एक शिक्षिका की डायरी : एक

रेखा चमोली

सुश्री रेखा चमोली प्राथमिक विद्यालय गणेशपुर, उत्तरकाशी में अध्यापिका हैं। उनकी यह डायरी शीघ्र ही पुस्तकाकार प्रकाशित होने जा रही है। इससे पूर्व एक कविता संकलन पेड़ होती स्त्री भी प्रकाशित हो चुका है। विद्यालय में बच्चों के साथ उनके शिक्षा सम्बन्धी प्रयोग और चिन्तन की झलक से आगामी कुछ अंकों तक उत्तरा के पाठक रू ब रू हो सकेगे।  

दिनांक 3 अगस्त 2011

आज सुबह मैं 7:10 पर विद्यालय पहुँची। अभी दो-तीन बच्चे ही आये थे। हमने मिलकर विद्यालय खोला। धीरे-धीरे बाकी बच्चे भी आने लगे। मैंने बच्चों के साथ मिलकर विद्यालय की सफाई की। लगभग सभी बच्चों के आने के बाद हमने प्रार्थना सभा प्रारम्भ की। प्रार्थना के बीच में ही ग्राम प्रधान जी व पेंन्टर जी विद्यालय में आए। बच्चों ने प्रार्थना की, प्रतिज्ञा, राष्ट्रगान के अलावा गाँव के समाचार, सामान्य ज्ञान, कविताएँ आदि सुनाईं जिसे देख-सुनकर हमारे अतिथि खुश हुए। मैंने बच्चों को अपनी-अपनी कक्षा में जाने को कहा व स्वयं प्रधान जी से बातें करने लगी। दरअसल विद्यालय में एक और शौचालय का निर्माण होना है और पेंट का काम भी करवाना है। जिसकी बात प्रधान जी के साथ कुछ दिनों पहले हो गयी थी, उस समय यह बात भी हुई थी कि जब प्रधानाध्यापिका प्रशिक्षण से वापस आ जाएंगी तब यह कार्य होगा पर आज प्रधान जी ने कहा कि वे आज या कल से काम प्रारंभ करवाना चाहते हैं। मैंने उनसे कहा, वे शौचालय का कार्य तो करवा लें पर रंग-रोगन का काम कुछ दिनों बाद करवाएँ क्योंकि एक तो आजकल खूब बारिश हो रही है, दूसरा दीदी (प्रधानाध्यापिका) के न होने से अकेले बच्चों के साथ काम करने और सामान इधर-उधर रखने में दिक्कत होगी। वे इसके लिए राजी हो जाते पर पेंटर महोदय ने कहा फिर उनके पास समय नहीं है। इसलिए वे कल से ही काम करेंगे। तो यह तय हुआ कि कहाँ-कहाँ, क्या-क्या रंग होना है, यह देखकर वे पेंट खरीदने उत्तरकाशी बाजार जाएंगे व कल से पेंट का काम शुरू होगा।

अकेली शिक्षिका होने के कारण मुझे विद्यालय के समस्त क्रियाकलाप व शिक्षण कार्य को स्वयं देखना है तो मुझे एक ऐसी कार्ययोजना बनानी होगी जिससे कक्षा 3, 4, 5 के बच्चों का पाठ्यक्रम सुचारु रूप से चलता रहे। वे अपने सीखने-सिखाने में व्यस्त रहें व मुझे भी कक्षा 1 व 2 के साथ काम करने में दिक्कत न हो।

मैंने कक्षा 3, 4, 5 के साथ हिन्दी में एक साथ काम करने का निर्णय लिया और इसके लिए एक कार्ययोजना तैयार की। इसका उद्देश्य बच्चों में समझकर पढ़ने-लिखने की प्रवृति का विकास करना ,उनका स्वंय पढ़ने-लिखने की ओर पे्ररित होना, किसी विषय पर अपनी राय व्यक्त कर पाना, सृजनात्मकता बढ़ाना, उनमें मौलिक लेखन कर पाने का कौशल विकसित करना आदि रखा। मध्यान्तर से पहले का समय इसके लिए निर्धारित किया। मध्यान्तर के बाद का समय गणित व अन्य विषयों के लिए रखा। प्रयास यह भी किया कि हमारे आसपास के संबोध भी इस कार्ययोजना में शामिल हों। इसके लिए मैंने कुछ गतिविधियाँ निर्धारित कीं जो इस प्रकार से थीं-

1.     अपनी खुद की तैयारी के बाद बच्चों से किसी संदर्भ/विषय पर बातचीत करना।
2.     शब्दों से कहानी बनाना।  (जिसको दो दिन दिए)
3.     कविता पर बातचीत व स्वयं की कविताएँ लिखना।
4.     अधूरी कविता पूरी करना।
5.     एक दिन की बात (अनुभव लेखन)।
6.     चित्र देखकर कहानी लिखना।
7.     संवाद लेखन।
8.     काश/अगर तुम होते विषय पर कविता लेखन।
(diary of a teacher)

हालांकि इनमें से किसी भी गतिविधि के लिए एक दिन का समय अपर्याप्त होता लेकिन मैं अपनी हिन्दी की कक्षा में समय-समय पर इसी तरह की गतिविधियाँ बच्चों के साथ करती रहती हूँ। अत: मुझे विश्वास है कि यह कार्ययोजना सफल होगी। मेरा इरादा इस दौरान हुए कार्य का दस्तावेजीकरण करना भी है। ताकि बच्चे अपने लिए पढ़ने की सहायक सामाग्री बनाएँ, उन्हें ये काम अच्छा लगे।

आम तौर पर सरकारी विद्यालय में पढ़ने वाले बच्चे वंचित समुदाय से आते हैं। उनके पास पढ़ने-लिखने की सामग्री का अभाव होता है। पाठ्य पुस्तकों की छपाई और विषय-वस्तु बहुत बार बच्चों को पढ़ने के लिए आकर्षित नहीं कर पाती। जबकि शिक्षा में सतत रूप से काम करने वाले लोगों का मानना है कि पढ़ना पढ़ने से आता है और इसके लिए बच्चों को पढ़ने के लिए पर्याप्त अवसर दिया जाना जरूरी है। मेरा अनुभव है कि जब बच्चे अपने स्वयं के अनुभवों से कुछ लिखते हैं, उसको अपने साथियों के साथ साझा करते हैं तो यह उनमें पढ़ने-लिखने के प्रति उत्साह एवं आकर्षण पैदा करता है। बड़े बच्चों को दत्तचित्त होकर कार्य करता देखकर नवागन्तुकों में भी रुचि पैदा होती है। पूरा मसला विद्यालय में एक ऐसी संस्कृति का निर्माण करने से है जो बच्चों में किताबों के प्रति उत्साह पैदा करे एवं उन्हें अपनी बात कहने व दूसरों की बात सुनने व समझने की दिशा में ले जाए। मेरा मानना है कि ये दोनों बातें एक विवेकशील इंसान बनने को दिशा देती हैं।

कक्षा 4 व 5 के साथ इस तरह का कार्य करने के पीछे मेरा एक उद्देश्य यह भी है कि अभी तक अपने शिक्षण की प्रभावशीलता देख पाऊं। कक्षा 3 को शामिल करने का यह उद्देश्य है कि वे बड़े बच्चों को काम करते हुए देखें, उनकी बातचीत सुनें। बातचीत में शामिल हों। उनमें स्वतन्त्र लेखन की शुरूआत हो।

मैने बच्चों से इस संबध में बात की। उन्हें बताया कि अगले कुछ दिन हम बालसखा कक्ष में काम करेंगे। यह कक्ष हमारा सृजनात्मक कक्ष है जहाँ हम विभिन्न रचनात्मक कार्य करते रहते हैं, जैसे- चित्रकारी, मिटट्ी का कार्य, कागज, पत्थर और लकड़ी के गुटकों से कुछ चीजें बनाना आदि। यह कक्ष हमारा पुस्तकालय भी है। इस कक्ष में बच्चे अपने मन से पढ़ते, लिखते और खेलते हैं। सीधे-सीधे अपनी पाठ्य पुस्तकें न पढ़ने व किसी प्रकार का अभ्यास कार्य न करने के कारण वे ज्यादा सहज होते हैं।

कुल मिलाकर इस कक्ष में कार्य करने का अर्थ होता है हम बाकी दिनों से कुछ अलग कार्य करने वाले हैंं। जब मैंने बच्चों को बताया कि हम अपनी खुद की किताब बनाएंगे तो वे बहुत उत्साहित हुए। जब हम शिक्षण कार्य एक योजनाबद्घ तरीके से करते हैं तो यह आसान लगने लगता है। बच्चों और शिक्षक के सामने छोटे-छोटे लक्ष्य होते हैं और ध्यान केन्द्रित करने में मदद मिलती है। योजना निर्माण के दौरान मेरा ध्यान इस बात पर जाता है कि शिक्षण प्रकियाओं में किन दक्षताओं व कौशलों का विकास करने का अवसर बच्चों को देना है। आज मैंने शब्दों से वाक्य बनाने की गतिविधि की।

जैसे मैंने रास्ता व पेड़ शब्द से वाक्य बनाने के लिए बच्चों से बातचीत की और दो वाक्यों को चुनकर श्यामपट्ट पर लिखा।

1.   रास्ता- यह रास्ता गाँव की ओर जाता है।
2.   पेड़- पेड़ पर चिड़िया का घोंसला है।

शब्दों का वाक्य में प्रयोग करते हुए बच्चे उन शब्दों के बारे में सोचते हैं व उन शब्दों को अपने अनुभवों में खोजते हुए उनके बारे में लिखते हैं ।

जब बच्चों से इस बारे में बात की कि दोनों शब्दों का उपयोग कर एक नया वाक्य बनाना है तो कैसे बनाएंगे? तो बच्चों ने शुरूआत इस तरह के वाक्यों से की-

यह रास्ता गाँव की ओर जाता है और पेड़ पर चिड़िया का घोंसला है। इस दौरान बच्चे अलग-अलग तरीकों से शब्दों के साथ खेल रहे थे व इस प्रक्रिया में मजा ले रहे थे।

बातचीत का क्रम आगे बढ़ाने पर निम्न वाक्य उभर कर आए-

1.   गाँव के रास्ते में एक पेड़ है जिस पर चिड़िया का घोंसला है।
2.   गाँव के रास्ते में अमरूद के पेड़ पर चिड़िया का घोंसला है।
3.   गाँव की ओर जाने वाले रास्ते में सेमल का बड़ा पेड़ है, आदि। 

आज हमने बहुत से शब्दों से अलग अलग व मिलाकर वाक्य बनाए।  

इस तरह से काम करते हुए मुझे बच्चों के साथ बातचीत के महत्व को समझने में मदद मिली। यदि शिक्षा का लक्ष्य विचार करना, चिंतन करना सिखाना है तो फिर हमारे शिक्षण में इसका पुट होना चाहिए। जब हम शब्दों एवं वाक्यों को अलग-अलग संदर्भों में उपयोग करते हैं तो कहीं न कहीं बच्चों को भाषा के ढांचे को समझने में मदद मिलती है।

मैंने बच्चों को गृहकार्य में कुछ और शब्द वाक्य बनाने को दिए ।
(diary of a teacher)

क्रमश:

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