जागरूक हुए हैं पंचायत प्रतिनिधि

जया पांडे

अभी-अभी उत्तराखण्ड में पंचायत चुनाव सम्पन्न हुए हैं। जिला पंचायत अध्यक्ष चुनाव को हालांकि कांग्रेस की जीत के रूप में प्रर्दिशत किया जा रहा है, लेकिन वास्तव में यह चुनाव लोकसभा चुनाव से कई मायनों में भिन्न रहा। धन-बल की ताकत बहुत नहीं दिखी। जातीयता और बाहुबल की उपस्थिति भी नगण्य थी। उत्सवर्धिमता दिखाई दे रही थी। महिलाओं की भागीदारी अधिक थी। एक तरह से वह मुख्यमंत्री हरीश रावत के व्यक्तित्व व राजनीतिक कौशल का प्रभाव भी माना गया। पंचायत चुनाव एक तरह से अपनी जड़ों से जोड़ने का माध्यम भी दिखा क्योंकि काफी संख्या में प्रवासी उत्तराखण्डी अपने गाँव में वोट देने लौटे थे। यह चुनाव पूरी तरह स्थानीय मुद्दों पर आधारित थे। बिजली, पानी, विकास आदि प्रमुख मुद्दे थे।

ग्राम पंचायत की धारणा लोकतांत्रिक विकेन्द्रीकरण पर आधारित है। 73वें तथा 74वें संशोधन को एक मील का पत्थर माना जाता है। मूल संविधान में इसे नहीं जोड़ा गया था। उस समय डॉ. अम्बेडकर का मानना था कि इससे ग्रामीणजातीय संरचना और भी मजबूत होगी। अभी भी बहुत सारे ग्रामों में पंचायत के चुनाव जातीय आधार पर लड़े जाते हैं परन्तु और कुछ हो न हो, महिलाओं को इस बिल से काफी फायदा हुआ है। उत्तराखण्ड जैसे छोटे राज्य में 50,000 पदों का सृजन हुआ जिसमें से आधे से अधिक पद महिलाओं द्वारा भरे गये। ‘पद’ एक महत्वपूर्ण स्थिति है, वह भी निर्णय से जुड़ा पद। महिलाओं के जीवन में ऐसी स्थिति बहुत कम आती है, जब वे निर्णय लेती हैं। महिलाओं की जिन्दगी कत्र्तव्यों से अधिक जुड़ी रहती है, अधिकारों से कम। ‘पद’ अवश्य ही आत्मविश्वास बढ़ाता है। प्रारम्भ में वे भले ही कमजोर दिखाई दें लेकिन धीरे-धीरे उनमें आत्मविश्वास बढ़ता है। ‘पतिप्रधान’ नाम से उन पर व्यंग्य किया जा रहा है लेकिन यह ‘पद’ ही है जो कम से कम उन्हें ‘हस्ताक्षर’ से परिचित कराता है। अगला व्यक्ति उनके हस्ताक्षर के लिए तो उनका इन्तजार करेगा। यह देखने में आया है कि प्रारम्भिक कार्यकाल में वे भले ही अंगूठाछाप रहीं हों लेकिन दूसरे कार्यकाल में वे स्वयं निर्णय ले रहीं हैं, अपने दम पर जीतने वाली ‘महिला प्रधान’ भी बनी हैं। सब से बड़ी बात यह है कि इस बिल के माध्यम से अशिक्षित तथा वंचित को सत्तासुख या सत्ता सहभागिता मिली है। यह अध्ययन करना महत्वपूर्ण नहीं है कि महिलाओं के आने से राजनीति में क्या बदलाव आया, बल्कि यह महत्वपूर्ण है कि ‘पद’ प्राप्त करने के पश्चात एक महिला के व्यक्तित्व में क्या बदलाव आया। मैं ऐसी ग्राम प्रधानों से मिली हूँ जिनकी जिन्दगी सिर्फ घर तक सीमित थी, लेकिन पद प्राप्त करने के पश्चात वे मंच पर बैठती हैं, उन्हें समारोहों में बुलाया जाता है, उनका सम्मान होता है, यह उन्हें कहीं न कहीं  एक सुखद अनुभूति देता है, यह महत्वपूर्ण है।

73वें, 74वें संशोधन एक्ट में कई कमियाँ भी हैं। ग्राम सभा को विधायिका का दर्जा दिया गया है, परन्तु विधायिका जैसे अधिकार नहीं दिए गए। ग्राम पंचायत प्रत्यक्ष प्रजातंत्र का एक उदाहरण है, जिसमें गाँव के सभी वयस्क नागरिक सदस्य होते हैं। यहाँ दलीय आधार नहीं होता है; जैसे संसद को केन्द्र में तथा विधानसभा को राज्य में विधानमंडल का दर्जा दिया गया है और उन्हें कार्यपालिका पर अविश्वास प्रस्ताव लगाने का अधिकार दिया गया है, उसी प्रकार यहाँ ग्राम सभा को अविश्वास प्रस्ताव पारित करने का अधिकार होना चाहिए, ग्राम पंचायत को नहीं।
Panchayat representatives have become aware

73वें, 74वें संशोधन से यद्यपि 29 विषय पंचायत को दिए जाने थे परन्तु यह राज्य सरकार की मर्जी पर छोड़ दिया गया कि वह कितने विषय पंचायत को दे। परिणाम यह हुआ कि पंचायतों को बहुत कम अधिकार मिले हैं। कुछ ही राज्य हैं जहाँ पंचायतों को पूरे अधिकार मिले हैं। उत्तराखण्ड में अभी भी सिर्फ 14 विषय ही पंचायत को मिले हैं। उत्तराखण्ड का अभी तक पंचायत एक्ट नहीं बन पाया है, यह उत्तर प्रदेश के सहारे चल रहा है। पंचायत को सशक्त बनाने का एक तरीका यह हो सकता है कि पंचायतों को सीधे संविधान से अपनी शक्ति प्राप्त हो। संघ सूची, राज्य सूची की तरह पंचायत सूची भी हो। स्वास्थ्य, प्राथमिक शिक्षा, संसाधन आदि मामलों में पंचायतों का विभागों पर कोई अधिकार नहीं है। यही कारण है कि गाँव की पेयजल योजना से लेकर बच्चों की शिक्षा के लिए पंचायतों को राज्य सरकार पर निर्भर होना पड़ रहा है।

उत्तराखण्ड में ग्राम पंचायतों में विकास अधिकारी की कमी है। 130 ग्राम पंचायतों को नौ पंचायत अधिकारियों के सहारे छोड़ दिया है। एक बी.डी.ओ. के ऊपर 3 से 41 ग्राम पंचायतों की जिम्मेदारी है। इससे विकास कार्य प्रभावित हुए हैं। 73वें संविधान संशोधन में 3 ग्राम पंचायतों की जिम्मेदारी एक बी.डी.ओ. के ऊपर होनी थी लेकिन आज तक इस पर कोई अमल नहीं हो सका है। ग्रामीणों को परिवार रजिस्टर की नकल तथा जन्म-मृत्यु के प्रमाण पत्र तक समय पर नहीं मिल पा रहे हैं।

इतना जरूर है कि पंचायत प्रतिनिधि अपने अधिकारों के प्रति जागरूक हुए हैं। उन्होंने हर स्तर पर अपने संगठन बना लिए हैं। वे लगातार सरकार पर दबाव बनाए हुए हैं। मेरे हाथ में इस समय 7 मई 1993 का ‘पौड़ी टाइम्स’ है, समय वह जब यह एक्ट बना था। इस पत्र के सम्पादकीय के कुछ शब्द हैं, “इस प्रकार पंचायत राज संशोधन विधेयक के अनुसार अब पंचायतें वास्तविक रूप से स्वायत्त शासन की इकाइयों के रूप में कार्य कर पायेंगी। प्रत्येक भारतीय को अब अंदाजा होगा कि देश उसका है, शासन उसका है और निर्णय उसका है।” केरल और कर्नाटक जैसे ही राज्य हैं जहाँ ये शब्द साकार हुए हैं। वहाँ पंचायतें स्कूल चला रहीं हैं, डिस्पेंसरी का निरीक्षण कर रहीं हैं, वॉटर हारर्वेंस्टग कर रहीं हैं, सामूहिक खेती करवा रहीं हैं। इन राज्यों में 29 विषय पंचायतों को दिए गए हैं। उत्तराखण्ड को ऐसे राज्यों से सबक लेना चाहिए। उत्तराखण्ड में शिक्षित जनता है, जागरूक लोग हैं, महिलाएं सक्रिय हैं। इस बार चुनाव में जीतकर आए प्रतिनिधि उच्च शिक्षित हैं। 1011 पंचायत प्रतिनिधि निर्विरोध चुनकर आए हैं जो एक मिसाल है। हम उम्मीद ही कर सकते हैं पंचायतें सही दिशा में कार्य करेंगी।

लोकसभा और राज्यसभा की तुलना में पंचायत में लोग अधिक भावनात्मक रूप से जुड़े रहते हैं। बाहर से बुला-बुला कर वे वोट डलवाते हैं।

लोगों को माँग है कि यहाँ भी इलेक्ट्रॉनिक र्वोंटग मशीन (ई.वी.एम.) का प्रयोग होना चाहिए। मतपत्र पर चिह्न के साथ-साथ प्रत्याशी का नाम भी होना चाहिए। महिलाओं को दिए जा रहे आरक्षण से लोगों में नाराजगी नहीं है पर महिलाओं के नाम पर पतियों द्वारा किए जा रहे अनधिकृत हस्तक्षेप से वे खफा हैं। महिला प्रधान है पर क्षेत्र पंचायत सदस्यों की बैठक में पति जाता है। यहाँ पर सरकार द्वारा अनभिज्ञ महिला ग्राम प्रधानों के लिए कार्यशाला का आयोजन किया जाना चाहिए।

ग्राम पंचायत राज ने लोककल्याणकारी राज्य की अवधारणा को मजबूत किया है। पिछले दो दशकों में सरकारी महकमा सिकुड़ रहा है, बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ आ रही हैं, संस्थाओं का निजीकरण हो रहा है। वैश्वीकरण से रोजगार सृजित हुए हैं लेकिन जिस तरह का शोषण वहाँ हो रहा है उससे सरकारी विभागों का महत्व पता चलता है। सरकारी काम अवश्य ही सरक-सरक कर होते हैं, लेकिन ये उस वंचित और पिछड़े तबके की सेवा के लिए होते हैं, जो महंगी शिक्षा नहीं ले सकता। एक ऐसे देश में जहाँ एक तिहाई जनता गरीबी रेखा से नीचे है, वहाँ सरकार को एक ‘स्ट्रीट लाइट’ की भूमिका निभानी ही पड़ेगी। वहाँ हम निजी व्यवसायों पर पूरी तरह आधारित नहीं हो सकते। सस्ती शिक्षा, सस्ती सेवा तथा नौकरी की सुरक्षा सरकारी तंत्र से ही मिलती है। जहाँ तक भ्रष्टाचार का प्रश्न है, उसमें हर व्यक्ति लिप्त है। अपने-अपने हिस्से का भ्रष्टाचार हर कोई कर रहा है। भ्रष्टाचार हटाने के लिए ईमानदार प्रयास भी नहीं कर रहा है। महिला तथा दलित अधिकारों की जागरूकता के लिए इतने सारे विज्ञापन है पर कोई विज्ञापन नहीं है जो भ्रष्टाचार हटाने के लिए बनाया गया है। न ही पाठ्यक्रमों द्वारा ही इस बुराई के उन्मूलन के लिए प्रयास किए गए हैं। यह अवश्य है कि पिछले दो दशकों में जहाँ मुक्त अर्थव्यवस्था की ओर राज्य ने कोशिश की वहीं दूसरी ओर नरेगा, पंचायत राज, शिक्षा का अधिकार, सूचना का अधिकार जैसे अधिकारों ने आम जनता की स्थिति को मजबूत किया है। वर्तमान सरकार ने भी इसे जारी रखने का संकेत ही दिया है। गरीब देश को सरकारी तंत्र की आवश्यकता है। हम अमेरिका की भांति निजी क्षेत्र पर आधारित नहीं रह सकते। पंचायतें जन-सहभागिता का अनुपम उदाहरण है इसको सशक्त बनाने से ही हमारा लोकतंत्र मजबूत होगा।
Panchayat representatives have become aware
उत्तरा के फेसबुक पेज को लाइक करें :Uttara Mahila Patrika
पत्रिका की आर्थिक सहायता के लिये :यहाँ क्लिक करें