जंगल के मायने

दीपा पाठक

इन दिनों जब भी शाम को ठंडी हवा को बाँज की पत्तियों के साथ सरगोशियाँ करते सुनती हूँ नीमा की याद अनायास ही आ जाती है। मैं जब पहाड़ों के इस खूबसूरत मौसम का मजा ले रही हूँ वो बेचारी पहाड़ की लड़की देस की गरम हवा में झुलस रही है। नीमा का मायका मेरे पड़ोस में है, उसकी शादी दो साल पहले हुई थी तब से वह अपने ससुराल मथुरा में रहती है। मुझे इस गाँव में रहते हुए अब सात साल से ज्यादा अरसा हो गया है, लेकिन मेरे पड़ोस में नीमा नाम की कोई लड़की रहती है इसका पता मुझे चारेक साल पहले ही लगा। दरअसल गाँव की एक शादी में दुल्हन को मेहंदी लगाने की जिम्मेदारी मैंने ले ली थी, जिसके लिए अगले दिन शाम को उसके घर जाना था लेकिन अंधेरे में अकेले कैसे लौटूंगी, मुझे यह डर सता रहा था। महिला संगीत के दौरान जब मैं अपनी यह समस्या बता रही थी तो कुछ लड़कियों के बीच में से एक दुबली-पतली सी लड़की तपाक से बोली, अरे बोज्यू (पहाड़ में भाभी के लिए संबोधन), डर क्यों रहे हो, मैं छोड़ दूंगी आपको घर। मैंने पहली बार उस लड़की को देखा था, मैंने कहा, फिर तुम्हें भी तो घर छोड़ने जाना पड़ेगा किसी को। कहाँ रहती हो? मेरे जवाब से उसके चेहरे पर साफ नागवारी के भाव उभरे। क्यों मुझे नहीं पहचान रहे हो बोज्यू, मैं नीमा हूँ आपके पड़ोस में तो रहती हूँ।

यह पहली बार नहीं था कि मुझे अपने आसपास के लोगों से कोई मतलब नहीं रखने के शहरी रवैये के चलते शर्मिंदा होना पड़ा था। इसलिए तुरंत झेंपते हुए सफाई दी, ‘अरे नीमा तू है़ बहुत दिनों बाद दिख रही है इसलिए पहचान नहीं पाई।’ जबकि सच तो यह था कि मैंने सचमुच उसे पहली बार देखा था और पड़ोस में रहने वाली बात तो और भी चकराने वाली थी क्योंकि जहाँ मैं रहती हूँ वहाँ चारों ओर सिर्फ जंगल है और दूर केवल एक घर नजर आता है जहाँ रहने वाले केयरटेकर के परिवार को मैं जानती थी इसलिए पता था कि वहाँ नीमा नाम की कोई लड़की नहीं रहती। बहरहाल दूसरे दिन शाम को शादी में मैं जब दुल्हन के हाथ में मेहंदी लगा रही थी तो पिछले दिन की तरह उस दिन भी आसपास की कई सारी लड़कियाँ वहाँ जमा थीं जो दुल्हन की सहेलियाँ थीं। सबसे ज्यादा चुहलबाजी नीमा ही कर रही थी। दुल्हन के हाथ में मेरी लगाई मेहंदी सराहते हुए उसने कहा, ‘बोज्यू मेरी शादी में भी मेहंदी आप ही लगाना़…ठीक है?’ सारी लड़कियाँ ढकती-छिपाती शर्मिली हँसी के बीच उसे झिड़कते हुए कहने लगी, ‘छि रे़…कैसी है ये नीमा़…देखो तो कैसी बेशर्म की तरह अपनी शादी की बात कर रही है। नीमा तुरंत पलट कर बोली, ‘क्यों रे तुम लोग नहीं करने वाले हो क्या शादी? इनके सामने क्या शर्माना हैं ना बोज्यू?  मैं चुपचाप हँसते हुए उनकी बातें सुन रही थी।’

वापस लौटते हुए जब मैं नीमा से बात करने लगी तब मुझे अंदाजा हुआ कि शादी उसके लिए युवावस्था में कदम रख रही एक लड़की की स्वाभाविक इच्छा नहीं थी वो उसकी एकमात्र उम्मीद थी उस माहौल से निकलने की जहाँ उसकी उम्र की खूबसूरती का साथ देने के लिए कुछ भी नहीं था। उसी ने बताया कि मेरे घर की पीछे से ऊपर की ओर बाँज के जंगल के बीच जो पगडंडी जाती है उसी के मुहाने पर जो घर है वहीं वह रहती है। ‘घर में कौन-कौन हैं?’ मुझे सचमुच खुद पर शर्म आ रही थी कि मेरे इतने पास में कोई परिवार रहता है जिसके बारे में इतना समय यहाँ रहने के बावजूद मुझे कुछ नहीं पता। ‘बाबू तो घर छोड़ कर चले गए, ईजा है, एक भाई दिल्ली में नौकरी करता है, बड़ा भाई है उसका पैर खराब है इसलिए बेकार बैठा है। ‘तू स्कूल जाती है?’

‘नहीं तो़… पहले जाती थी नौ में थी तो ददा का पैर टूट गया। ईजा रोज उसे दिखाने कभी हल्द्वानी, कभी अल्मोड़ा ही जाने में रहने वाली हुई़..फिर घर का कौन करता़… भैंस भी तो ठैरी़… दूध देने वाली हुई नहीं… खाली घास लाने का काम बढ़ाना हुआ उसने भी़..फिर कैसे जाती स्कूल इसलिए छोड़ दिया। अब तो तीन-चार साल जो हो गए स्कूल छोड़े। ‘खालिस कुमाउँनी लटक वाली हिंदी में उसने अपनी स्थिति बयान की।

मुझे छोड़ कर जब वो जाने लगी तो उसकी नानुकुर के बावजूद मैंने उसे अकेले नहीं भेजा। अगले दिन खोजबीन करने पर पता चला कि उसके भाई की, जो अच्छा-खासा स्वस्थ जवान लड़का था, तीन चार साल पहले गिरने की वजह से एक पैर की हड्डी टूट गई थी जिसे जोड़ने के लिए डक्टरों ने स्टील की रॉड डाल दी थी, फिर हुआ ये कि कुछ अरसे बाद उसी पैर में दोबारा चोट लग गई जिससे अंदर पड़ी रड टूट गई। गरीबी के चलते पैर का इलाज अच्छी तरह नहीं हो सका और एक बड़ा घाव बन गया जो हमेशा रिसता रहता था। जवान लड़का था, इतने समय तक पैर के चलते लाचार हो जाने से वह अवसाद्ग्रस्त हो गया था। धीरे-धीरे जड़ जमाते स्रिजोफेनिया से वह बहुत आक्रामक हो गया था और जब-तब गुस्से में माँ और बहन को मारने पर आमादा हो जाता था। कभी-कभी तो माँ-बेटी को घर से भाग कर जंगल में छिप कर जान बचानी पड़ती थी। थोड़ी ही दूरी पर उनके रिश्तेदारों के घर थे लेकिन आपसी राग-द्वेष रिश्तों पर भारी पड़ने की वजह से उनका कोई सहयोग नहीं मिलता था।

उस दौरान उसके पैर का घाव कुछ ज्यादा ही रिसने लगा था तो बेचारी माँ जब उसे लेकर अल्मोड़ा दिखाने गई तो किसी डक्टर ने उसे डरा दिया कि ये तो गैंगरीन हो गया है अब पैर काटने के सिवा कोई चारा नहीं है। यह बात नीमा से मेरी पहली मुलाकात से कुछ दिन पहले की ही थी इसलिए नीमा भाई को ले कर बहुत परेशान थी। इसे संयोग ही कहना होगा कि अगले ही दिन हल्द्वानी के एक अस्थि रोग विशेषज्ञ यूं हीं कहीं से घूमते-फिरते हमारे यहाँ कुछ देर के लिए आए। जैसे ही पता लगा कि वह हड्डियों के डॉक्टर हैं उन्हें नीमा के भाई के बारे में बताया गया तो उन्होंने कहा कि वह  मरीज को देखना चाहेंगे। उसका मुआयना करने के बाद पाया गया कि इलाज संभव है। खैर लंबी कहानी का लब्बोलुआब ये कि दो आपरेशन के बाद उसका पैर बिल्कुल ठीक हो गया और वह चलने फिरने लगा ।

अब नीमा और उसकी ईजा से मेरा अक्सर रोज ही मिलना हो जाता था और उनसे अजब सा मोह भी हो गया था। उनकी बातें सुन-सुन कर मुझे औरतों के दुखों की रोज नई सीमाएँ तय करने पर मजबूर होना पड़ता था। अगले एक-डेढ़ साल में उनके हालात कुछ बेहतरी के लिए बदले। नीमा के भाई की दिमागी बीमारी का इलाज भी अब चालू हो गया था और उसके व्यवहार में काफी सुधार आ गया था। नीमा की ईजा रिश्तेदारी में जहाँ-तहाँ हाथ-पाँव जोड़ मिन्नतें करने के बाद उसके लिए एक रिश्ता जुटा लाई। लड़की की शादी के बहाने नाराज होकर दूसरे गाँव में रह रहे उसके बाबू भी घर लौट आए थे। उनके घरेलू मसले में अपनी आत्मियता के बल पर जितना भी हक जता सकती थी उसका पूरा इस्तेमाल करते हुए मैं कम से कम इतना तो सुनिश्चित करने में कामयाब रही थी कि नीमा किसी दबाव में आकर शादी न करे,लड़का उसे पसंद हो, व्यसनी न हो और एक अदद ठीक-ठाक नौकरी उसके पास हो। नीमा की शादी के सामान की खरीददारी मैंने जिस मन से और जिस खुले दिल के साथ की मैंने खुद की शादी के लिए भी नहीं थी, शायद ये मेरा अपनी इतनी नजदीकी पड़ोसी के दुखों से इतने समय तक अनजान रहने का अपराधबोध कम करने का जरिया था।

बहरहाल, नीमा खुश थी उसे लड़का पसंद आया था। ससुराल में खेती-बाड़ी होती थी और वो लोग संपन्न थे। नीमा जब ससुराल से पहली बार आई थी तो उसने खूब हँस-हँस कर वहाँ के लोगों के बोलने की नकल करके बताई। ‘बोज्यू, पता नही हो क्या बोलते हैं, मुझे तो कुछ समझ नहीं आता। मेरे ससुरजी कहते हैं हमारी बहू तो अंग्रेजी बोलती है, देखो तो मेरी हिंदी को जो अंग्रेजी कह रहे हैं… अंग्रेजी जो बोल दूंगी तो पता नहीं क्या समझेंगे।’ और फिर वही अपनी वही चिरपरिचित खिलखिल हँसी। पता नहीं इतने कष्टों, दुखों के बीच भी वह अपनी सहज हंसी को कैसे बचा ले गई थी। लेकिन उसी हँसी के चलते मुझे डर भी लगता था कि कहीं इसके नीचे फिर कोई दुख तो नहीं छुपा रही है ये लड़की।

इसलिए पूछा, ‘तू सचमुच खुश तो है न नीमा?’

अबकी बार उसने मेरी आँखों से आँखे मिलाते हुए बहुत शांत आवाज में कहा, ‘हां बोज्यू, अब मैं खुश हूँ। वो मेरा बहुत ध्यान रखते हैं, उनके यहाँ औरतें घूंघट करती हैं लेकिन मैंने उनसे कहा कि मुझसे सिर नहीं ढका जाता तो उन्होंने कहा कि ठीक हैं तो मत ढको। उनके घर में औरतों से खेतों का काम नहीं कराते, वो सिर्फ घर का कामकाज करती हैं। यहाँ घर-बण-जानवरों के साथ इतना खटने के बाद मुझे वहाँ की जिन्दगी बहुत आराम की लगती है। वहाँ सब मुझे बहुत प्यार करते हैं, सोचते हैं मैं छोटी हूँ …पूछते हैं मुझे बाजार से कुछ सामान तो नहीं मंगाना, इनकी छुट्टी होती है तो मुझे घुमाने भी ले जाते हैं देखो इतनी जल्दी मैं वृंदावन भी घूम आई जबकि शादी से पहले मैं सिर्फ तीन बार गाँव से बाहर कहीं गई थी, दो बार तल्ला रामगढ़ और एक बार अल्मोड़ा। बोज्यू मैं खुश हूं लेकिऩ…’

‘…लेकिन क्या नीमा?’ मेरा दिल एक बार सहम सा गया।

‘बोज्यू वहाँ मुझे जंगल की बहुत याद आती है, सच्ची कहूँ वहाँ बहुत कम पेड़ हैं। दूर तक खेत ही खेत हैं बीच-बीच में पेड़ों की पतली सी लाइन। पेड़ भी पता नहीं कौन-कौन से हैं बाँज जैसा कोई नहीं। मुझे सपने आते हैं कि मैं भैंस को घास चराने जंगल गई हूँ और बाँज के पेड़ के नीचे लेटी हूँ। बोज्यू सच्ची बहुत नराई लगती है कहा जंगल की मुझे ‘कहते-कहते आंख भर आई नीमा की। अब तक नीमा को जानते हुए मुझे कुछ साल हो चुके थे,अपने घर में माँ-बाप के कलह, उनके झगड़ों के चलते जगहंसाई, चाचा-ताई के परिवार की उपेक्षा और प्रताड़ना भरे व्यवहार, भाई की बीमारी जैसी कई मुश्किल बातें उसने कई बार मुझसे साझा की थी लेकिन बिल्कुल तटस्थ भाव से जैसे किसी और की तकलीफों की बात कर रही हो। आज पहली बार उसकी आंखों में आंसू थे़…. किसके लिए? जंगल के लिए।

है न अजीब सी बात? शायद नहीं….वो सिर्फ जंगल नहीं होगा नीमा के लिए। सोचो तो नीमा जैसी घुटनभरी परिस्थितियों में रहने वाली किसी लड़की के लिए क्या मायने रहे होंगे जंगल के? एक जगह जहां वो तमाम परेशानियां कुछ देर के लिए ही सही भूल सकती हो, शायद कुछ पेड़ हों जिनके साथ वह अपने सपने साझा करती हो, अपने दुख बांट कर हल्का करती हो। वरना हंस-हंस कर हर दुख सह जाने वाली नीमा प्यासे को पानी की तरह अपने नए-नए मिले सुखों के बीच एक जंगल को याद करके क्यों रोती। मेरा गला भर आया था समझ नहीं आ रहा था उसे क्या कहूं।

फिर आंसू पोछ कर अपनी उसी शरारती हंसी के साथ उसने कहा, ‘अपना जंगल मुझे अब वहीं बनाना पड़ेगा। इस साल बरसात में मैंने अपने घर के आगे छह- सात पेड़ लगा दिये हैं, एकाध तो फल के पेड़ हैं बाकी पता नहीं किसके थे, मुझे अच्छे लगे मैंने रोप दिए। सब जम गए हैं। बोज्यू बांज जम जाएगा क्या वहां?  ईजा कह रही थी खुबानी, पुलम तो नहीं जमेंगे वहां। इस बार आढ़ू और बांज लगा कर देखूंगी क्या पता लग ही जाएं। बोज्यू वहां हमारा घर खूब बड़ा है, पीछे को एक खिड़की खुलती है वहीं रोपूंगी बांज़….नीमा बोलती जा रही थी और मैं चुपचाप सुन रही थी।

पता नहीं नीमा ने पिछली बरसात में अपने पहाड़ के पेड़ रोपे या नहीं….फिलहाल गर्मियां आ चुकी हैं और मैं पहाड़ की ठंडी हवा के बीच नीमा को याद कर रही हूं।