कोरोना के सबक

Lessons of Corona
-स्वाति मेलकानी

जब कोरोना शुरू हुआ और विदेशों से उसके फैलने की खबरें आने लगीं तो उसी बीच कहीं पढ़ा था कि कोरोना की शक्ल में प्रकृति ने एक पॉजबटन दबाया है। तब यूँ लगा कि यह किसी चलते हुए कार्यक्रम के बीच आया छोटा-सा व्यवधान है और कुछ तकनीकी सुधारों के होते ही ठीक हो जायेगा। पर फिलहाल कई महीनों तक चलती लड़ाई के बाद भी दुनिया कोरोना से हारती हुई दिख रही है। कोरोना की वैक्सीन बनाना एक पक्ष है पर इस बीमारी ने समाज के कुछ ऐसे पक्षों को अनावृत्त किया है जिन पर पर्दा डाले रहना अक्सर जीवन को आसान बना देता है। चाहे वह चिकित्सा सेवाओं का अपर्याप्त होना हो, दवाओं की कालाबाजारी हो या समाज की असंवेदनशीलता। ऐसे कई मुद्दे बार-बार उठते हैं और दबा दिये जाते हैं। कोरोना ने दुनिया के समक्ष जिन प्रश्नों को उठाया, उससे न सिर्फ समाज के पुराने स्वरूप पर प्रश्नचिह्न लगा है बल्कि नव निर्माण पर भी पुरजोर बहस होने लगी है। हर घटना हमें बहुत कुछ सिखा सकती है। कोरोना भी अपने साथ ऐसी ही कुछ सीखें लेकर आया है। दुनिया के सबसे विकृत चेहरे को देखने के बाद उसे नये सिरे से सँवारना जरूरी हो जाता है। (Lessons of Corona)

अमेरिका, ब्रिटेन, इटली, ब्राजील, जर्मनी आदि में कोरोना से हुई मौतें आश्चर्यचकित करने वाली थीं। वह क्या है, जो एक बीमारी के सामने घुटने टेक देता है? कमजोर रोग प्रतिरोधक क्षमता, घटिया स्वास्थ्य सेवाएँ, अच्छे अस्पतालों का न होना, महामारी/आपदा हेतु उम्दा तैयारी का अभाव या राजनीतिक इच्छा शक्ति की कमी। खबरें तो यह भी हैं कि यह एक अन्तर्राष्ट्रीय धोखाधड़ी का मामला भी हो सकता है जिसमें वैश्विक महामारी के बहाने दवा बनाने वाली कंपनियों को लाभ पहुँचाने का षड्यंत्र रचा जा रहा है। सच जो भी हो पर इस दौरान दुनिया नये-नये रूपों में सामने आई है। कहीं चंद डॉक्टरों ने कोरोना मरीजों का इलाज करते-करते जान दे दी तो कुछ लोग ऐसे भी है जिन्होंने चिकित्सा र्किमयों को अपने घर में घुसने तक नहीं दिया। एक ओर लोगों ने घर-घर जाकर जरूरतमंदों को खाद्य सामाग्री पहुँचाई तो दूसरी ओर एक वर्ग ने सक्षम होने के बावजूद अपने र्कािमकों का वेतन तक नहीं दिया। लॉकडाउन में मजदूरों के पैदल चलने और भूखों मरने की तस्वीरें व्यथित करने वाली थीं। कई लोगों ने गठरियाँ बाँधे मजदूरों की इन लम्बी कतारों की तुलना 1947 में आजादी मिलने के बाद हुए विभाजन के दृश्यों से की। पर इसका दूसरा पक्ष यह भी है कि सालों बाद कुछ प्रवासी अपने घर लौटे। सदियों पहले अपनी मिट्टी को छोड़ चुके कुछ लोगों को दोबारा अपनी जड़ों की शिनाख्त करनी पड़ी। उत्तराखण्ड के कुछ गाँवों में इसे रिवर्स माइग्रेशनकी एक प्रक्रिया के रूप में भी देखा जा रहा है। लोगों को उम्मीद है कि घर लौटे ये लोग दोबारा अपनी मिट्टी से जुड़ेंगे और नये रास्ते तलाशेंगे। पर यह भी संभव है कि यह वापसी केवल मजबूरीवश की गई हो।

इस बीच हमारी जनसंख्या का एक बहुत बड़ा वर्ग बेरोजगारी का दंश झेल रहा है। कई लोगों की नौकरियाँ चली गईं और छोटे-मोटे काम-धंधे बंद हो गए। कुपोषण की दर बढ़ गई और भुखमरी के भी नये मामले सामने आये हैं। कुछ स्थानों पर सरकारी विद्यालयों को क्वारंटीन केन्द्र बनाया गया। इससे इन स्कूलों की बदहाली के राज भी खुल गये। कई सरकारी विद्यालयों में न पेयजल व्यवस्था है और न ही शौचालयों की। ऐसे में कुछ क्वारंटीन केन्द्रों में अव्यवस्था की खबरें मीडिया में बहुत उछाली गईं। नैनीताल जिले में स्थित बेतालघाट ब्लॉक के एक प्रायमरी स्कूल में क्वारंटीन केन्द्र बने स्कूल के कक्ष में सो रही पाँच साल की बच्ची की साँप के काटने से मौत हो गई। लम्बी तालाबंदी के दौरान जहाँ एक वर्ग वर्षों बाद फुर्सत के पलों को परिवार के साथ बिता रहा था तो वहीं एक दूसरा तबका जीने की न्यूनतम जरूरतों के अभाव में दम तोड़ रहा था। चिकित्सा सेवाओं से जुड़े लोगों ने संभवत: सर्वाधिक दबाव झेला, कई डॉक्टर, नर्स, सफाई कर्मी व अन्य स्टाफ दिन-रात काम में लगकर मरीजों की जान बचा रहे हैं। यह सब करते हुए उन पर स्वयं संक्रमित होने का खतरा लगातार बना रहता है। पर कुछ निजी संस्थानों द्वारा कोरोना मरीजों को अनावश्यक रूप से वेंटिलेटर में रखकर मनमाने रुपये ऐंठने के मामले भी प्रकाश में आये हैं। कुछ महानगरों से खबरें मिली हैं कि कुछ अस्पतालों में दलालों का ऐसा गैंग भी सक्रिय है जो आपको पैसे लेकर मनचाही कोरोना टेस्ट रिपोर्ट दिलवा सकता है। पॉजीटिव रिपोर्ट का उपयोग कुछ लोग छुट्टियाँ पाने के लिए कर रहे हैं तो कुछ लोग अपनी नौकरी और घर बचाने के लिए निगेटिव रिपोर्ट लेने को मजबूर हैं। एक स्वस्थ महिला ने अपना दो महीने का गर्भ इसलिए गिरा दिया कि बेंगलुरु स्थिति एक प्राइवेट कम्पनी ने उसे छँटनी के दौरान नौकरी से निकाल दिया था और उसके पति की भी छँटनी में बेरोजगार हो जाने की पूरी संभावना थी। कोरोना मरीजों के अंगों की तस्करी की भी गुपचुप खबरें मिली हैं।

कोरोना का बहुत बड़ा प्रभाव हमारे शिक्षा तंत्र पर भी पड़ा है। स्कूल-कॉलेज बंद है। पढ़ाई ऑनलाइन चल रही है। ऑनलाइन शिक्षण प्रणाली पारम्परिक पठन-पाठन की तुलना में कितनी प्रभावी या निष्फल है, यह आगामी समय बतायेगा पर इस तरह की तकनीक आधारित पढ़ाई के लिए संसाधन अभी भी एक वर्ग विशेष तक ही सीमित हैं। सुदूर पर्वतीय इलाकों में एक हाईस्पीड इंटरनेट कनेक्शन अब तक एक लग्जरीहै। कई गाँवों में या तो इंटरनेट नहीं है या फिर केवल नाममात्र का है। ऐसे में ऑनलाइन  पढ़ाई केवल कागजों तक सीमित है। कस्बों और गाँवों के अधिकांश घरों में सिर्फ एक स्मार्टफोन है और वह अधिकतर घर के मुखिया के हाथ में रहता है। यदि घर में लड़का और लड़की दोनों पढ़ने वाले हैं तो ऑनलाइन पढ़ाई के लिए फोन पहले लड़के को दिया जाता है। लड़कियाँ चाहने पर भी इससे वंचित रह जाती हैं। इस संदर्भ में केरल में एक स्कूली छात्रा के पढ़ाई के लिए स्मार्टफोन न मिलने के कारण आत्महत्या करने की घटना भी दर्ज हुई थी।

इस कोरोना काल में महिला हिंसा के मामलों में अप्रत्याशित वृद्धि हुई। सर्वप्रथम लातिन अमेरिका एवं अफ्रीका के कुछ देशों में ऐसे मामले दर्ज हुए पर जल्द ही दुनिया के बाकी हिस्सों से भी इसकी खबरें मिलने लगीं। हालात इतने बदतर हो गए कि दुनिया के कई देशों ने तालबंदी के दौरान हिंसा का शिकार हो रही महिलाओं के लिए विशेष हैल्प लाइन नम्बर शुरू किये। कामकाजी और घरेलू दोनों तबकों की महिलाओं ने कोरोना के कारण हुई तालाबन्दी के दौरान काम का दबाव बढ़ने की बात स्वीकारी है।

सामाजिक दूरी का जो नया चलन अनिवार्य हो गया है, उसके फिलहाल जल्द दूर होने के आसार नजर नहीं आते। कोरोना संक्रमण रोकने के लिए जहाँ एक ओर लोगों को एकत्र होने और नजदीक रहने की मनाही है, वहीं दूसरी ओर इस कारण सामाजिक संगठनों और सामूहिक प्रयासों की शक्ति भी क्षीण हुई है। कई ऐसे क्षेत्र हैं जहाँ एक सामूहिक हस्तक्षेप की आवश्यकता अनिवार्य है पर सामाजिक/ शारीरिक दूरी के चलते ऐसा कर पाना संभव नहीं रह गया है।

इसके बावजूद कोरोना एक मौका है मानव सभ्यता के अनवरत घूमते पहिये को ठहराव के साथ देखने का। यह हमारी दिशाओं और दशाओं के पुनर्निर्धारण का समय है। साथ ही यह समय सफलता के अर्थों को पुर्नपरिभाषित करने का भी है। तालबन्दी ने हमें जीवन में गहरे झाँकने का अवसर दिया है। आत्मनिर्भरता के अनेक क्षेत्र अभी तक पहचाने नहीं गये हैं। ग्रामीण अर्थव्यवस्था के कई उपक्रम पीढ़ियों तक एक आत्मनिर्भर समाज को स्थापित किये हुए थे। औद्योगीकरण, शहरीकरण और वैश्वीकरण ने वैश्विक परिदृश्य में जो कुछ बढ़ाया या घटाया, उसके पुर्नमूल्यांकन का अवसर भी कोरोना का यह समय प्रदान करता है। विकास की दौड़ में जब कभी वापस लौटना पड़ा तो वे ही पुल काम आये जो पिछली बार नदी पार करने के लिए जलाये नहीं गये थे। यद्यपि कोरोना का आना अप्रत्याशित था पर विकास के नाम पर विज्ञान की मनमानी को लेकर दुश्चिन्ताएँ सदैव बनी रही थीं। कोरोना वायरस के वैज्ञानिक प्रयोगशाला में बने होने की आशंका को लेकर बहस जारी है। वैश्विक अर्थव्यवस्था पर प्रभुत्व स्थापित करने को लेकर दुनिया के शक्तिशाली देशों के बीच खींचतान चल रही है। वैश्विक महामारी विश्व राजनीति में स्पर्धा का नया मैदान है। घरेलू स्तर पर भी समाज के कई भले-बुरे चेहरे नजर आये हैं। कहीं सेवा और सहायता के आदर्श स्थापित हुए हैं तो कहीं स्वार्थ, मौका परस्ती और इंसानी लालच के अविश्वसीय रूप सामने आये हैं। कोरोना के बाद की दुनिया नि:सन्देह उसके पहले की दुनिया से भिन्न होगी। यह समय है इस बदलाव को यथासंभव दिशा देने का ताकि वह जो अपरिहार्य है उसका होना मानव अस्तित्व पर छाये संकट को हटाकर बेहतरी की राह दिखा सके।