कविताएं

ज्योत्सना मिलन

माँ
मैं ठीक-ठाक नहीं बता सकती
कैसी होती होगी माँ
जहाँ-जहाँ भी
उसे खोजा
वह नहीं थी
होता था
एक अंधेरा खोखल
बचपन में
माँ की जगह
और मैं चिल्लाती थी उसमें
”माँ… आँ”
डरा हुआ हाथ
टटोलता था तुम्हें
खोखल में
क्या पता
वहाँ माँ न हो
और अगर
माँ न हो तो पता नहीं क्या हो
तुम अपनी जगह
क्यों नहीं होती थी माँ?
तुम अगर होती
अपनी जगह
तो बाकी तमाम चीजें भी
होतीं
अपनी-अपनी जगह
मेरे लिए
हर चीज का अर्थ
माँ क्यों नहीं था
बचपन में भी।

रात
सबसे पहले
शुरू होता है माँ का दिन
मुँह अँधेरे
और सबके बाद तक
चलता है
छोटी होती हैं
माँ की रातें नियम से
और दिन
नियम से लम्बे
रात में दूर तक धँसे हुए
इसे कोई भी
दिन की घुसपैठ नहीं मानता
माँ की रात में
पैर सिकोड़कर
रोज सोती है
गुड़ी-मुड़ी माँ
बची-खुची रात में
पैर फैलाने लायक
लम्बी भी नहीं होती
माँ की रात!
poems of jyotsna milan

औरत
प्यार के क्षणों में
कभी-कभी
ईश्वर की तरह लगता है मर्द
औरत को
ईश्वर…. ईश्वर…..
की पुकार से
दहकने लगता है
उसका समूचा वजूद
अचानक
कहता है मर्द
‘देखो
मैं ईश्वर हूँ’
औरत
देखती है उसे
और ईश्वर को खो देने की पीड़ा से
बिलबिलाकर
फेर लेती है
अपना मुँह।

लगातार
एकाएक
अपने पैरों को देखा
तो
भर उठी दहशत से
बरसों पहले
जहाँ गाड़ा गया था
वहीं खड़ी थी मैं
जिसका
जो मन आया
टांगता चला गया
थैला, टोपी, अंगोछा
या
अपनी थकान
और लगता रहा सारे वक्त
कि मैं
चलती रही हूँ
लगातार।
poems of jyotsna milan
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