्म से पहले उसे अपने पति पंकज की कमी बहुत खलती थी, पर पिंकी के आते ही वह इतना व्यस्त हो गई कि पंकज की स्मृतियाँ खुद ही कम होने लगीं। वह रोज दौड़ते हुए ऑफिस जाती और छुट्टी होते ही भागते हुए घर आती। पिंकी के अलावा किसी और के लिए उसके पास कोई समय नहीं था। ऑफिस के दोस्त, सहकर्मी सब पीछे छूट गये थे। उसकी एक बेटी थी जो हर वक्त उसके वजूद को अपनी ओर खींचती थी। पंकज कई बार खीजते हुए कहता था, ”अब तो तुम्हारी बेटी ही सब कुछ है, मेरी तो कोई कीमत ही नहीं रही।”

पर इस बार पंकज का इंतजार कुछ ज्यादा ही लम्बा लगा। निशा ने पंकज के पसंदीदा छोले पूरी तैयार कर दिये। आठ बज गया था, वह खुद भी ऑफिस के लिए तैयार हो गई। सवा आठ तक पंकज आ गया। उसने आते ही पिंकी को गोद में उठा लिया। पिता आखिर पिता ही होता है। इतने महीनों बाद मिलने पर भी पिंकी ने अपने पापा को पहचान लिया और हंसकर उसकी गोद में चली गयी। पंकज दो दिन से लगातार सफर करके आया था। उसे चाय का कप थमाते हुए निशा ने कहा, ”तुम्हारे लिए छोले-पूरी बनाई है। अभी गर्म हैं, जल्दी खा लेना। कामवाली आज नहीं आयेगी, पिंकी का ध्यान रखना।”

”तुम भी खाकर जाओ” पंकज ने कहा।

”अभी देर हो रही है। बाद में आकर खाऊंगी। मैं जल्दी लौटने की कोशिश करूंगी।” कहते हुए निशा दरवाजे से बाहर आ गई।

आज तो घर पर ही नौ बज गये थे। ऑफिस घर के पास ही है। ”काश आज इतवार होता।” निशा को आज का दिन ज्यादा ही लम्बा लग रहा था। पौने पांच बजे वह घर के लिए निकली। दुकान से सब्जी और दही लेकर तेज कदमों से घर की ओर बढ़ी। सीढ़ियों में उसकी सांस फूलने लगी। पर इस वक्त उसे एक मिनट की भी देरी नामंजूर थी। कितने समय बाद पंकज आया है और सुबह की हड़बड़ी में दो घड़ी साथ बैठने का भी वक्त नहीं मिला।
कमरे का बाहरी दरवाजा खुला था। पंकज सो रहा था। निशा के आने की आहट से वह जाग गया।
”ओह, तुम आ गई।” पंकज ने आंख मलते हुए कहा।
”हाँ, सफर से बहुत ज्यादा थक गये हो ना।” निशा ने सब्जी का थैला मेज पर रखते हुए कहा। फिर चारों ओर नजरें घुमाकर
ली, ”पिंकी कहां है?”
”पूरे दिन भर मेरे साथ खेलती रही। एक मिनट के लिए आराम नहीं करने दिया” पंकज शिकायती लहजे में बोला।

”हाँ, पर वो है कहाँ? कहीं नीचे तो नहीं छिपी है।” निशा झुककर चारपाई के नीचे देखने लगी। घर पहुंचते ही उसे पिंकी का चेहरा ना दिखे तो वह बेचैन हो जाती थी।
(Story by Swati Melkani)

”यहाँ नहीं है। अभी आधा घण्टा पहले सुरेश चाचा आये थे, वही अपने साथ घुमाने के लिए ले गये।” पंकज ने बताया।
”क्या?” निशा चौंक गई, ”पर तुमने उसे जाने क्यों दिया?”
”अरे, अभी आ जायेगी। उन्होंने खुद उसे घुमा लाने की बात कही थी। मैने भी सोचा कि चलो ठीक ही है। नींद के मारे मेरी आंखें जल रही थी। वो बस अभी उसे वापस ले आएंगे। तब तक तुम जरा मेरे पास तो बैठो।” पंकज ने निशा का हाथ अपनी ओर खींचते हुए कहा।
”तुमने उसे क्यों जाने दिया? उसे घूमना ही था तो तुम उसे घुमा लाते। ऐसी भी क्या नींद? रात को तो तुम्हें सोना ही था। बेचारी बच्ची, रोज पूछती थी कि पापा कब आएंगे। और एक तुम हो कि एक दिन भी उसका ध्यान नहीं रख सके।” निशा आवेश में आकर बोली।
”अरे, तुम तो बेवजह नाराज हो रही हो। पिंकी को मैंने दिनभर अपने साथ ही खिलाया। सुरेश चाचा खुद ही मिलने चले आए और बस अभी-अभी उसे लेकर गये हैं।” पंकज ने मनाते हुए कहा।

निशा कमरे से बाहर आ गई, उसने बालकनी से नीचे देखा। गली की किसी दुकान में पिंकी नहीं दिखाई दी। सुरेश नाम का यह आदमी पंकज के रिश्ते का चाचा है पर उम्र में उससे कुछ साल ही बड़ा होगा। रिश्ते के हिसाब से वह निशा का चचेरा ससुर लगता है। पर निशा उसे बिल्कुल पंसद नहीं करती। उसकी शादी के दिन मंडप में सुरेश ने कुछ भद्दी बात कही थी जो निशा ने सुन ली। तब से उसके सामने पड़ते ही निशा असहज हो जाती है। उसे सुरेश चाचा का अपने घर आना कतई पसंद नहीं। पंकज ने उस आदमी के साथ पिंकी को नहीं जाने देना था। निशा भीतर आई और पंकज से बोली, ”तुम सुरेश चाचा को फोन करो और पिंकी को अभी वापस बुलाओ, मुझे डर लग रहा है।”

”तुम्हें किस बात का डर लग रहा है? तुम बात-बात में इतना परेशान क्यों हो जाती हो? पिंकी अभी आ जाएगी। तुम एक मिनट मेरे करीब आ जाओ। मैं एक साल बाद घर आ रहा हूँ और तुम हो कि बस …..।” पंकज बिस्तर पर लेटे-लेटे निशा को छेड़ते हुए बोला।
निशा चीख पड़ी, ”मैं कहती हूँ उन्हें अभी फोन करो। मेरी पिंकी को बुलाओ। निशा की चीख सुनकर पंकज उठकर बैठ गया। ”तुम्हें हुआ क्या है? इतनी छोटी सी बात को इतना बड़ा क्यों बना रही हो? मेरे पास सुरेश चाचा का नम्बर नहीं है। तुम्हारे पास है तो तुम खुद ही फोन कर लो।”
”मेरे पास उसका फोन नम्बर नहीं है। मुझे उस आदमी के नम्बर की कोई जरूरत नहीं है। यह सब तुम्हारी गलती है। तुमने पिंकी को क्यों भेजा?” निशा कहते-कहते कांपने लगी।
पंकज उसके अचानक बदले व्यवहार से आश्चर्यचकित था। वह उसके करीब आकर बोला, ”मैं थका हुआ था। मैने सोचा कि इस बहाने कुछ देर पिंकी घूम आएगी और मैं भी आराम कर लूंगा। वो लोग बस आते ही होंगे। तुम परेशान मत होओ।” पंकज निशा को शान्त करते हुए बोला, ”अब एक कप चाय पिला दो, प्लीज।” निशा रसोई में गई। सिंक जूठे-बर्तनों से भरा हुआ था। उसने गैस पर चाय के लिए पानी रखा। फिर तुरन्त बाहर आई और बोली, ”वो अभी तक आए क्यों नहीं? एक बार तुम जाकर देख आओ?”
(Story by Swati Melkani)

”अरे क्या देख आऊँ?” पंकज झल्लाते हुए बोला, ”मैं कह रहा हूँ कि बस आते ही होंगे पर तुम सुनो तब ना। तुमने तो मेरे आने से पहले ही तय किया था कि मुझसे बात-बेबात झगड़ना है।”

पंकज को नाराज होता देख निशा दोबारा रसोई में चली गई। चाय का पानी उबलने लगा था। उसने खौलते पानी में चाय की पत्तियाँ डाली तो बेरंग पानी लाल होने लगा। न जाने क्यों उसे देखकर निशा को लाल खून की याद आ गई। उस पांच साल की लड़की का खून जिसकी लाश नदी पार के जंगल में एक हफ्ते बाद मिली थी। पंकज के अचानक कन्धे में हाथ रखने से वह डर गई, ”क्या हुआ है तुम्हें? चाय कब से उबल रही है? देखो, चाय का सारा पानी सूख गया।”

”पिंकी आ गई क्या?” निशा ने पूछा।
पंकज ने उसे कंधों में पकड़ते हुए कहा, ”क्या बात है निशा? तुम्हें हुआ क्या है?”
”सुनो, तुम उसे ढूँढ लाओ। उसे जल्दी घर ले जाओ।” वह पंकज से याचना के स्वर में बोली।
”तुमने तो बस एक ही रट लगा रखी है। मैं जानता हूँ कि तुम सुरेश चाचा को पसंद नहीं करती, पर किसी के लिए मन में इतना द्वेष रखना बहुत बुरा है।”पंकज ने गुस्से से कहा।
निशा ने गैस बंद की और रसोई से बाहर आ गई। उसने अपनी चप्पलें पहनी और कमरे से बाहर निकलने लगी।
”रुको, कहाँ जा रही हो? तुम्हें क्या हो गया है। मेरी बात तो सुनो, अजीब सनकी औरत है, कुछ समझने को तैयार ही नहीं। बस एक जिद पकड़कर बैठ गई है़……”
निशा तेजी से सीढ़ियां उतरने लगी। पंकज देर तक बोलता रहा। दूसरी मंजिल के शर्मा जी के घर का दरवाजा बंद था। निशा ने दरवाजा खटखटाया। मिसेज शर्मा बाहर आई। उन्होंने अपने होंठ औपचारिक मुस्कुराहट के लिए खोले ही थे, कि निशा बोल पड़ी, ”आपने पिंकी को देखा?”
बिना किसी अभिवादन के अचानक पूछे गये सवाल से मिसेज शर्मा चौंक पड़ी। ”पिंकी, नहीं यहां तो नहीं आई।” उन्होंने निशा को भीतर चलने को कहा, पर वह मुड़ी और तेजी से सीढ़ियाँ उतर कर पहली मंजिल पर आ गई।

पहली मंजिल पर परचून की दुकान थी। दुकान में भीड़ थी। निशा दो आदमियों के बीच से जबरन भीतर घुस गई। उसने काउंटर के दोनों ओर पिंकी को खोजा। दुकानदार कुछ हिसाब जोड़ रहा था। निशा अधीर हो उठी, ”भाई साहब, मेरी पिंकी इधर आई थी क्या?” हिसाब में मशगूल दुकानदार ने उसे नहीं सुना। उसने दोबारा ऊँचे स्वर में पूछा। ”भाई साहब, मेरी पिंकी यहां आई थी क्या?” दुकानदार का हिसाब गड़बड़ा गया। उसने एक नजर ऊपर देखा और टालते हुए बोला, ”नहीं मैडम, यहां नहीं आई।”
निशा बाहर आ गई। एक छोटी लड़की दुकान से बाहर खड़ी थी। शायद उसकी माँ भी दुकान के भीतर की भीड़ में शामिल थी। निशा ने जोर से कहा, ”ये किसकी बच्ची है? इसे अकेले बाहर क्यों छोड़ रखा है? इसका हाथ पकड़ लो।”
(Story by Swati Melkani)

बच्ची की माँ बाहर आई और अजीब नजरों से निशा को घूरते हुए बच्ची का हाथ पकड़ लिया। उन्हें भीतर जाता देख निशा को लगा कि वह लड़की जिसकी लाश नदी पार के जंगल में मिली थी, इसी बच्ची के बराबर रही होगी। ”ओह, कितना बुरा हुआ था उसके साथ।” निशा अपने भीतर बोल उठी। जब उसने अखबार में उस लड़की की लाश देखी तो वह चार रातों तक सो नहीं पाई थी। उसे बार-बार लगता था कि सारी गलती उस लड़की की माँ की थी। उसे अपनी बेटी का ध्यान रखना चाहिए था। उसे इस तरह अकेला नहीं छोड़ना चाहिए था। काश उसकी मां उसका ध्यान रखती। सभी मांओं को अपनी बेटियों का ध्यान रखना चाहिए। निशा के मन में उथल-पुथल मची हुई थी। वह गली के दोनों ओर की दुकानों को हैरत से टटोल रही थी। पर कोई चेहरा ना तो सुरेश चाचा का था और ना ही पिंकी का। वह आगे बढ़ रही थी कि तभी एक रिक्शे से टकरा गई।

”कहाँ की जल्दी है मैडम?” रिक्शेवाला रुककर बोला। रिक्शे के हैंडल से निशा की कोहनी छिल गई। उसने रिक्शे पर बैठी दोनों सवारियोंं पर नजर डाली और आगे चल दी।
कुछ साल पहले एक आठ साल की लड़की स्कूल से घर लौट रही थी। उसने रिक्शे पर बैठी अकेली सवारी से पूछा, ”अंकल आप अकेले हैं?, मैं भी साथ चलूँ। रिक्शे का आधा किराया मैं दे दूंगी।”
”हाँ-हाँ, आ जाओ। मैं तो जा ही रहा हूँ। पैसों की कोई बात नहीं।” रिक्शे पर बैठे आदमी ने मुस्कराकर कहा। लड़की बैठ गई। उसने अपना स्कूल बैग निकालकर गोद में रख लिया। लड़की खुश थी कि आज उसने रिक्शे के चार रुपये बचा लिये। उसकी मां रोज सुबह उसे रिक्शे के लिए पैसे देकर कहती थी कि ”अगर किसी के साथ आने को मिले तो देख लेना। किराया आधा-आधा बांट लेना।”

”पर ये अंकल तो पैसे लेने से मना कर रहे हैं, पूरा ही टिकट बच गया।” लड़की मन ही मन खुश हो रही थी। रिक्शा चलने लगा। कुछ देर बाद लड़की को अपने स्कूल बैग के नीचे सरसराहट महसूस हुई। साथ बैठे अंकल का पैर लड़की की स्कर्ट के भीतर उसकी जाँघो को छू रहा था। लड़की सीट के एक कोने की ओर सिकुड़कर बैठ गई। कुछ ही देर में उसे फिर से सरसराहट का अहसास हुआ। इस बार उसने देखा कि अंकल का दाहिना हाथ उसके बांयें पैर को छू रहा था। अंकल सामने देख रहे थे।, लड़की को लगा कि शायद अनजाने में अंकल का हाथ एक तरफ आ गया था। पर तभी वह हाथ उसकी जांघों में सरकने लगा। लड़की को एक अजीब बैचेनी महसूस हुई। वह समझ नहीं पा रही थी कि अंकल सामने देखकर उसकी जाँघों को क्यों सहला रहे हैं। उसका मन रोने को होने लगा। रिक्शा चल रहा था। वह बैठी रही। उसने रुआंसी होकर कहा, ”अंकल आप यह क्या कर रहे हैं?” अंकल चुप रहे। लड़की को लगा कि शायद उन्होंने सुना नहीं। अचानक वे उसकी जांघों को जोर से मलने लगे। लड़की डर गई। लड़की ने दोबारा कहा, ”अंकल, आप मेरे पैरों में क्या कर रहे हैं?” इस बार अंकल ने सुन लिया वे उसकी ओर मुस्कुराकर बोले, ”अरे कुछ नहीं बेटा, तुम आराम से बैठी रहो। सामने की ओर देखो।”
(Story by Swati Melkani)

रिक्शा सड़क पर दौड़ रहा था और अंकल का हाथ लड़की की जांघों पर। रिक्शा रुकते ही वह उछलकर नीचे उतर गई। ”अरे सुनो, चलो तुम्हें चॉकलेट खिलाता हूँ।” अंकल भद्दी हंसी हंसते हुए फुसफुसाकर बोले।
”नहीं,” लड़की चीखी और घर की ओर दौड़ पड़ी।
रिक्शेवाले से टकराने पर निशा को अपने बचपन की यह घटना याद आ गई, उसका मन घृणा से भर उठा। उसे लगा कि अगर
ज वह आदमी मिल जाए तो वह उसके मुंह पर थूक देगी।
पिंकी कहीं नजर नहीं आ रही थी।
”निशा, कहां भागी जा रही है,” एक दुकान पर खरीददारी कर रही रश्मि दीदी ने उसे रोक कर पूछा।
”दीदी, आपने कहीं पिंकी को देखा?” निशा ने अधीरता से पूछा, उसके चेहरे की घबराहट देखकर रश्मि दीदी ने उसका हाथ पकड़ लिया।
”तू इतना परेशान क्यों लग रही है?” क्या हुआ पिंकी को?
”कुछ नहीं, अभी जरा जल्दी में हूँ” उनका हाथ छुड़ाते हुए निशा आगे बढ़ गई।
रश्मि दीदी के मायके की ही थी वह लड़की, जिसकी लाश नदी पार के जंगल में मिली थी। वह लड़की अपने मामा की शादी में गई थी। वहीं से उसे किसी ने उठा लिया। पुलिस खोजती रही पर कोई सुराग हाथ नहीं लगा। एक हफ्ते बाद जंगल में उसकी निर्वस्त्र लाश मिली। उसके साथ बलात्कार हुआ था। पांच साल की लड़की के साथ बलात्कार हुआ था। पांच साल की लड़की की मौत बलात्कार के बाद खून के रिसने से हुई थी।

निशा ने सोचा कि काश उस लड़की का एक्सिडेंट हुआ होता या फिर वह नदी में डूबकर मर जाती। या उसे कोई जानलेवा बीमारी लगती और उसकी जान ले लेती। या उसकी मां खुद उसका गला घोंट देती ….. पर उसे बलात्कार से नहीं मरना था। उसे जीना था या फिर ….. किसी दूसरी तरह से मरना था।
ऑफिस में कई दिनों तक चर्चा रही। रशीदा कह रही थी, ”पांच साल की तो बात ही क्या? तीन साल, दो साल, डेढ़ साल, यहां तक कि छ: महीने की लड़कियों के साथ भी दुष्कर्म के वाकये आये दिन होते रहते हैं। कई मामलों में तो अपना सगा बाप ही …..।”
”छी,” निशा चीख पड़ी थी।

बाजार में घूमते हुए उसकी बैचेनी बढ़ने लगी थी। उसे किसी अनहोनी का अंदेशा होने लगा। वह पिंकी को पुकारने लगी। उसे लगा कि बाजार के शोर में भी पिंकी उसे सुन लेगी। पर जवाब में कोई आवाज नहीं आई। उसे शोर से चिढ़ हुई। उसे भीड़ पर गुस्सा आया। वह सोचने लगी कि जिस शादी की पार्टी में वह पांच साल की लड़की गायब हुई थी, वहां भी ऐसी ही भीड़ और शोर रहा होगा जो इस वक्त इस बाजार में है। वह लड़की चीखी होगी, उसने अपनी मां को पुकारा होगा, वह रो-रोकर निढाल हो गई होगी। पर शादी के बैण्ड बाजे और डीजे के शोर में कोई उसकी चीख नहीं सुन पाया होगा। यहां तक कि उसकी मां ने भी उसकी पुकार नहीं सुनी होगी। उसे उस मां की लापरवाही पर क्रोध आया। उसने सोचा कि ”बेटी तो आखिर मां की ही होती है। सिर्फ अपनी मां की। और किसी की नहीं।” उसे खुद पर क्रोध आया। उसे हर लापरवाह माँ पर क्रोध आया। उसे शादियों में बजने वाले डीजे पर क्रोध आया। उसने सोचा कि शादियों में डीजे बजाने की जरूरत ही क्या है। क्या जरूरत है दिखावे की, बैण्ड बाजों की, शोर शराबे की। आंखें चौंधियाने वाली उन तेज लाइट्स की जिसमें अपनी ही बच्ची न दिखाई पड़े। ऐसी भीड़ को जुटाकर क्या फायदा, जिसमें एक पांच साल की मासूम बच्ची गुम होकर एक अधेड़ बलात्कारी के हाथ लग जाये। उसे बाजार, भीड़, शादी, बैण्ड, लाइट, डीजे हर चीज से घृणा हुई।
(Story by Swati Melkani)

शाम रात की तरफ जा रही थी। दुकानों की अंतिम पंक्तियां पीछे छूटने लगी, किसी ने पीछे से निशा को पुकारा, ”पिंकी की मम्मी। ओ, पिंकी की मम्मी।” वह लड़खड़ाकर रूक गई जैसे किसी तेज रफ्तार गाड़ी में अचानक ब्रेक लगा हो।
”कौन,.़.कौन हैं?” उसने पलटकर पूछा।
”अरे पिंकी की मम्मी, कहां भागी जा रही हो?” निशा ने देखा कि पुकारने वाली डब्बू दर्जी की बीबी सुनीता है जो उसके पुराने घर के पास रहती थी।
”सुनो, तुमने मेरी पिंकी को देखा क्या?” निशा ने बड़ी उम्मीद से पूछा।
”अरे तुम तो कब से हमारी तरफ नहीं आई। याद है तुमने पिंकी के लिए एक फ्रॉक सिलाने दी थी। दो हफ्ते पहले से तैयार पड़ी है। कभी आकर ले जाना। कहो तो हम ही भिजवा देंगे।” सुनीता बोली।
”नहीं, मैं खुद लेने आऊँगी। तुम उसकी फ्रॉक को संभालकर रखना। मेरी पिंकी उसे जरूर पहनेगी। वह तो अभी छोटी बच्ची है। फ्रॉक पहनने वाली एक छोटी बच्ची। उसके साथ कोई इतना बुरा करने की सोच भी कैसे सकता है। माँ की गोद की बच्चियों को कोई कैसे अपनी हवस भरी नजरों से देख सकता है। नहीं, नहीं, यह नहीं हो सकता। सारे अखबार झूठे हैं। टी0वी0, रेडियो, सब झूठे हैं। क्या एक तीन साल की बच्ची के साथ कोई …..।”
निशा ने सुनीता का हाथ अपने दोनों हाथों से पकड़ा और बेहताशा बड़बड़ाने लगी। उसके अप्रत्याशित व्यवहार से सुनीता डर गई। ”पिंकी की मम्मी, तुम्हें क्या हुआ है? तुम्हारा शरीर एकदम ठंडा पड़ गया है। पर तुम्हारा चेहरा, पसीने से तर है। हमने पिंकी की फ्रॉक संभालकर रखी है। जब चाहो आकर ले जाना।”
निशा ने उसका हाथ और जोर से अपनी दोनों हथेलियों के बीच दबा लिया, ”हाँ, तुम संभाले रहना मेरी पिंकी की फ्रॉक, मैं उसे कल ही लेने आऊँगी। मेरी पिंकी ठीक होगी। उसके साथ कोई कुछ गलत नहीं कर सकता। कोई सोच भी कैसे सकता है। अरे छ: महीने पहले तक तो वह मेरा दूध पीती थी। उसके साथ कोई कुछ नहीं करेगा। मैं जरूर आऊँगी तुम्हारे पास। अपनी पिंकी को भी लाऊँगी। तुमसे और नये-नये कपड़े बनवाऊँगी, अपनी पिंकी के लिए। लाल, हरे, नीले, रंग-बिरंगे, ढेर सारे। मेरी पिंकी नई-नई फ्रॉक पहनकर परी जैसी लगेगी। तुमने तो उसे देखा है ना। तुम तो जानती हो कि मेरी पिंकी कितनी मासूम है। उसे कुछ नहीं होगा। कोई कुछ नहीं करेगा।”

निशा की आंखें छलकने लगी। उसका शरीर कांपने लगा। सुनीता कुछ भी नहीं समझ पा रही थी। उसने अपना एक हाथ छुड़ाकार निशा के कंधे पर रखा और बोली, ”पिंकी की मम्मी, तुम्हारी तबियत ठीक नहीं लगती। तुम घर जाओ। देखो अंधेरा भी होने लगा है। हमें भी घर जाना है। बच्चे राह देखते होंगे।”
(Story by Swati Melkani)

हाथ छुड़कार सुनीता आगे चल दी। निशा ने देखा कि दुकानदार अपनी दुकानें समेटने लगे हैं। चलते-चलते वह नदी के पुल तक आ गई थी। उसने नीचे झुककर नदी को देखा। उसे लगा कि नदी विपरीत दिशा में बह रही है। ढलान से चढ़ाई की तरफ। उसने अपनी ठंडी हथेलियों से अपने गाल थपथपाये और आंखों को मलकर आसमान की ओर देखने लगी। दो तीन तारे उग आये थे। उसने एक तारे के टूटने की दुआ की। उसने अपनी पिंकी की सलामती की दुआ की। उसने लाखों पिंकियों की सलामती की दुआ की। वह आंखें बंद करके पुल किनारे की दीवार के नीचे बैठ गई। दस मिनट यूं ही बीत गये। अंधेरा गहराने लगा। निशा को लगा कि शायद आज प्रलय की रात है। आज के बाद हर सुबह अंधेरी होगी। कल सुबह कोई सूरज नहीं उगेगा। कोई फूल नहीं खिलेगा। चारों ओर अंधेरा होगा। सिर्फ अंधेरा, घनघोर अंधेरा। जहाँ कोई किसी का चेहरा नहीं पहचानेगा।

”पिंकी की मम्मी, तुम घर लौट जाओ।” सुनीता की आवाज फिर उसके कानों में गूंज उठी। ”हाँ, उसे लौटना चाहिए। उसे घर लौट जाना चाहिए।” भारी कदमों को घसीटती हुई, निशा घर की ओर चलने लगी। अंधेरा बढ़ चुका था। अब वह किसी को नहीं खोज रही थी। अंधेरे में कुछ नहीं दिखता। अंधेरे में कोई नहीं मिलता।
मकान की सीढ़ियों तक पहुंचकर निशा को लगा कि उसका रोम-रोम अनंत थकान में डूब गया है। उसके पैर जमीन में गड़ गये थे और उसका दिमाग कहीं रास्ते में ही गिर गया था। वह अपनी पिंकी को ढूंढने गई थी। पर पिंकी कहीं नहीं मिली। वह अकेली लौट आई है। ”अब वह कहां जाएगी? वह अकेली कहाँ जायेगी?” उसे यकीन हो गया कि उसने पिंकी को खो दिया है। ”अब उसे कहीं नहीं जाना है। किसी को नहीं खोजना है।” वह पहली सीढ़ी पर बैठ गई। उसने दीवार से सर लगाया और आंखें बन्द कर ली।

उसने देखा कि वह एक अंजान शहर में दौड़ रही है। राह चलता हर चेहरा उससे टकराता है पर उनमें से कोई चेहरा पिंकी का नहीं है। अचानक उसका पैर एक निर्वस्त्र लाश पर पड़ता है। लाश किसी बच्ची की है। सैकड़ों आवाजें आ रही हैं। एक आवाज बताती है कि इस बच्ची को किसी ने बलात्कार के बाद मार डाला। लाश उल्टी पड़ी है। लाश की शिनाख्त नहीं हो पाई है। वह लाश को पलटाकर उसका चेहरा देखती है। वह पिंकी नहीं है। निशा चीख पड़ती है, ”यह पिंकी नहीं है, यह मेरी पिंकी नहीं है।” वह दौड़ रही है। वह पिंकी को पुकार रही है, ”पिंकी, पिंकी ……”

”मम्मी,” ऊपर वाली सीढ़ी पर पिंकी खड़ी थी, ”उठो मम्मी, आप कहाँ गई थी?” पिंकी बोली।
निशा ने आंखें खोली, जैसे किसी गहरी नींद से जगी हो। उसने देखा पिंकी उसके करीब आ रही थी। साथ में पंकज भी था।
”तुम कहाँ चली गई थी? अपना फोन भी नहीं ले गई। मैं कितना परेशान हो रहा था। अब यूं कब तक सीढ़ियों पर बैठी रहोगी? चलो, ऊपर चलो।” पंकज उसे उठाते हुए बोला।

पर वह बैठी रही। उसने पिंकी को अपने सीने से लगा लिया। वह उसे बेतहाशा चूमने लगी। ”तू कहाँ चली गई थी मेरी बच्ची। तुझे कुछ हो जाता तो मैं क्या करती?” उसके आंसुओं से पिंकी का चेहरा भीग गया। पर वह बोलती रही। ”मैंने तुझसे कहा था ना कि अकेले कहीं नहीं जाते। मैंने बताया था ना कि किसी अनजान के हाथ से टॉफी नहीं लेते। मैंने कहा था ना कि अपनी मम्मी के अलावा और किसी के आगे कपड़े नहीं खोलते। मैंने बताया था ना तुझे। मैंने कितनी बार कहा था। बोल, कहा था ना ……।”

निशा उसके सारे शरीर को टटोलकर देखने लगी। ”तू ठीक है ना। तू बिल्कुल ठीक है ना। मेरी बेटी, मेरी पिंकी, तू ठीक है ना। हाँ, तू बिल्कुल ठीक है। तुझे कुछ नहीं हुआ। किसी ने कुछ नहीं किया। अब मैं तुझे कभी नहीं जाने दूँगी। तू मेरे पास रहेगी, मैं तेरा ध्यान रखूँगी। मैं हमेशा तेरे साथ रहूँगी। मेरी बच्ची़……।”
पड़ोसी अपनी छतों से झाँक रहे थे। मिसेज शर्मा फुसफुसाकर बोली, ”आज पिंकी की मम्मी को न जाने क्या हो गया है।”
पिंकी की मम्मी हँसती रही। पिंकी की मम्मी रोती रही। सहमी हुई पिंकी अपनी मम्मी की गोद में दुबक गई।
(Story by Swati Melkani)

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