कृष्ण चन्द्र मिश्रा की दो कविताएँ

पहाड़ों पर बसन्त

उत्तरायणी की मिठास अभी भूले ही नहीं
कि पंचमी आ गई
फागुन का स्वागत करते हुए
सजने लगे हैं कौथिग
बनने लगी है जलेबियाँ
बिकने लगे लड्डू, चौलाई के
शुरू हुआ भेट- भाटों (मुलाकातों) का सिलसिला
सबकी नजरें, मन में बंधी स्नेह की गठरी लिए
ढूंढ रही है खोलने वाले को
खेत से लाई हुई हरी जौ की, तिमिल के पत्ते में रखकर
पंडित जी, कर रहे हैं प्रतिष्ठा
धूप – दीप, रोली से
छिड़क रहे हैं अक्षत, गंगाजल
घर भर के नए कपड़ों में  
कर रहे हैं प्रतिष्ठा, होने वाली नई बहू के आंचल की
(Poems’s of Krishna Chandra Mishara)

माँ ने बड़ी शिद्दत से एक-एक पाई जोड़कर
अपनी नई बहू के लिए बनाए हैं –
नये ‘कपड़े, पायल-बिछुए’
पिता ने आज खोल दिया है
अपना खजाना
अपनी कुल जमा पूंजी से
सामर्थ्यानुसार बहुत स्नेह से
निकाले कुछ रुपए
रखे बहू के आंचल साथ, नए लिफाफे में
पंडित जी को दिया थाली भर अनाज
दक्षिणा के साथ
बच्चों को कौथिग जाने का खर्चा भी
माँ ने बड़े प्रेम से कलेऊ  बनाया है
अपने संमधीऊ  के लिए
भेजना है पूरी- प्रसाद
देवता तृप्त हैं दूध-घी, धूप से
(Poems’s of Krishna Chandra Mishara)

माँ ने-
सारे पकवान पहले उन्हीं को चढ़ाए हैं
ससुराली बहिनें आ रही हैं, मायके को
बहुएं, मायके को जा रही हैं- अपने
दाहिने हो रखे हैं गाँव के भूमिया- सिद्ध देवता
तभी तो बच्चों की खुशियाँ, फूल बनकर
जहाँ-तहाँ बिखर रही हैं
आंगन में बिटिया सी फुदक रही है ‘घिनौड़ी’
घुघुती आम की डाल में बैठी घूर रही है
बौज्यू, नये कुर्ता- सलवार, वास्कट पहने
कंधे में झोला, पीठ पर छाता लटकाये
लाठी टेके, जाने लगे हैं समधीऊ  को
गाय भैंसों के सींगों पर लग चुका है
तेल, सरसों का
बैलों को साल भर के लिए मिल गई है
नई ‘कौड़ियों की माला’
सुबह- सुबह मिल गए हैं पकवान उन्हें भी,
फाल्गुन के एक पैट को होगी ‘हलजोती’
पूजा होगी हल की, बैलों की
प्रसादी में बंटेगा घी, गुड़ हमें ……
बहुत खुश है- (भावी दुल्हन)
आज उसके लिए पहली बार
आ रहा है ससुराल से श्रृंगार
ढेर सारी दुआऐं, आशीष लेकर
सालों की साध, जैसे पूरी हो रही हो
जमीन पर नहीं पड़ते उसके कदम
(Poems’s of Krishna Chandra Mishara)

आखिर
जीवन में, विवाह सिर्फ एक बार होता है
उगने लगा है
उसके मन में प्रेम का बिरवा
रचने लगी है अपने मन में
सपनों का संसार,
बोलने लगा है घर की मुंडेर पर बैठा ‘कागा’
आज ये कागा भी कितना प्यारा लगता है सबको
व्यस्त हैं बिटिया के माँ- बापू
समधी के स्वागत की तैयारियाँ हो रही हैं
हो चुकी है- ‘घर आंगन की लिपाई- पुताई’
छुप चुका है- ‘घर का टूटा- फूटा सामान ओने- कोनों में,’
बिछ चुकी है- साफ चादरें- कालीन
घर – आंगन में
हुक्का- चिलम गर्म राख से मांजकर
चमकाया जा रहा है
बन रही चाय,
कट चुकी हैं सब्जियाँ, मसाले पीसे जा रहे हैं
आ चुकी है सहेलियाँ गाँव भर की
हो रहा है भावी दुल्हन का श्रृंगार
हो रही है चुहल, हँसी- मजाक
खुद को, आईने में देखकर
शर्मा रही है …..
बिटिया का श्रृंगार देखकर
धड़कने लगा पिता का कलेजा
भर आई है माँ की आंखें
भाई- बहिन एक पल को ही सही उदास हैं।
कि अब
बिटिया पराई हुई
लेकिन
ये खुशी के आँसू है
बिटिया के सौभाग्य की खुशी
लेकर
आ पहुँचा है बसन्त।
(Poems’s of Krishna Chandra Mishara)

पहाड़ पर बसंत का यथार्थ

फाल्गुन आ चुका है सूने पहाड़ पर
खिलने लगी फ्योंली, दूध भाती
महकने लगा धरती का बसंती आंचल
छाने लगी होली की रंगत
बिरादरी के बचे हुए ठूंठ से बुजुर्ग
मजबूर हैं,
खुद ही छूटती रस्मों रिवाजों को निभाने के लिए
पंचमी, शिवरात्रि, फुलदेयी
सब अकेले ही मनाने की आदत सी हो गई है
उन्हें
खुद ही फूल टीपते हैं
खुद ही बिखेरते हैं देहरियों पर
उन्हें पता है जीवन का कड़वा सच
(Poems’s of Krishna Chandra Mishara)

कि-
पंख लगे परिंदे से
घोंसला छोड़कर गये उनके लाडले
वापस नहीं आएंगे
आना भी चाहें तो आ नहीं पाएंगे
(महानगरी जाल में जकड़े वे रोबोट से
 कर रहे हैं नौकरियां बंधुआ मजदूरों-सी)
तरस चुकी हैं आँखें
पोते- पोतियों का चेहरा देखने को
बूढ़ी आंखों में छाया है बसंत,
इस बार फिर,
दो आंसू लाया है बसंत।
बिक चुका है पहाड़
खेत बंजर हो चुके हैं
वीरान हो चुके हैं गाँव
टूटे मकानों के दरवाजों पर
लटके हैं ताले
मेहल, बकौल, सेमल सा
फूल चुका है बसंत
अपनी ही जड़ों को भूल चुका है बसंत
आँगन टूट चुके हैं
ढह चुकी है दीवारें
जवाब दे चुका है सामथ्र्य बुजुर्गी आन का
आंखों से पानी बनकर बह चुका है बसंत
सड़क गड्ढों से भरी हैं
नौले धारे रीते हैं
गाँव में गुलदार घूम रहे हैं
अब गाँव कागजी नक्शों पर जीते हैं
गाँव – गाँव शराबियों सा फैल रखा है बसंत
फागुन ले गया सुख- चैन बसंत लाया असंत।
(Poems’s of Krishna Chandra Mishara)
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