गाय रो रही है : संस्कृति

दिवा भट्ट

एक गाय रो रही है,
रह-रह कर बिसूर रही है,
रस्ते-रस्ते डोल रही है,
इधर-उधर दौड़ रही है,
खेत-खलिहान फाँद रही है,
डंडे खाती भाग रही है।
कंटीले तारों में उलझती गाय,
झाड़ी-झंखाड़ों दुबकती गाय,
कसाई के पंजे से छटकती गाय,
गलत जगह पर अटकती गाय,
कहाँ से कहाँ भटकती गाय,
भटकती नहीं; भटकाई गई है।
खोई नहीं; छोड़ी गई है।
भूली नहीं; भुलाई गई है।
दुधारू नहीं; बाँझ है।
गाय नहीं; बछिया है।
बछिया नहीं; बछड़ा है।
दो दिन का व्रत, चार दिन का अनुष्ठान करती स्त्रियाँ, सप्त धान्य बिरुड़ों से गौरा- महेश्वर को पूजती स्त्रियाँ, दूर्वादल से गणपति-पूजन कर बाईस गाँठों वाली दूब का- कंठहार पहनती स्त्रियाँ, दूब की तरह जड़ें फैलाती शक्तिशाली सन्तानों का वर- माँगती स्त्रियाँ,
(cow is crying)

आठूँ पर्व के गीत गा रही हैं
”दी दियो बोज्यू हो बिरुड़ै की लोड़ी
दी दियो बोज्यू हो सुनू की दिंयैड़ी।”
”बिरुड़ै की लोड़ी त दिणै की नहाती
सुनू की दियैंड़ी त छ म्यरा मैत की।”
”तुमन बोज्यू हो चेलियै चेलि हूना
गोठ तुमारा बहौड़े हूना
भैंसा क तुमारा काटै-काट हूना।”
रुष्ट ननद के शाप से डरती भाभी,
अपनी कोख से बेटियों और गाय की कोख से बछड़ों के जन्म की संभावना से डरती भाभी; वचन पलट रही है:
”लिजा ननदी जिङुली छ्योड़ी दैण
लिजा ननदी बिरुड़ै की लोड़ी
जिला ननदी सुनूं की दियैड़ी।”
तृप्त हुई ननद का शाप वरदान में पलट रहा है
”तुमन बोज्यू हो च्या्लै-च्या्ल हूना
गोठ तुमारा बा्छि-बा्छि हूना।”
शार-वर; मोल-तोल
व्रत-पूजा; मोल-तोल।
दान-पुण्य; मोल-तोल।
स्नेह-सम्बन्ध; मोल-तोल।
मोल-तोल की वस्तु बनी सन्तान
हारी जाती, जीती जाती सन्तान,
दान में लुटाई जाती सन्तान,
नुमाइश में सजाई जाती सन्तान,
आन-इज्जत को मारी जाती सन्तान,
गर्भ में ही दबाई जाती सन्तान,
फेंकी जाती, भुलाई जाती सन्तान,
रो रही है, भटक रही है,
आदमी की सन्तान
गाय की सन्तान
मनुष्य की बेटी रो रही है।
गाय का बेटा रो रहा है।
अपने हिस्से के एक थन दूध के लिए तरस रहा है,
ममता की जीभ से चाटे जाने के लिए तडप रही है त्वचा
मचल रही है देह, पुकार रहे हैं प्राण,
गरदन प्रतीक्षा में है हल के जुवे और विलुप्त हो चुकी-
बैलगाड़ियों की।
अपने होने का अर्थ खोजता गाय का बछड़ा,
माँ से बिछुड़ा स्वामी से छूटा गाय का बछड़ा,
मार खा रहा है,
पहाड़ से गिर कसक-कराह रहा है।
काँटों में उलझता,
बाघ-शेर का शिकार बनता
ठंडी रातें ओढकर अँधेरे में दुबक रहा है।
रात भर फसलों को रोंद-फोंद,
सुबह आराम से जुगाली करता बछड़ा ढीठ हो चुका है।
वह अनचाही सन्तान हैं
न चाहा गया, न माँगा गया, न संभाला गया
अनुपयोगी भार है
मनुष्य की बेटी की भाँति।
गौमाता की पूंछ पकड़ वैतरणी तरने वाले देश में,
गौ की देह में तेंतीस कोटि देवों के दर्शन करने वाले देश में,
दूध देना छोड़ते ही बूचड़खाने पहुँचती गायों के देश में,
अपनी देह देकर आधी जनसंख्या का पेट भरते पशुओं के देश में,
गो-वध-बन्दी हेतु आन्दोलनरत देश में,
प्राण बचाता भाग रहा है गाय का बेटा,
नारी को देवी बनाकर पूजने वाले देश में,
पैदा होने पर पछता रही इन्सान की बेटी।
(cow is crying)

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