राजा राममोहन राय: पुनर्जागरण के पुरोधा

Raja Ram Mohan Roy
जया पाण्डे

एक ऐसे समय में, जब भारत के बहुधर्मी, बहुसांस्कृतिक समाज पर प्रहार हो रहा हो, जब हमारे संविधान की  मूल भावनाओं को चोट पहुंचाई जा रही हो, असहिष्णुता हावी हो, उन समाज सुधारकों को याद करना बहुत जरूरी हो जाता है, जिनके अनथक प्रयासों से इस देश की बुनियाद डाली गई। यह एक आंदोलन था, जिसके अंदर कई सीपियां गुथी हुई थीं। वह पुनर्जागरण का दौर था, एक पीढ़ी थी जिसे जेम्स प्रथम की पुस्तक ‘हिस्ट्री ऑफ इंडिया’ में लिखी गई एक पंक्ति, ‘भारत को तो गुलाम होना ही था क्योंकि इस समाज में स्त्रियों की स्थिति अत्यंत-अत्यंत बदतर है।’ का जवाब देना था। राजा राममोहन राय उसी दौर के विचारक थे। राय इसी पुनर्जागरण के अग्रदूत माने जाते हैं। उन्हें आधुनिक भारत का जन्मदाता कहना अतिशयोक्ति न होगी। उस समय की पीढ़ी के लिए यह कशमकश थी कि क्या पाश्चात्य दर्शन से प्रभावित होकर स्वतंत्रता का मूल्य अपनायें और क्या भारत की अस्मिता को मिट जाने दें। इसका हल ढूंढा गया एक स्वर्णिम युग की परिकल्पना में। वैदिक युग स्वर्णिम युग था। यहां ज्ञान था, तर्क था, महिलाओं को अध्ययन का अघिकार था। बाद में आया अंधकार युग, जिसमें अंधविश्वास पनपा तथा तथा स्त्री-पुरुष विभेद पर आधारित समाज था। इस दौर में महिलाएं घर की चहारदीवारी के भीतर सिमट गईं। अब समय था फिर से जागने का, आवश्यकता थी सोए हुए समाज को जगाने की। राय संभवत: प्रथम विचारक थे जिन्हें पश्चिमी चुनौती का सामना करना पड़ा। वे बंगाल में जन्मे थे, पहला प्रांंत जो ब्रिटिश शासन के अंतर्गत आया। भारत के इस पहले विचारक से ही दो स्तरों पर संघर्ष प्रारंभ हो गया, जो आजादी प्राप्त होने तक चला। यह था अपने समाज की भेदभावपूर्ण और शोषणमूलक प्रवृत्ति के विरुद्घ लड़ना और साथ ही उन अधिकारों को प्राप्त करना जो अंग्रेज अपने लोकतांत्रिक राष्ट्र के नागरिक होने के नाते उपभोग कर रहे थे परंतु उन्होंने अपनी  औपनिवेशिक प्रजा को उन से वंचित किया हुआ था। (Raja Ram Mohan Roy)

राजा राममोहन राय का जन्म 22 मई 1772 में बंगाल प्रांत के वर्दवान जिले में एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था। उनके पिता रमाकांत राय राजपरिवार से जुडे थे। इनकी माता का नाम तारिणी देवी था। प्रारम्भ से ही इनकी रुचि विभिन्न धर्मों में थी। इन्होंने अंग्रेजी, अरबी, फारसी, संस्कृत, ग्रीक, हिब्रू तथा तिब्बती भाषाओं का ज्ञान प्राप्त किया। विभिन्न भाषाओं के साथ उन्होंने विभिन्न धर्मों का भी ज्ञान प्राप्त किया। हिन्दू, इस्लाम, ईसाई, बौद्घ तथा सूफी धर्म के सिद्घान्तों का राय ने गहन अध्ययन किया। इसी अध्ययन का परिणाम था कि वे रूढ़िवादी हिन्दुओं के अंधविश्वास को झेलने को तैयार नहीं थे। उन्होंने वेदान्त पर भी मजबूत पकड़ हासिल की। इसी के सहारे वे यह सिद्घ कर पाये कि इस समय जो अंधविश्वास है, उसका वेदों में कहीं उल्लेख नहीं है। वे नास्तिक नहीं थे, परन्तु हिन्दू धर्म के अन्धविश्वासों और कर्मकांडों से उन्हें चिढ़ थी। अपने प्रगतिशील विचारों के लिए उन्होंने 1828 में ब्रह्म समाज की स्थापना की।  इस संस्था के सहारे वे सती प्रथा के विरुद्घ आन्दोलन को मजबूत कर पाये। अपने घर में घटी एक घटना ने उन्हें झकझोर दिया। उनके बडे़ भाई की मृत्यु के पश्चात उनकी भाभी को सती होने के लिए बाध्य किया गया। वह रोती रही परन्तु उस स्त्री को जिंदा जला दिया गया। इस घटना से उनका किशोर मन अंदर तक दहल गया। अपनी भाभी की मर्मांतक चीख-पुकार उनका पीछा करती रही, वे हमेशा सुनते रहे वह पुकार, तुम मेरे भाई और संतान तुल्य हो, मुझे बचा लो ।

यह मध्यकाल की वह क्रूर प्रथा थी, जिसे हिन्दू समाज में सती प्रथा कहा जाता था। हिंदू धर्म में प्रचलित इस प्रथा के अनुसार पति की मृत्यु के बाद उसकी पत्नी को भी उसकी चिता पर जिंदा जला दिया जाता था। वस्तुत: यह मृत व्यक्ति की संपत्ति की प्रथम उत्तराधिकारी पत्नी को जीवित जला देने का षड्यंत्र था जिसे परंपरा का नाम दे दिया गया। 1815 में आत्मीय सभा की स्थापना कर तथा 1828 में ब्रह्म समाज की स्थापना के माध्यम से राय ने सती प्रथा के विरोध में व्यापक आंदोलन छेड़ दिया। उन्होंने वेदों और उपनिषदों के माध्यम से यह सिद्घ किया कि सती के नाम पर स्त्रियों की जो हत्या की जाती है, उसका वेदों में कहीं उल्लेख नहीं है। उन्होंने वेदों से कई उदाहरण दिए। अथर्ववेद 19:3:1 के मंत्र में विधवा नारी को सीख दी गई है, यह नारी अर्थात तेरी पत्नी धर्म का पालन करती है, वह पति के घर को ही पसंद करती है, हे मृत मनुष्य, तेरी मृत देह के समीप भूमि पर बैठी हुई है, उसे संतान और संपत्ति यहीं सौंप दे। अथर्ववेद के इस मंत्र का सार यह है कि पति की मृत्यु होने के बाद पत्नी को ही संपत्ति तथा संतान पर पूर्ण अधिकार है। अथर्ववेद इसी क्रम में अगले मंत्र में सीख देता है, हे मृत पति की धर्मपत्नी, तू मृत के पास से उठकर गृहस्थ लोक में आ। तू निष्प्राण पति के पास क्यों बैठी हुई है? अपने पाणिगृहीत पति से प्राप्त संतान का पालन-पोषण कर। अथर्ववेद में विधवा विवाह के समर्थन में मंत्र 9:5 :27-28 में कहा गया है कि जो विधवा स्त्री दूसरा विवाह कर पुन: पत्नी बनती है, वह तथा उसका पति एक ही गृहस्थी में सुखपूर्वक निवास करते हैं। इस प्रकार वे सिद्घ करते हैं कि वेदों में सती प्रथा का कहीं भी उल्लेख नहीं है, अपितु विधवा विवाह की सीख दी गई है। इस प्रकार राय ने सिद्घ किया कि वेदों में सती प्रथा जैसी अत्याचारी प्रथा नहीं थी। राय ने माना कि महिलाएं आर्थिक रूप से कमजोर होती हैं। पति की मृत्य के बाद उनका खर्चा कौन उठाए? इसलिए अच्छा है कि उन्हें जिंदा जला दिया जाय। इसलिए उन्हें आर्थिक रूप से सशक्त करना जरूरी है। राय ने हिंदू उत्तराधिकार कानून के संदर्भ में पुत्रियों को पिता की संपत्ति में एक चौथाई भाग देने का समर्थन किया। राय महिलाओं की शिक्षा तथा आर्थिक आत्मनिर्भरता को एक समाधान के रूप में देखते हैं। राय स्त्री को हीनता से देखने वालों के इस तर्क से सहमत नहीं थे कि स्त्रियों का ज्ञान सीमित होता है। वे भारतीय स्त्रियों को लीलावती, गार्गी, तथा मैत्रैयी के समान विदुषी बनने की प्रेरणा देते थे। राय का कहना था, ‘‘सती करने की प्रथा एक पाप है। पति का देहांत हो जाने के बाद शव के साथ ही उसकी पत्नी को जला देने को क्रूर हत्या ही कहा जाएगा। जरा सोचो! अगर सारी स्त्रियां मिलकर किसी स्त्री की मृत्यु के बाद उसके पति को जीवित चिता पर जला दें तो पुरुष समाज जो सती प्रथा की बात करता है, क्या इन स्त्रियों का समर्थन करेगा?’’

हालांकि उस समय भारत के अन्य भागों में सती प्रथा समाप्ति पर थी। परन्तु बंगाल में इसका प्रचलन था। 1823 के रिकर्ड के अनुसार 600 मामले अकेले बंगाल में ही थे। ब्रिटिश शासन ने भी प्रारंभ में सती प्रथा समाप्त करने में विशेष रुचि नहीं दिखाई। राजा राममोहन राय का लगातार दबाव बना रहा। विश्व जनमत में भी उस समय मानव अधिकारों व स्वतंत्रता का बोलबाला था । ऐसे समय में सती प्रथा बनाए रखने का कोई औचित्य नहीं था। उनके प्रयासों से 1828 में सती प्रथा विरोधी अधिनियम बना। इसका मुख्य श्रेय लार्ड विलियम बैंटिक को दिया गया, लेकिन राजा राममोहन राय की मेहनत के बिना यह संभव नहीं था। यह ब्रिटिश सरकार के नजरिये में परिवर्तन का प्रतीक था। सरकार को पता चल गया था कि अपनी प्रजा को सभ्य बनाये बिना वे यहां शासन नहीं कर सकते।

सती प्रथा को समाप्त करने के प्रयास में राय द्वारा जो लेख लिखे गए, वे प्रथा का अनौचित्य तो प्रमाणित करते ही हैं, साथ ही तत्कालीन स्त्री-पुरुष विभेद को भी रेखांकित करते हैं। यह राय की तर्कशीलता और गहन अध्ययन का परिणाम था कि उन्होंने इस सूक्ष्म विभेद को पहचाना जिसके तहत महिलाओं की स्थिति दोयम दर्जे की बन गई थी। अपने समय में समाज और पुरुष के समक्ष वे कई प्रश्न रखते हैं-

पहला, तुम उन्हें शिक्षा से वंचित रखते हो और साथ में उन्हें हीन भी बताते हो यह कैसा अन्याय है? 

दूसरा, तुम उन्हें शारीरिक रूप से कमजोर बताते हो लेकिन साथ ही आत्मदाह के लिए प्रेरित करते हो? बताओ! जो व्यक्ति जिंदा जलाए जाने की क्षमता रखता है वह शारीरिक रूप से कमजोर कैसे है?

तीसरा, तुम यानी पुरुष दो-चार विवाह कर सकते हो लेकिन दूसरी ओर एक महिला को पति की मृत्यु के पश्चात चिता में जलने के लिए धकेलते हो क्या वह इंसान नहीं? ऐसा भेदभाव क्यों?

चौथा, पुरुष स्त्री को धोखा देता है परंतु स्त्री पुरुष को धोखा नहीं देती। ऐसे उदाहरणों की संख्या अधिक है जिसमें पुरुष स्त्री के प्रति नैतिक नहीं रह पाता, जबकि एक स्त्री अपने साथी के प्रति अंत समय तक साथ निभाती है। समाज द्वारा ऐसा भेदभाव क्यों? विवाह के समय एक स्त्री अर्धांगिनी कही जाती है लेकिन विवाह के पश्चात उसकी स्थिति एक गुलाम की सी बन जाती है। एक गुलाम की तरह वह सुबह उठकर झाड़ू करती है, बर्तन धोती है, खाना बनाती है, खाना परोसती है, इस बीच अगर जरा-सी भी गलती हुई तो उसको खामियाजा भुगतना पड़ता है। चाहे पति गरीब हो या अमीर हर महिला को एक-सी स्थिति का सामना करना पड़ता है। तीन-चार पत्नियां होने की वजह से पत्नी अपने पति का मुंह भी कई दिनों तक नहीं देख पाती। राय चाहते थे कि सरकार ऐसा कानून बनाये जिससे कोई पुरुष एक पत्नी के रहते हुए दूसरा विवाह न कर सके। यह राय की संवेदनशील दृष्टि थी जिसने घर की चहारदीवारी के भीतर महिलाओं के प्रति होने वाले अत्याचार को पहचाना था। आज भी यदि स्त्रियों के प्रति इस प्रकार का अत्याचार होता है तो लोग इस अन्याय को समझ नहीं पाते।

राय स्त्री स्वतंत्रता की पैरवी करने वाले प्रथम विचारक माने जा सकते हैं। उन्होंने सामाजिक न्याय के संदर्भ में स्त्रियों पर पुरुषों के अत्याचार का घोर विरोध किया। उन्होंने बहु विवाह का विरोध किया। स्त्री की स्थिति को मजबूत करने के लिए उन्होंने महिलाओं की संपत्ति के अधिकार की वकालत की। उन्होंने हिंदू उत्तराधिकार कानून के संदर्भ में महिलाओं को पिता की संपत्ति का एक चौथाई भाग देने का समर्थन किया। ब्रह्म समाज के माध्यम से राय ने महिलाओं की स्थिति सुधारने के लिए संपत्ति के अधिकार, बाल विवाह समाप्ति और महिलाओं की शिक्षा के प्रसार में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। ब्रह्म समाज ने अंतर्जातीय  विवाह का समर्थन किया। 1832 में ब्रह्म समाज की स्थापना के बाद भारत में कई संस्थाएं महिलाओं की उन्नति के लिए स्थापित होती गई। संगठन के द्वारा महिलाओं के लिए ‘बोधिनी पत्रिका’ की शुरूआत भी की गई। इस संगठन के प्रयासों से 1872 में नागरिक विवाह कानून पारित किया गया जिससे अन्तर्जातीय विवाह एवं तलाक को कानूनी अधिकार मिल गया। स्त्री-पुरुष के लिए शादी की आयु 14 वर्ष तथा 18 वर्ष निर्धारित की गई।

राय की आलोचना भी हुई इसलिए कि उन्हें पाश्चात्य शिक्षा और अंग्रेजों की न्यायप्रियता पर विश्वास था। अमत्र्य सेन, जो कि राय के वंशज माने जाते हैं, मानते हैं कि स्त्रियों के लिए राय से अधिक कार्य ईश्वर चंद्र विद्यासागर और महादेव गोविंद रानाडे ने किया। लेकिन राय पहले विचारक थे जिन्होंने समाज की दिशा बदली। सती प्रथा को समाप्त करने में राजा राममोहन राय का योगदान भुलाया नहीं जा सकता। भारतीय राष्ट्रीयता की अनवरत धारा रही है प्रेस की स्वतंत्रता। इसका सूत्रपात राय से ही हुआ। राय प्रेस की स्वतंत्रता के बहुत बडे़ समर्थक थे। उनका कहना था कि इतिहास में ऐसा कोई उदाहरण नहीं मिलता जहां प्रेस की स्वतंत्रता के कारण क्रान्ति हुई हो। उन्होंने बांग्ला में ‘संवाद कौमुदी’ तथा फारसी में ‘मिरात-उल-अखबार’का संपादन किया।

राजा राममोहन राय एक अंतर्राष्ट्रीय हस्ती थे। अमेरिकी स्वतंत्रता पर प्रभाव डालने वाले थामस पेन से उनके पत्राचार थे। ब्रिटिश विचारक जेरेमी बेन्थम उनके दोस्त थे। स्पेन के उदारवादियों ने 1832 का संविधान उन्हें समर्पित किया था। राय एकेश्वरवादी थे। उन्होंने मूर्ति पूजा का विरोध किया। वे मानते थे कि ईश्वर एक है, वेद इस बात की पुष्टि करते हैं। बाइबिल और कुरान भी इसकी पुष्टि करते हैं। जैसा कि सी़ ए़ बेले ने लिखा  “राय भारत की स्वतंत्रता का प्रतिनिधित्व करने के साथ-साथ विराट मानवता की पहचान करने वाले पहले भारतीय थे ।” 1833 में मैनेन्जाइटिस से इंग्लैण्ड में उनकी मृत्यु हो गई। वे ब्रिस्टल में दफनाये गये। उनकी समाधि में ये वाक्य खुदे हुए हैं-    

“भारतीय जनों के सामाजिक, नैतिक और भौतिक कल्याण के लिए, सती प्रथा तथा मूर्ति पूजा का विरोध करने के लिए, उस परम सत्ता की महत्ता बताने के लिए राय के अनथक प्रयासों के प्रति देशवासियों के कृतज्ञतापूर्ण यादगार की कहानी यहां पर जीवंत है।“

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