न्याय की मरीचिका : औरत होने की सजा

अर्चना रावत

हम महिलाएँ अपने नाम के पीछे देवी लगाती आई हैं पर समाज ने हमें कभी अपनी शक्तियों का इस्तेमाल नहीं करने दिया, लेकिन जरूरत पड़ने पर हमारी शक्तियाँ खुद ही जागृत हो जाती हैं जैसा कि लक्ष्मी देवी (काल्पनिक नाम) के साथ हुआ।

लक्ष्मी देवी जिला उत्तरकाशी, ब्लाक चिन्यालीसौड़ के जोगत गाँव की रहने वाली एक सीधी-साधी महिला है। माता-पिता की बेटे होने की उम्मीद के चलते सात बेटियाँ हो गयीं और कुछ समय बाद पिता की मृत्यु होने से, माँ पर घर की सारी जिम्मेदारी आ गयी। किसी तरह बेटियों की शादियाँ हो पाईं। जब छठी बहन लक्ष्मी की शादी तय हुई तो घर की आर्थिक स्थिति अत्यन्त कमजोर हो चुकी थी। लोगों के घरों में काम कर व दिहाड़ी मजदूरी से किसी तरह से इनके घर का खर्च चल रहा था कि एक दिन लगभग छह फुट का रोहित बहुगुणा नाम का नौजवान ब्लाक डुण्डा के ग्राम मरगाँव निवासी श्री सुन्दर दास जिन्हें ये मामा कहते थे, के साथ इनके घर अपना रिश्ता लेकर आया। लक्ष्मी इसका नाम सुनकर चौंक गयी। लक्ष्मी की माँ ने कहा कि हम तो अनुसूचित जाति के हैं। बिचौलिये मामा से भी कहा कि ये कैसा रिश्ता करने के लिए आप कह रहे हो। इस पर रोहित बोला कि मैं जाति-पाति नही मानता हूँ। सुन कर लक्ष्मी को अच्छा तो लगा परन्तु उसका मन इस बात को स्वीकार नही कर पा रहा था। लक्ष्मी ने शादी करने से मना कर दिया तो ये लोग वापस चले गये। परन्तु फिर कुछ दिन बाद रोहित अकेले आकर शादी करने के लिए बात करने लगा। इस तरह 4-5 बार रोहित के द्वारा प्रयास किया गया तो लक्ष्मी मान गयी उसे यकीन नही हो रहा था कि उसको इतना अच्छा घर व पति मिल रहा है क्योकि रोहित बार-बार आकर हसीन सपने दिखा कर चला जाता था। जब लक्ष्मी कहती कि हम तो बहुत गरीब हैं तो वह कहता कि कोई बात नहीं, मुझे कोई दहेज नहीं चाहिए, और शादी भी हम मन्दिर में करेंगे।

लक्ष्मी के राजी होने के बाद रोहित उसे सुरकन्डा मन्दिर लेकर गया और ब्याह रचा लिया। लक्ष्मी बहुत खुश थी। शादी के बाद दोनों देहरादून के मथुरावाला में रहने लगे। कुछ दिन तक तो रोहित लक्ष्मी के साथ ठीक से रहा, परन्तु कुछ समय बाद लडाई झगड़ा करने लगा। लक्ष्मी को रोहित के जान पहचान वाले भी अजीब लगते थे। वे लक्ष्मी के साथ बदतमीजी करने का प्रयास करते थे जिसकी शिकायत लक्ष्मी रोहित से करती तो रोहित लक्ष्मी की बात को टाल जाता। एक दिन रोहित बडे प्रेम पूर्वक लक्ष्मी को रुड़की घुमाने ले गया। वहाँ रोहित ने लक्ष्मी को सर पर घूंघट लेकर रहने को कहा। पहले तो लक्ष्मी को अजीब सा लगा, फिर उसने घूंघट ले लिया। रोहित कुछ लोगों से बात कर रहा था और लक्ष्मी कुछ दूरी पर घूंघट में खडी थी। लक्ष्मी थोड़ा नजदीक आकर उनकी बातें सुनने लगी तो वह चौंक गयी। रोहित उनसे लक्ष्मी के सौदे की बात कर रहा था। जैसे ही उसने ये सब सुना वह वहाँ से तुरन्त भाग खड़ी हुई। लक्ष्मी को भागते देख रोहित भी उसके पीछे-पीछे चला गया, लक्ष्मी ने देहरादून की गाड़ी पकड़ी तो रोहित भी उसी गाड़ी में सवार हो गया। और दोनों देहरादून पहुँच गये जहाँ लक्ष्मी ने रोहित को बताया कि उसने क्या सुना। जिस पर रोहित ने कहा कि हाँ वे तेरे 40,000 रु. देने को तैयार थे। इस बात पर लक्ष्मी रोहित से बहुत लड़ी तो रोहित ने कहा कि वह उससे बहुत प्यार करता है और वह ऐसा आगे से नहीं होगा। अब लक्ष्मी को समझ आने लगा था कि रोहित कैसा व्यक्ति है। इस घटना के बाद लक्ष्मी अन्दर से हिल गयी थी और रोहित पर नजर रखने लगी थी। उसे शुरू से ही रोहित के आस-पास के लोग ठीक नही लगते थे। वह कुछ कहती नहीं थी लेकिन अब उसे यकीन हो चला था कि यह आदमी कुछ ठीक नहीं है। इस घटना के बाद कुछ समय तक तो रोहित शान्त रहा पर कहीं न कहीं उसे सौदा न हो पाने पर मलाल जरूर था, जिस कारण वह फिर लक्ष्मी के साथ मार पीट करने लगा। एक दिन बहुत मार-पीट होने पर लक्ष्मी अपने एक दूर के मामा के घर आ गयी। वहाँ लोगों ने कहा कि रोहित तो लड़कियों का धंधा करता है। लक्ष्मी ने ढालवाला चौकी जाकर अपने साथ मार-पीट व इसके अन्य कार्यों की एक तहरीर दी परन्तु पुलिस वालों ने इस केस को गम्भीरता से नहीं लिया और रोहित को बुलाकर समझौता करा दिया। लक्ष्मी फिर इसके साथ रहने लगी क्योंकि लक्ष्मी गर्भवती भी थी। इन्ही परेशानियों के बीच लक्ष्मी ने 21 जुलाई 2006 को दून अस्पताल में बेटी को जन्म दिया। रोज की मार-पीट अब और बढ़ गयी थी। जब बेटी मात्र 2 माह की थी तब रोहित ने लक्ष्मी को भरी बरसात में घर से निकाल दिया और गाली गलौच व जाति सूचक शब्दों का प्रयोग करते हुये कहा कि तू मुझ पण्डित के साथ अब नही रह सकती है। उस बरसात में लक्ष्मी अत्यधिक बेबस अवस्था में अपने मायके आ गयी।
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समस्या यहीं खत्म नहीं हुई, पिता का साया तो बहुत पहले उठ गया था और अब माँ भी नहीं रही। मायके में माता-पिता द्वारा पूरी जमीन व मकान तीसरी बहन के नाम की गयी है, लक्ष्मी यहाँ बहन से माँगकर एक छोटे से टूटे-फूटे कमरे में गुजर-बसर करने लगी व किसी तरह से मजदूरी करके अपना व अपनी बेटी का पालन-पोषण करने लगी।

लक्ष्मी को धीरे-धीरे रोहित के बारे में और जानकारियाँ मिलने लगीं। जैसे कि वह पहले से ही शादीशुदा है, उसके 4 बच्चे भी हैं और उसका नाम श्यामदत्त बहुगुणा भी है। रोहित कुछ समय बाद लक्ष्मी के मायके में लक्ष्मी से मिलने भी आने लगा। लोगों को लगा कि उसका पति उससे मिलने आ रहा है तो किसी ने कुछ नहीं कहा और लक्ष्मी जिन आर्थिक परेशानियों से गुजर रही थी तो उसने भी कुछ नहीं कहा। उसको लगा कि यदि वह उसका पालन-पोषण करने की जिम्मेदारी ले लेता है तो वह अपनी बेटी की खातिर उसे माफ कर देगी। पैसों की कमी के कारण कानूनी कार्यवाही वह कर नहीं सकती थी। रोहित इन दस सालों में 8-9 बार लक्ष्मी के पास आ चुका है परन्तु दो दिन रहता है और तीसरे दिन अचानक गायब हो जाता है। और हर बार यही कहता है कि मैं तुझे व अपनी बेटी सुहानी (जो अब 9 साल की है) को ले जाऊंगा। इसी बीच लक्ष्मी को यह भी खबर लगी कि रोहित उर्फ श्यामदत्त बहुगुणा ने उनके ही परिवार की एक लड़की से सगाई कर ली है। जब लक्ष्मी को यह ज्ञात हुआ तो उसे बहुत गुस्सा आया और किसी तरह से उस लड़की के परिवार तक यह खबर पहुंचायी कि रोहित धोखेबाज आदमी है। इसकी पूरी सच्चाई बताने पर वह लड़की इसके चंगुल से बच गयी क्योंकि उन्होंने सच जानने के बाद सगाई तोड़ दी।

लक्ष्मी को अब रोहित से अपने व अपनी बेटी के लिए किसी भी उम्मीद की गुंजाइश नहीं रही, क्योंकि उसने अब लक्ष्मी के मायके में आना बन्द कर दिया है। इन दस सालों में वह लक्ष्मी को सिर्फ गुमराह ही करता रहा है। फोन पर उसके साथ प्रेमपूर्वक पेश आता और उसे बाहर बुलाता, लक्ष्मी के मना करने पर उसको धमकी देता कि तू मेरा कुछ नहीं बिगाड़ सकती है। मेरी हर जगह बहुत पहचान व पकड़ है। तूने ज्यादा मुँह खोलने की कोशिश की तो तेरे और तेरी बेटी के लिए अच्छा नहीं होगा।

लक्ष्मी को जब पता चला कि चिन्यालीसौड़ में महिला समाख्या महिलाओं की मदद करती है तो वह महिला समाख्या कार्यालय पहुँची और अपनी पूरी ब्यथा सुनाई। केस पर काउंर्सिंलग व दूसरे पक्ष को सुनने के उद्देश्य से रोहित को कार्यालय से पत्र भेजा गया और दूरभाष पर सम्पर्क किया गया। रोहित ने कहा कि वह रोहित उर्फ श्यामदत्त नहीं है और वह उत्तर प्रदेश का है परन्तु मोबाइल फोन से पहले अन्य बात कर फिर उसकी पहचान बताने पर उसने तुरन्त अपनी पहचान स्वीकार कर ली। शातिर किस्म के इस व्यक्ति ने महिला समाख्या कार्यालय में उपस्थित होने हेतु हामी भर ली परन्तु वह लक्ष्मी को धमकाने लगा और नियत तिथि पर कार्यालय भी नहीं पहुँचा। पुन: दूरभाष पर सम्पर्क करने पर रोहित ने फोन नहीं उठाया। लक्ष्मी की बातों पर यकीन करते हुये और केस की गम्भीरता को समझते हुये लक्ष्मी को चिन्यालीसौड़ चौकी में केस दर्ज करने का सुझाव दिया गया। हालांकि उक्त केस उत्तरकाशी के एस.पी. महोदय के संज्ञान में आ चुका था, क्योंकि केस काउंसिलिंग में उपस्थित विधिक सेवा प्राधिकरण के सदस्य और हिन्दुस्तान के पत्रकार श्री थपलियाल जी द्वारा इस केस का विवरण फेसबुक पर डाल दिया गया था जिस कारण यह अनेक लोगों के संज्ञान मे चला गया था।
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लक्ष्मी जब महिला समाख्या के सहयोग से चौकी पहुँची तो वहाँ पर चौकी प्रभारी के अनुपस्थित होने के कारण उसे थोडी देर में आने को कहा गया। इस बावत जब एस.पी. महोदय से बात की गयी तो उनके द्वारा लक्ष्मी को उत्तरकाशी मिलने हेतु बुलाया गया और अपने स्तर से कार्यवाही करने की बात की गयी। लक्ष्मी को लगा कि अब उसे न्याय मिल जायेगा, लेकिन एस.पी. महोदय द्वारा संदेहास्पद तरीके से यह भी कहा गया कि यह महिला 10 साल बाद क्यों इस बात को उठा रही है? लक्ष्मी महिला समाख्या की कार्यकर्ता के साथ एस.पी. महोदय से इस केस के सिलसिले में मिलने गयी और वहॉ जाकर एस.पी. महोदय को अपनी पूरी व्यथा से अवगत कराया। उन्होने उक्त केस को महिला हेल्प लाइन में डालने की बात की।  केस दर्ज होने के बाद हेल्प लाइन द्वारा उक्त केस पर कार्यवाही करते हुये दूसरे पक्ष को बुलाया गया जिस पर दूसरा पक्ष पहली तारीख पर तो नहीं पहुँचा परन्तु दूसरी तारीख पर अपनी पहली पत्नी की बेटी के साथ पहुँचा। वहाँ दोनों (बाप,बेटी) लक्ष्मी के साथ गाली गलौच करने लगे। रोहित ही नहीं उसकी बेटी भी लगातार लक्ष्मी को धमकाती रही। लक्ष्मी का कहना है कि हमारी सुनवाई तीन घण्टे तक चली लेकिन इन तीन घण्टों में मुझ पर सिर्फ समझौते का दबाव बनाया जाता रहा। यहाँ तक  कि  वहाँ उपस्थित पुलिस वाले भी पृष्ठ 27 का शेषांश

मुझे यही कहते रहे कि समझौता कर ले वरना कोर्ट के चक्कर लगाती रहेगी और हाथ कुछ नहीं आयेगा। लक्ष्मी का यह भी कहना है कि रोहित के हंगामे को देखते हुये और समझौता नही होते देख एस.पी. महोदय द्वारा एक बार यह भी कहा गया कि लक्ष्मी तुम एफ.आई.आर. दर्ज करो और मैं इसको अभी अरेस्ट करवाता हूँ। लेकिन फिर भी लक्ष्मी पर समझौता करने का दबाव बना रहा। र्आिथक स्थिति से कमजोर लक्ष्मी ने अन्त में समझौता कर लिया जिसके तहत  श्यामदत्त बहुगुणा उर्फ रोहित द्वारा प्रतिमाह 2500 रु. लक्ष्मी के बैंक खाते में डाले जायेंगे और लक्ष्मी को एक कमरा बनाने के लिए रोहित 6 माह के भीतर डेढ लाख रु. देगा जो कि जून 2015 से आज की तिथि तक भी रोहित द्वारा नहीं दिये गये हैं।

महिला समाख्या द्वारा लक्ष्मी को समझौता न करने को कहा गया था परन्तु फिर भी लक्ष्मी को समझौता करना पड़ा। लक्ष्मी से पूछने पर उसने कहा कि मुझपर चारों ओर से समझौता करने हेतु जोर डाला जा रहा था। यदि एफ.आई.आर. दर्ज कर भी देती तो केस कैसे लड़ती। मेरे पास तो उत्तरकाशी जाने तक के पैंसे नहीं होते हैं क्योंकि वहाँ जाने पर एक दिन का खर्च 500 रु. तक आता है। हाँ, कुछ समय से मैं साक्षर भारत में प्रेरक का काम कर भी रही हूँ तो उसमें भी जो थोड़ा पैसा आता है वह भी साल-साल भर में आता है और उससे मैं अपनी उधारी चुकाती हूँ। तो मैं कैसे लडूंगी दीदी? पर मेरी एक शिकायत पुलिस प्रशासन से यह जरूर है कि जब उन्हें यह केस पता है तो वह क्यों नही इस पर अपने स्तर से कार्यवाही करते हैं। उस आदमी ने मेरी ही नहीं, कितनी ही लड़कियों की जिन्दगी बर्बाद की है। वह तो मानव तस्करी का काम करता है। तो क्या उस पर कोई कार्यवाही नहीं होनी चाहिए? लक्ष्मी का यह सवाल जायज है। महिला समाख्या के सहयोग से लक्ष्मी ने राज्य महिला आयोग व उत्तराखण्ड पुलिस महानिदेशक से न्याय की गुहार लगाई है। और उसको उम्मीद है कि उसे ही नहीं, बल्कि कई लड़कियों को न्याय मिलेगा।

लक्ष्मी का कहना है कि मुझे व मेरी बेटी को इस आदमी से जान का खतरा है। क्योंकि रोहित मेरी बेटी को ले जाने व हमको मारने की धमकी देता है। मैं 10 साल बाद भी इसलिये कार्यवाही कर रही हूँ कि कहीं यह मेरी बेटी को मुझसे  छीन न ले। यदि इस पर कार्यवाही होती है तो मैं समझूंगी कि मुझे न्याय मिल गया। लक्ष्मी अभी भी न्याय मरीचिका की आशा में है।
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