शाहीनबाग: संविधान और भारतीय लोकतंत्र का सुनहरा अध्याय

Shaheen Bagh Protest Report

-गिरिजा पाठक

15 दिसंबर को संसद में नागरिकता संशोधन कानून पास होता है, गृहमंत्री अमित शाह कहते हैं,’’यह पड़ोसी देशों पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान से आए परेशान शरणार्थियों (मुसलमानों को छोड़कर) को शीघ्र नागरिकता देने का कानून है। संसद में संबोधन के दरमियान ही गृृहमंत्री एक और टिप्पणी करते हैं,’इसके बाद एऩआऱसी़ भी संसद में पेश होगा़ नागरिकता संशोधन कानून के दायरे से अन्य पड़ोसी देश -श्रीलंका, बर्मा (म्याँमार), भूटान या रोहिंग्या शरणार्थियों को बाहर रखा गया है़ भाजपा नागरिकता संशोधन कानून से आगे बढ़कर जो करना चाह रही थी, उसे अमली जामा पहनाने से पहले ही जनता ने मंशा को भांप लिया।
(Shaheen Bagh Protest Report)

नागरिकता संशोधन कानून को लाए जाने में अपनाई गई प्रक्रिया और उसके पास होते ही समूचा उत्तऱपूर्व आंदोलित हो गया आंदोलन का असर यह था कि कुछ ही दिन बाद गोहाटी जाने वाले जापान के प्रधानमंत्री शिंजो आबे और प्रधानमंत्री मोदी को अपने पूर्व निर्धारित कार्यक्रम को स्थगित करना पड़ा. गृहमंत्री अमित शाह और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को भी अपने उत्तरपूर्व के कई कार्यक्रमों को स्थगित करना पड़ा। इसके बाद नागरिकता संशोधन कानून (सीएए),एनपीआर और एनआरसी के खिलाफ आंदोलन ने राष्ट्रव्यापी रूप ले लिया। पर्यवेक्षक बताते हैं कि आजादी के बाद यह पहला आंदोलन है, जिसमें उत्तरपूर्व से लेकर दक्षिण तक का समाज शामिल है। उत्तर प्रदेश, कर्नाटक, दिल्ली, हरियाणा सहित विभिन्न राज्यों, विशेषकर भाजपा शासित राज्यों में सरकारों ने आंदोलन का दमन करने की कोशिश की। कुछ राज्यों में तो कई आंदोलकारियों को जान से भी हाथ धोना पड़ा।

दमन उत्पीड़न का सबसे क्रूर रूप उत्तर प्रदेश में देखने को मिला, जिसमें धरना-प्रदर्शन के न्यूनतम मौलिक अधिकार को भी सरकार ने स्थगित कर दिया है। शांतिपूर्वक धरना-प्रदर्शन कर रहे लोगों को निशाना बनाकर गोलियां चलाई गईं। उन्हें विभिन्न गंभीर धाराओं में गिरफ्तार किया जा रहा है। जब तक न्यायालय से प्रभावित को न्याय मिलता है, तब तक पुलिस पूछताछ के नाम पर विभिन्न तरीकों से उसका हौसला तोड़ चुकी होती है। बड़ी नामी हस्तियों, जिनमें उ.प्र. के पूर्व आई जी़ एस़ आऱ दारापुरी, इलाहाबाद उच्च न्यायालय के एडवोकेट और इंसाफ मंच के संयोजक मो़ शोएब, अभिनेत्री और कांग्रेस नेता सदफ जफर, संस्कृतिकर्मी दीपक कबीर, बनारस के एक्टिविस्ट दंपति एकता शेखर व रवि शेखर, सीपीआई, सीपीएम और सीपीआई (एमएल) से जुड़े दर्जनों नेताओं को बिना किसी आधार के गिरफ्तार किया गया और उनके साथ सांप्रदायिक और अमानवीय सलूक हुआ, उससे स्पष्ट हो जाता है कि इस दौर में उत्तर प्रदेश में आम आदमी पुलिसिया राज में किस कदर खौफ में जी रहा है।

भाजपा की केन्द्र और राज्य सरकारें एक ओर दमन के जरिए मुसलमान समुदाय में एक असुरक्षा और भय का महौल बना रही हैं, दूसरी ओर हिंदुओं में यह संदेश ले जा रही हैं कि मुसलमान, नागरिकता संशोधन कानून के खिलाफ देश भर में दंगा और उपद्रव फैलाना चाहते हैं। ऐसा करते हुए उनकी योजना अपने हिंदुत्वादी ऐजेंडे के तहत हिंदुओं का ध्रुवीकरण करना है। इसीलिए उ.प्र. में 13 दिसंबर की शुक्रवार को जुम्मे की नमाज के बाद बड़ी संख्या में मुस्लिम समुदाय ने जगह-जगह प्रदर्शन किया तो उसे संभालने/शांत करने के बजाए उत्तेजित करने की कोशिशें हुईं। जगह-जगह असंगठित भीड़ उत्तेजित भी हुई और उसकी प्रतिक्रिया में सोचे-समझे तरीके से पुलिस ने लाठीचार्ज, आँसू गैस का प्रयोग किया तो भीड़ की ओर से भी इसके जवाब में पत्थरबाजी हुई। इस उत्तेजना को संभालने के बजाए पुलिस ने बढ़ाने का काम किया। उत्तर प्रदेश की घटनाओं में विभिन्न फैक्ट फाइंडिंग रिपोर्टों में यह बात सामने आई कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश विशेष रूप से मुजफ्फर नगर, बिजनौर, सहारनपुर, रामपुर में पुलिस ने अपेक्षाकृत संपन्न मुसलमानों के घरों को निशाना बनाया और सांप्रदायिक गालियां दे पाकिस्तान चले जाने की बात करते हुए घरों में बुरी तरह तोड़-फोड़ की। पुलिस ने जगह-जगह उत्तेजित समूहों पर गोली चलाई, जिसे शुरूआत में वह नकारती रही लेकिन जैसे-जैसे दमन की परतें खुलती गईं पुलिस-प्रशासन के पास इसे स्वीेकार करने के अलावा कोई चारा नहीं था।
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15 दिसंबर को कालिंदी कुंज इलाके में जब प्रदर्शन की आड़ में आम नागरिकों और यहां स्थित जामिया मिलिया इस्लामिया विश्वविद्यालय के छात्रों पर पुलिस ने बर्बर तरीके से हमले को अंजाम दिया उससे यह बात और स्पष्ट हो गई। सीएए, एनपीआर, एनआरसी के खिलाफ पूरे देश में चल रहे प्रदर्शनों के क्रम में 15 दिसंबर को शाहीन बाग में भी लोगों ने प्रदर्शन किया। इसे पुलिस ने रोकने की कोशिश की और यहीं से पुलिस और प्रदर्शनकारियों में तनाव बढ़ा, जिसका परिणाम लाठीचार्ज,आंसू गैस और गोली चालन के रूप में सामने आया। इससे आंदोलनकारियों में उत्तेजना बढ़ी और प्रतिक्रिया में आंदोलनकारियों (जिन्हें मीडिया का बड़ा हिस्सा सभी जगह उपद्रवियों- दंगाइयों के रूप में दिखा और संबोधित कर रहा है) की ओर से भी पत्थरबाजी शुरू हुई। यहीं से पुलिस ने अपने दमन की परिधि में नागरिकों के साथ-साथ विश्वविद्यालय के अंदर पुस्तकालय में अध्ययनरत छात्रों को भी लिया जिनका आंदोलन से कोई लेना-देना नहीं था। निर्दोष छात्रों पर बर्बर पुलिस दमन की कहानी अब सभी जानते हैं।

इसके बाद पूरे देश में मुस्लिम समुदाय सहित लोकतांत्रिक मूल्यों में विश्वास रखने वाले सभी नागरिकों ने सरकार की इस प्रतिक्रिया को समझने और उसका जवाब देने के लिए अपने आंदोलन के तेवरों को अहिंसात्मक-लोकतांत्रिक बनाने की पूरी कोशिश की। जिसका परिणाम शाहीनबाग-जामिया आंदोलन के दमन के दूसरे दिन से सामने आया और अबुल फजल इंक्लेव तथा शाहीनबाग की कुछ महिलाओं और जामिया विश्वविद्यालय के छात्र-छात्राओं ने मिलकर केन्द्र सरकार के जनविरोधी कानून के खिलाफ संयमित-सुसंगठित धरना शुरू किया, जो शीघ्र ही एक व्यापक जन आंदोलन के रूप में बदल गया। सबसे महत्वपूर्ण बात इसमें महिलाओं का होना था। यह भी महत्वपूर्ण है कि महिलाओं के नेतृृत्व में समाज का सबसे ऊर्जावान तबका- युवा इसके साथ जगह-जगह जुड़ गया। वह चाहे जामिया हो या जेएनयू, इलाहाबाद, बनारस, हैदराबाद या फिर अलीगढ़ अनगिनत विश्वविद्यालय और शहर हैं, जो इस आंदोलन को ताप दे रहे हैं।
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भारत का संविधान
उद्देशिका
हम भारत के लोग, भारत को एक सम्पूर्ण प्रभुत्व-सम्पन्न, समाजवादी, पंथ-निरपेक्ष, लोकतंत्रात्मक गणराज्य बनाने के लिए तथा उसके समस्त नागरिकों को :
सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक न्याय,
विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता,
प्रतिष्ठा और अवसर की समता
प्राप्त करने के लिए,
तथा उन सब में व्यक्ति की गरिमा और
राष्ट्र की एकता और अखंडता
सुनिश्चित करने वाली बंधुता बढ़ाने के लिए
दृढ़संकल्प होकर अपनी इस संविधान सभा में आज तरीख 26 नवम्बर, 1949 ई़ (मिति मार्गशीर्ष शुक्ला सप्तमी, संवत् दो हजार छह विक्रमी) को एतदद्वारा इस संविधान को अंगीकृत, अधिनियमित और आत्मार्पित करते हैं।

सीएए, एनपीआर, एनआरसी को सामने लाते हुए संघ-भाजपा की कोशिश थी कि प्रधानमंत्री मोदी के दूसरे शासनकाल में जब वह बड़े बहुमत से सत्तासीन हुई है तो वह अपने एजेण्डे को आगे बढ़ाना चाहती है। आम लोगों के लिए साठ वर्ष बनाम पांच वर्ष के नारे को देने वाले प्रधानमंत्री मोदी के दूसरे कार्यकाल की खुशी ज्यादा देर स्थाई नहीं रही। देश के युवा-छात्र पहले से ही आंदोलनरत थे लेकिन चारों ओर र्आिथक बदहाली ने समाज के हर हिस्से को परेशान कर दिया है। स्पष्ट तौर पर देखा जा सकता है कि पिछले दौर में बदहाल किसान आत्महत्या कर रहा था तो आज नौजवान अपने सामने बढ़ रहे संकटों से लगातार आत्महत्या कर रहा है। हाल में आए आंकड़ों ने इस दु:खद सच्चाई को उजागर किया है कि अब देश में किसानों से ज्यादा नौजवान आत्महत्या की ओर बढ़ रहे हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक साउथ ईस्ट एशिया क्षेत्र में भारत में युवा आत्महत्या-दर सबसे अधिक है।
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मौजूदा सरकार आम जन के जीवन में गहराते जा रहे सवालों को हल करने में पूरी तरह असफल रही है, जिस कारण संकट लगातार बढ़ रहा है। इसलिए वह नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) एनपीआर और एनआरसी को सामने लाकर एक तीर से दो शिकार करना चाहती है। राष्ट्रीय स्तर पर अल्पसंख्यक, दलित, आदिवासी समुदायों के साथ ही देश के लोकतंत्र और गंगा-जमुनी तहजीब में विश्वास रखने वालों ने भाजपा के इन प्रयासों को संविधान विरोधी माना और इसके खिलाफ खड़े हुए। मुसलमानों में विशेष रूप से महिलाओं में इस आंदोलन के खिलाफ जो लड़ाकू तेवर दिखे उसकी उम्मीद एवं आकलन किसी ने नहीं किया था।

अभी कुछ ही महीने हुए जब प्रधानमंत्री मोदी को मुस्लिम महिलाओं को तीन तलाक से निजात दिलाने वाले एक मसीहा के रूप में पेश किया जा रहा था, आज वे महिलाएं कड़ाके की ठंड में अपने बच्चों के साथ शाहीनबाग की सड़कों में हैं। पिछले कई सालों बाद रिकार्ड तोड़ सर्दी में मुस्लिम महिलाओं ने आंदोलन की जो गर्मी पैदा की वह लोकतांत्रिक मूल्यों- संविधान और देश की गंगा-ज़मुनी तहजीब के लिए फिक्रमंद किसी भी नागरिक के लिए एक सुखद अहसास है। आप शाहीनबाग आइए, पांच साल के बच्चे को गोद में बैठाए तब्बसुम से लेकर अठहत्तर साल की अम्मा फातिमा आपको नजर आ जाएंगी। कभी घर के अंदर काला लबादा ओढ़े महिलाएं-लड़कियां आज शाहीनबाग में गालों में तिरंगा पेंट किए, माथे पर तिरंगे की पट्टी बांधे, मुट्ठी लहराती नारे लगा रही हैं।

शाहीनबाग पहुंचते ही आपको मुख्य सड़क पर जनसैलाब के अतिरिक्त कुछ नजर नहीं आएगा। दाएं-बाएं, आगे-पीछे जहां भी आप जाएंगे, सभी जगह से दोपहर में अपना कामकाज निपटाकर इलाके के लोग विशेषकर महिलाएं बच्चों को गोद में लिए या अंगुली पकड़े शाहीनबाग मुख्य धरना स्थल की ओर बढ़ रहे हैं, लेकिन मुख्य स्थल से काफी दूर उन्हें रुक जाना होता है। स्वयंसेवक जो इस आंदोलन में स्वत: अपने लिए भूमिका तलाश लेते हैं, वे पूरी सतर्कता से कोशिश करते हैं कि सभी बुजुर्गों और महिलाओं के लिए इस आपा-धापी में जितना संभव हो जमीन पर बैठने की व्यवस्था कर दी जाए।

मंच से दो बच्चे संविधान की प्रस्तावना पढ़ रहे हैं और सामने मौजूद जनसैलाब उसे दोहरा रहा है। आजादी के बाद यह पहला मौका होगा जब भारत के संविधान की प्रस्तावना को अनगिनत बार पढ़ा-समझा गया होगा। नसरीन जो जामिया की छात्रा है, से संविधान की प्रस्तावना के बारे में पूछने पर उसका जवाब दंग करने वाला होता है। जब नसरीन से मैंने पूछा कि ‘‘प्रस्तावना पढ़ने का मकसद क्या है़’’? कुछ क्षण मेरे चेहरे को देखने के बाद वह जवाब देती है-‘‘यह सी़ए़ए़, एऩपी़आऱ और एनआरसी का जवाब है।‘‘कैसे’’? ‘‘क्योंकि हमारा संविधान देश में किसी भी तरह धार्मिक या जातीय आधार पर भेदभाव करने की इजाजत नहीं देता और यह सरकार इसे ही बदल देना चाहती है।’’ ‘‘क्यों’’? फिर नसरीन जवाब देती है, ‘‘क्योंकि यही वह रास्ता है जिसके माध्यम से वह हमारे हिंदू भाइयों को हमारे खिलाफ खड़ा करना चाहती है’’। अचानक बीच में ही मुमताज बोल पड़ती है, ‘‘उन्होंने जामिया और शाहीनबाग के शांतिपूर्ण जलूस को उकसाया ही इसलिए है कि ऐसा करके वह हिंदू-मुसलमान की अपनी राजनीति खेल सकें। अगर प्रधानमंत्री बार-बार यह कहते हैं कि सी़ए़ए़ से उनकी नागरिकता पर कोई आंच नहीं आएगी तो वही प्रधानमंत्री विरोध-प्रदर्शन करने वालों को पहनावे के आधार पर पहचानने की बात कर इसमें स्पष्ट सांप्रदायिक विभाजन का संदेश देते हैं।’’
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यह सच्चाई है कि मोदी-शाह सरकार ने देश भर में शाहीनबाग- जामिया – अलीगढ़ – मुजफ्फरनगर – लखनऊ – हैदराबाद – बंगलुरु – मंगलुरु  सहित विभिन्न जगहों को सीएए, एनपीआर, एनआरसी के विरोध को हिंदू मुस्लिम के अपने पसंदीदा ऐजेण्डे के रूप में आगे बढ़ाने की कोशिश की। भाजपा नियंत्रित मीडिया, सोशल मीडिया, ट्रोल आर्मी जिस तरह से एक संप्रदाय विशेष को लेकर लगातार सांप्रदायिक प्रचार में उतर रहे हैं तो प्रधानमंत्री पोशाक और गृृहमंत्री टुकड़े-टुकड़े गैंग या अर्बन नक्सल का सार्वजनिक संबोधन करते हुए इन्हें सबक सिखाने का अह्वान करते हैं।
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इसके जवाब में शाहीनबाग-जामिया दमन के बाद विरोध का जो सिलसिला शुरू हुआ, उसमें मुसलमान समाज विशेषकर महिलाओं ने एक ऐतिहासिक चुनौती पेश की है जो आज पूरे विश्व में एक मिसाल बन गई है। दो छोटे बच्चों की माँ इकरा, अबुल फजल की रहने वाली शाहीन मलिक, संभल की रहने वाली रूबी सैफी, आसमां सहित दर्जनों महिलाएं और बुजुर्ग महिलाएं (जो आंदोलन की दबंग दादियों के रूप में चर्चित हैं) चौबीसों घंटे आंदोलन में जुटी हैं। कड़ाके की ठंड के बावजूद अनगिनत महिलाएं हैं, जो घरना स्थल पर ही रहती हैं। एक नामी मल्टीनेशनल कम्पनी में काम करने वाली आरफा रोज अपनी ड््यूटी के बाद यहां धरने में जुट जाती है। बातचीत में बताती है ‘मैं तो अच्छी जिन्दगी जी रही थी, लेकिन जब देखा कि देश भर में लोग नागरिकता संशोधन कानून के खिलाफ बोल रहे हैं तो सोचा, ऐसा क्यों? कुछ इधर-उधर पढ़ा, लोगों से बातचीत की तो समझ में आया कि हमारा संविधान धर्म के आधार पर नागरिकता देने में किसी तरह का भेदभाव नहीं करता, फिर मुसलमानों को छोड़कर अन्य को नागरिकता देने की बात ही क्यों की जा रही है़ वह भी सिर्फ तीन पड़ोसी मुल्कों के नागरिकों को। यह तो सीधे़सीधे संविधान को ही बदला जा रहा है?’’ वह बड़ी साफगोई से जवाब देती है, ‘‘जनाब! जब आप मुल्क के आईन पर हमला कर रहे हैं तो इसका विरोध तो मुल्क के हर धर्मनिरपेक्ष नागरिक को करने की जिम्मेदारी बनती है।’’

विभिन्न घरों में काम करके अपने बच्चों की परवरिश कर रही सीमा के पति का देहांत हो चुका है। तीन बच्चों में सबसे छोटी नसीम 7 वर्ष की है, जिसे गोद में लिए सीमा भी आजादी और सी़ए़ए़ के विरोध में नारे लगा रही है। पूछने पर कि ‘‘इस ठंड में छोटी बच्ची के साथ वह यहां क्यों आई है?’’ वह मुझसे प्रतिप्रश्न करती है। ‘‘क्यों साब, इस महंगाई में जब मैं अपने बच्चों के नून तेल के लिए सुबह 5 बजे उठकर काम पर निकलती हूं तो यहां आने पर ठंड कैसी? हमने मोदी जी को वोट दिया इस वास्ते कि कुछ बेहतर होगा लेकिन काम मिलना कम हो गया है, महंगाई ने अलग ही परेशान कर रखा है, ऊपर से मोदी जी अब कागज मांगेंगे। हमारे पास कौनो कागज हंै जो हम उन्हें दे पाऐंगे। क्या इतने साल हमारे दादा-अब्बा इस देश में रहे, मेहनत- मशक्कत की। आज अब हमें कागज से बताया जाएगा कि हम देशी है कि विदेशी।’’ ’’यह कानून तो बाहरी देशों के नागरिकों को नागरिकता देने का कानून है फिर तुम्हें इससे क्यों डर लग रहा है?’’ इस सवाल पर इस कामकाजी महिला का जवाब यह बताने के लिए काफी था कि जनता आपके संकेतों-बातों को भली भांति समझती है और वह भाजपा के मॉब लिंचिंग, लव जिहाद, गौ रक्षा, बाबरी मस्जिद जैसे सवालों से लगातार टकरा रही है और धीरे-धीरे एक डर मुसलमानों के बीच आम हो चुका है कि भाजपा शासन की दूसरी पारी में हिंदू राष्ट्र के अपने एजेण्डे को लागू करने की ओर बढ़ रही है।

इस बात को स्पष्ट करते हुए जामिया में कानून की पढ़ाई कर रही नफीसा कहती है,‘‘सीएए, एनपीआर, एनआरसी के बारे में सरकार  प्रचार कर रही है कि यह हिंदुस्तान के मुसलमानों की खिलाफत नहीं करता। लेकिन आप मेरी बात नोट कीजिए कि यह कानून लाया ही इसलिए जा रहा है। संघ-भाजपा ने अपने हिंदू राष्ट्र के एजेण्डे पर काम करना शुरू कर दिया है।’’ नफीसा कहती है ‘‘यह सच है कि सी़ए़ए़ में किसी भारतीय नागरिक (मुसलमान) को नागरिकता से अलहदा नहीं किया जाएगा। लेकिन एनपीआर और एनआरसी के जरिए तो सरकार ही तय करेगी कि कौन नागरिक है? कौन नहीं? भाजपा सरकार ने समय-समय पर भारतीय मुसलमानों के खिलाफ जिस तरह से भयग्रस्त माहौल बनाया है, माब लिंचिंग से लेकर पश्चिमी उत्तर प्रदेश और पूरे देश में मुसलमानों को टारगेट बनाकर इस सरकार के पिछले और वर्तमान शासन में जो कुछ हुआ है और हो रहा है, उसको देखते हुए हर मुसलमान के अंदर भय है कि मोदी सरकार द्वारा लाए जा रहे इन प्रावधानों (कानूनों) के चलते हम असुरक्षित हो जाएंगे।’’ नफीसा के साथ ही शाहीनबाग धरने में शामिल कुसुम गर्ग से पूछने पर कि ‘‘क्या वह इस आंदोलन में अपनी दोस्त के समर्थन में आई है’’ कुसुम तपाक से जवाब देती है,’‘‘यह मेरा अपना आंदोलन है। 15 तारीख के बाद लगभग हर रोज यहां आ रही हूं।’’ वह पूछती है ‘‘जब जामिया में पुस्तकालय में पढ़ाई कर रहे छात्र पुलिस बर्बरता के शिकार हो जाते हैं तो कब कौन इस प्रशासन का शिकार बनेगा, कोई गारंटी है?’’ लेकिन सीएए – एनपीआर… प्रश्न पूरा होने से पहले ही कुसुम जवाब देती है-‘‘यह सरकार रोजगार के सवाल पर क्यों नहीं बोलती? जेएनयू में अचानक कई गुना फीस बढ़ा दी गई, क्यों? शिक्षा रोजगार महंगाई, र्आिथक मंदी से लोगों को निजात दिलाना क्या सरकार का काम नहीं होना चाहिए?’’ कुसुम अपनी ओर से सवाल दागती हैं-’’आप ही बताइए अचानक ऐसा क्या हो गया कि सी़ए़ए़, एऩपी़ए़, एऩआऱसी़ आज सबसे जरूरी मुद्दे हो गए?’’ फिर जवाब भी देती है-‘‘दरअसल सरकार हमें राहत देने वाले हर मोर्चे पर बुरी तरह फेल हो चुकी है़ उनके सामने बढ़ती बेरोजगारी-महंगाई-आर्थिक मंदी-महिलाओं पर लगातार बढ़ रहे अत्याचारों से निपटने की कोई इच्छाशक्ति नहीं बची है़ उनके पास हिंदू-मुसलमान का खेल ही इन सब समस्याओं को पर्दे के पीछे डालने का खेल है।’’
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आज शाहीनबाग लोकतंत्र में विश्वास करने वाले किसी भी नागरिक के लिए अपनी वास्तविक अभिव्यक्ति को पूरा करने वाले एक सपने की तरह हो गया है। यह सच है कि यहां मुसलमान महिला/पुरुषों की जमात ही अधिक है। इसी को देखते हुए भाजपा की लगातार कोशिश है कि इस संघर्ष को अपने प्रिय विषय हिंदू-मुसलमान में बदल दिया जाय। इस खतरे को शाहीनबाग की महिलाएं और नागरिक अच्छी तरह समझ रहे हैं। धरने में बड़ी संख्या में हर वर्ग से लोग समर्थन में आ रहे हैं। इस विशाल जलसे की बड़ी खासियत रही है कि इसने कट््टरपंथी और धार्मिक प्रतीकों, नारों और रहनुमाओं से सचेत रूप से अपने को दूर रखा है। ऐसा एक भी नारा या प्रतीक आपको यहां नहीं मिलता़ धरने में भाग ले रहे अनवर बताते हैं कि शुरूआत में मंच से कुरान की आयतों से लेकर धार्मिक नारे लगाने की कोशिशें हुईं, लेकिन महिलाओं ने धरने में इन प्रयासों को रोक दिया। आपको पूरे जलसे में संविधान की प्रस्तावना, तिरंगा और भारत का नक्शा तथा आम जन की कठिनाइयों से जुड़े प्रतीक नजर आएंगे। फैज-फिराक़-कैफी आज़मी-अली सरदार जाफरी-अदम गोंडवी-गोरख पांडे-बल्ली सिंह चीमा से लेकर देश-संविधान-लोकतंत्र को लेकर नई-नई रचनाएं लिखी-पढ़ी और गाई जा रही हैं।
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आजादी का नारा यानी सीएए, एनआरसी, सांप्रदायिक विभाजन, जातिवाद, पितृसत्ता, मनुवाद, भाजपा से आजादी, जैसी अनेकों अवांछित चीजों से आजादी का नारा 84 साल की गुलबानो से लेकर 8 साल के अकरम तक का सबसे प्रिय नारा है। इन्हीं के बीच आरव सिंघल, गौरव यादव, प्रिया रस्तोगी, सपना और रचना भी इन नारों को पूरे उत्साह से लगा और दोहरा रहे हैं। लोकतांत्रिक आंदोलन कैसे हमारी संवेदनाओं में मन के किसी कोने में दबी रचनाधर्मिता को सामने ले आता है, इसे महसूस करने के लिए सुनैना को सुनना दिलचस्प है। सुनैना कहती है-‘‘शौहर और बच्चों की परवरिश के अतिरिक्त तो हमने कभी कुछ सोचा ही नहीं। कभी किसी के सामने भी जाना है तो अपनी पहचान छुपाकर। आज इस आंदोलन ने बता दिया कि मेरा अपना भी कुछ होना चाहिए। आज ही मैंने जिंदगी में पहली बार जो भी मैं सोच रही थी उस पर लिखा और यहां सबको सुना भी दिया।’’
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आंदोलन किस तरह से पूरे समाज का रूपांतरण करता है यह देखना हो तो शाहीनबाग से लेकर इंद्रलोक – खुरेजी – सीलमपुर सहित उन दर्जनों इलाकों में चले जाइए जहां महिलाएं संघर्ष के मोर्चे पर आ गई हैं देश के बहुसंख्यक हिंदू समाज में अमूमन मुस्लिम समाज विशेष रूप से मुस्लिम महिलाओं के लिए बहुत सकारात्मक धारणाएं नहीं मिलतीं या फिर कहिए कि नकारात्मक सोच ज्यादा मौजूद है। लेकिन जैसे जैसे आंदोलन आगे बढ़ रहा है, हिंदू व अन्य समाज भी उनके साथ अंत:क्रिया में जा रहा है। खासकर छात्र – नौजवान – युवतियों में यह संख्या लगातार बढ़ रही है शाहीनबाग के इस आंदोलन के समन्वय में मुख्य भूमिका में रह रही महिलाओं में एक ऋतु कौशिक, जामिया की पूर्व छात्रा रही हैं और चारों पहर आंदोलन के बीच आंदोलन को समन्वित करने में जुटी हैं। प्रधानमंत्री मोदी जब इस आंदोलन को अलगाव में डालने के लिए सार्वजनिक रूप से आंदोलनकारियों की पहचान पहनावे के आधार पर करने की बात करते हैं तो इंदुलेखा हिजाब पहनकर सामने आती है और अपने आप को पहचानने की चुनौती देती है। जंतर मंतर में सीएए के खिलाफ हो रहे एक प्रदर्शन में एक लडकी ने पोस्टर पकड़ा है जिस पर लिखा है ‘शर्मा जी की लड़की भी यहां है, आप कहां हैं।
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नागरिकता संशोधन कानून, एनपीआर और एनआरसी के खिलाफ चल रहे इस आंदोलन में रचनात्मकता के नए नए आयाम उभरकर सामने आ रहे हैं जो इस बात की ताकीद करते हैं कि एक सशक्त और जीवंत रचना का महत्वपूर्ण आधार जनांदोलन होता है। नोएडा – दिल्ली संपर्क मार्ग 13 ए की सड़क शाहीनबाग के पास आंदोलनकारियों के प्रदर्शनस्थल में बदल गई है। अभी कुछ दिन पहले इसमें दोनों ओर वाहन फर्राटा भरते थे, लेकिन आज जहां सड़क के एक ओर प्रदर्शनकारी अपने जोश से लबरेज मुट्ठियां भींच नारे लगा रहे हैं,क्रांतिकारी गीत गा रहे हैं तो दूसरी ओेर कई नौजवानों – नवयुवतियों ने अपनी कूंची – रंग – पेंट से पूरी की पूरी सड़क को कैनवास बना दिया है। कोई चित्र ‘मुट्ठी में कलम को दबाए‘ सुरक्षाबलों के बूटों तले कुचला जा रहा है तो कहीं पर सोशल मीडिया विशेषरूप से वट्सएप के माध्यम से फैलाई जा रही अफवाहों पर व्यंग्य करते हुए वट्सएप यूनिवर्सिटी की कल्पना की गई है। एक जगह लोहे के तार बाड़ से एक डिटेंशन सेंटर बना है जिसमें भारतीय संविधान-गांधी-अंबेडकर-भगतसिंह को कैद दिखाया गया है़ यहीं फातिमा शेख-सावित्री बाई फुले नाम से पुस्तकालय भी खुल गया है जो विभिन्न तरह के प्रगतिशील साहित्य को पढ़ने के साथ ही विभिन्न विषयों पर विचार विनिमय का एक केन्द्र भी है।

पूरे आंदोलन में महिलाओं की उल्लेखनीय हिस्सेदारी है। जिस कारण उनके साथ छोटे-छोटे बच्चे आंदोलन के बीच बेफिक्र इधर-उधर खेलते नजर आ रहे हैं। इसे देख उसामा और वसुंधरा को एक आइडिया सूझा और उनके हुनर को आंदोलन और स्वयं उनके लिए तराशने का काम शुरू हो गया़ दोनों अपने दोस्तों के साथ किताब-कलम-पेंट से इन्हें सिखाने उतर पड़े। यह देख पपेट विशेषज्ञ अनुरूपा भी आगे आई तो मुंबई से प्रियंवदा अय्यर भी बच्चों के बीच पहुंच गई। अब बड़ी संख्या में बच्चे इस कवायद का हिस्सा बन रहे हैं और खेल-खेल में संविधान, लोकतंत्र और सद्भाव का पाठ पढ़ रहे हैं बच्चों के बीच प्रेमचंद-टैगोर-फैज अहमद फैज-नजीर-गोर्की सहित विभिन्न रचनाकारों को पढ़ाया गाया जा रहा है बच्चे पढ़ रहे हैं और स्वयं भी बहुत कुछ गढ़ रहे हैं। आज पूरे देश में शाहीनबाग, लोकतंत्र को बचाए रखने की लड़ाई में एक चमकता प्रतीक बन चुका है आंदोलन में सबसे महत्वपूर्ण यह रहा है कि इसके केन्द्र में पहली बार देश की अल्पसंख्यक समुदाय की महिलाएं शामिल रही हैं और नेतृत्व दे रही हैं जो कभी भी मुख्य धारा में नहीं रहीं और हाशिए में बनाई रखी गई, लेकिन जैसे ही वे बाहर निकली तो उन्होंने पूरे आंदोलन की फिजा बदलकर रख दी। इसी आंदोलन से यह उम्मीद भी जगी कि देश की गंगाज़मुनी तहजीब को ध्वस्त करने की जितनी भी कोशिशें हों, उतनी ही ताकत से जनता उसे बचाने भी उतरेगी.                 
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