बचपन की स्मृतियां: जीवन कथा- पाँच

Childhood Memoirs of Radha Bhatt
-राधा भट्ट

अपने बचपन की स्मृतियां मुझे सिलसिलेवार याद नहीं आतीं। कुछ ऐसी ही घटनाएं याद आती हैं, जिनका मेरे बाल मन पर गहरा असर पड़ा होगा।  बचपन भी तीन स्थानों में बंटकर बीता था, कुछ भाग धुरका गांव व छाना में, कुछ मेरठ, बरेली आदि सैनिक छावनियों में व बाद में कुछ समय रामगढ़ में।
(Childhood Memoirs of Radha Bhatt)

छाना की एक घटना बड़ी मजेदार थी। तब शायद में 3 वर्ष की रही हूंगी। गर्मी के दिन थे। छाना दो पहाड़ों से घिरी एक संकरी बन्द घाटी तथा दो बारहमासी गधेरों के बीच में बसा था। लगभग 50 नाली की हमारी खेती थी। यहां से गांव की आबादी 1-2 किमी़ की दूरी पर थी। यह घने जंगलों के बीच एक एकान्त किन्तु अत्यन्त उपजाऊ स्थान था। यहां हमारी 2 भैंसें, 3-4 गाय तथा 15-16 बकरियों की एक गौशाला थी। उस दिन गर्मी बहुत थी। दादाजी घर का मुख्य दरवाजा खोलकर उसके सामने ही बिस्तर लगाकर सोये थे ताकि बाहर की हवा से ठंडक मिले। उन्होंने मुझे अपने साथ बिस्तर में ही सुला लिया था। बाघ का खतरा रोज का था। उसके साथ रहना हम सबने सीख लिया था।

कहना चाहिए कि यहां उसका ही राज था। मनुष्य ने तो उसके क्षेत्र में अनधिकार घुसपैठ की थी। अत: दादाजी  ने हमारे कुत्ते को लम्बे से उस कमरे के भीतरी कोने में रख दिया था, परन्तु बाघ तो अपना भोजन सूंघ लेता है। उसने हम दो प्राणियों को लांघा और अविश्वसनीय फुर्ती से कुत्ते को पकड़कर हमेंं पुन: लांघकर बाहर कूद गया। कुत्ते की चीख सुनकर दादा जी उठे, वे समझ गये। बाघ आया, कुत्ते को ले गया पर उनकी नातनी को छोड़ गया। दादाजी ने बाघ के चले जाने के बाद मुझे गोद में ले लिया और भगवती माता को अनेक धन्यवाद दिये। घटना की याद मुझे रहे, यह तो संभव ही नहीं था। किन्तु बचपन कैसा था, उसकी यह एक बानगी तो मानी ही जा सकती है। इसलिए सुना गया संस्मरण लिख दिया है।

छाना की एक दूसरी घटना है जिसकी स्मरणानुभूति मेरे हृदय में है। मेरी तीसरी बहन पैदा हो गई थी। तब मैं 7 या 8 वर्ष की रही हूंगी। असोज का महीना था, फसल समेटने की अनियंत्रित मेहनत के दिन थे। ईजा खेत में जाती तो एक साल छोटी बच्ची को मेरी गोद में छोड़ जाती। एक बड़े से कशेरे (कांसे का कटोरा) में दूध-भात भी उस बच्ची के लिए ढककर रख जाती। जब तक वह सोती, मैं भी या तो सोती या उसके पास बैठकर यों ही खेलती रहती। वह उठती तो उसे दूध-भात खिलाती, परन्तु जब शाम होने लगती, तब बच्ची बेतहाशा रोती। मैं खड़ी होकर घूमते-चलते अपनी बाहों में उसे हिलाती थी। मेरी बाहें थक जाती, पर वह चुप न होती।

कुछ देर बाद घर के कोने में अंधेरा छाने लगता। अंधेरे कोनों को देखकर मुझे डर लगने लगता। मैं घर से बाहर उस बच्ची को बाहों में झुलाती हुई ‘‘बौनाव’’ में खड़ी हो जाती और रुआंसी हो जाती। ईजा को पुकारती, ‘‘ईजा ऽ ऽ आ मुझे डर लग रहा है।’’ पर ईजा तो जवाब भी नहीं देती, बस गधेरों का सुसाट और जंगल की अंधेरी होती परछाइयों के बीच में मेरी आवाज खो जाती। कितने कठिन क्षण थे वे जो मेरे हृदय पर भारी होते जाते थे। फिर घर को आती पगडंडी के किसी मोड़ पर एक आकृति प्रकट होती थी, घास के बड़े गट्ठर के नीचे केवल टांगें चलाती मूर्ति। उस आकार को घने हो रहे अंधेरे के बीच देखकर तो मैं रो ही पड़ती। क्योंकि अब वह निकट आ गई थी। ईजा सिर से गट्ठर गोठ के सामने फेंकती। मैं तो पहले ही रोती हुई बच्ची को लिए वहां पहुंची रहती। तुरन्त बच्ची को ईजा को देना चाहती पर वे बिना हाथ-पांव धोये और आग के ऊपर अपने हाथों को तपाये हुए बच्ची को गोद में नहीं लेती। बाहर की अला-बला छोटे बच्चे को न लगे।

अत: अग्नि भगवान उसे जला दें तभी बच्चे को छूती थी। मैं रोती बच्ची को उठाये उनके पीछे-पीछे घूमती, साथ ही मैं भी सुबकती रहती- अन्त में जब घर में आमा द्वारा दिया जला दिया जाता तभी ईजा भी घर में आ पाती। रोती बच्ची उनके सीने से चिपककर चुप हो जाती और ईजा मुझे अपने पास सटाकर बिठा लेती, मेरे सिर पर प्यार से हाथ फिराते हुए मेरे सारे श्रम, डर और उद्विग्नता का शमन कर देतीं।
(Childhood Memoirs of Radha Bhatt)

हमारा परिवार दो स्थानों धुरका व छाना में बंटा रहता था। कभी-कभी एक स्थान पर भी रहते। सर्दियों में विशेषत: हम सभी छाना रहते। वहां ठंड कम होती व पशुओं के लिए चुगने को जंगल में चारा पानी खूब अच्छा मिलता था। छाना में केला, पपीता, अमरूद आदि फल भी खूब होते। केले की बड़ी-बड़ी दो चाख एक बार तैयार होते थे। एक बार चाचा जी ने एक गड्ढा खोदा। हम बच्चों से बड़म्योली की पतली टहनियां लाने को कहा। हम सब दौड़कर टहनियां तोड़ लाये। इस काम में हमें विशेष उत्साह होता था क्योंकि पक जाने पर हमें ही ये केले खाने को मिलने वाले थे। चाचाजी ने गड्ढे के भीतरी भाग में चारों ओर बड़म्योली की गुदगुदी पत्तियां बिछा दीं। दीवारों तक को ढक दिया। तब गड्डों के बीच में केले की चाख से अलग-अलग घड़ी तोड़कर बड़े करीने से बड़म्योली के मुलायम बिछावन में रख दीं। ऊपर से भी बड़म्योली से ढक दिया गया। उसके ऊपर मिट्टी बिछा दी गई। गड्ढे के भीतर केले बन्द हो गये। चाचाजी निश्चिन्त थे, उन्हें पता था केले कितने दिन में पक जायेंगे पर हम बच्चों को बड़ी उतावली थी।

हम दिन भर में कई बार गड्ढे के पास जाते, चारों ओर घूमते, उस जगह का बड़ी बारीकी से निरीक्षण करते। दाज्यू हम बहनों (मैं, कान्ति, लछीमा (चाचाजी की बेटी) पर ज्यादा जानकार बनते थे। कभी कहते, ‘‘गड्डे से यहां गरम हवा आ रही है, इसका मतलब है केले उबल रहे हैं। मैं उनकी यह बात नहीं मानती, तो कहते, जब उबलेंगे, तभी तो पकेंगे केले। तेरी खोपड़ी में इतनी भी समझ नहीं है?’’ हम ऐसे उटपटांग बातें करते हुए दिन में कई बार गड्डे के चक्कर लगा आते। आखिर हमारी प्रतीक्षा का अन्त हुआ और चाचाजी ने गड्डा खोदा। सुन्दर पीले-पीले मुलायम और मोटे काले केले बाहर निकाले। चाचाजी ने सब बच्चों को चार-चार केले बांट दिये ताकि हम दो दिन तक उन्हें खाते रहें। सबने  किसी जाले में किसी अल्मारी में या किसी भकार के कोने में अपने-अपने केले छिपा दिये। अधिक पका हुआ एक-एक केला चाचाजी ने हमें उसी समय खाने को दे दिया। क्या स्वाद था? अभी भी याद आता है।

सोने से पूर्व मैं अल्मारी के कोने में अपने केले देखने गई ताकि सोते समय उनको याद करती हुई मैं सो जाऊं पर वहां एक भी केला न था। मैं चिल्लाकर रोने लगी। ‘‘क्या हुआ, क्या सांप ने खा दिया?’’ किसी बड़े ने, शायद आमा ने कहा होगा। ‘‘मेरे केले?’’ मैं तो बुक्का फाड़कर रोने लगी थी। चाचाजी बोले, कल तुझे और दे दूंगा केले, गड्ढे में अभी और भी रखे हैं। चुप हो जा, जा सो जा।

मैं उम्मीद में सो गई। पर बड़ों की नींद मेरे दाज्यू ने आधी रात में खोल दी, उन्हें पेट में दर्द हुआ और पीछे से एक उल्टी हुई। खोये हुए मेरे केलों का रहस्य लोगों को उल्टी देखकर समझ में आ गया। आमा ने जल्दी से दाज्यू को अपनी चूरन की शीशी से चूरन दिया और पीछे से गरम पानी पिलाया, दाज्यू सो गये व बड़े भी चैन पाकर अपने-अपने बिस्तरों में सो गए।

लेखिका

फौजी छावनी के दो संस्मरण मैं पहले लिख चुकी हूं, एक और याद आ रहा है। बाबूजी पूरे परिवार को लेकर फौजी घोड़ों की दौड़ दिखाने ले गये थे। फौजियों के परिवार एक खुले मैदान में एकत्र हुए थे। हिन्दुस्तानी परिवार एक ओर  बैठे थे और अंग्रेज परिवार दूसरी ओर। अंग्रेज बच्चे भी थे और हिन्दुस्तानी बच्चे भी थे, पर वे अलग-अलग ही खेलते-दौड़ते हुए मस्ती कर रहे थे। उन दिनों मेरी बहन कान्ति तीन साल की रही होगी। वह खूब खुश होकर दौड़-भाग रही थी। एक सुन्दर फ्राक और उसके अच्छे गोरे रंग के कारण वह कब मेरी अंगुली छोड़कर अंग्रेज बच्चों के बीच घुस गई, मुझे पता नहीं चला। बाद में मैं स्.. स्.. स्.. करती रह गयी। पर वह तो उन्हीं बच्चों का हाथ पकड़कर नाचने लगी। देखते-देखते एक अंग्रेज ऑफीसर ने उसे गोद में उठा लिया। मैं और भी डर गई। तब ईजा व बाबूजी की नजर उस पर पड़ी। बाबूजी संकोच के साथ उसे लेने गये और ईजा ने मुझे डांटते हुए कहा, ‘‘तुमने उसका हाथ पकड़े रखना था। उसने उन बच्चों के साथ नहीं जाना था। छोड़ा क्यों? अंग्रेज ऑफीसर कान्ति को गोद में लेकर खुश था और कान्ति भी उसकी गोद में खुश थी। इस बात की चर्चा हमारे परिवार में बहुत दिनों तक होती रही थी। आज मैं समझ पाती हूं कि अंग्रेज व हिन्दुस्तानियों में कैसा भेद-भाव था और उसके कारण हिन्दुस्तानियों के मन में कितना डर था।

मेरे कान व नाक को छेदने के बारे में ईजा चिन्तित होती थीं। उन्हें लगता था कि कोमल शरीर में ही छिदवाना कम कष्टकारक होता है। मैं जैसे-जैसे बड़ी हो रही थी, ईजा बाबूजी को बार-बार याद दिलाती कि वे पता लगायें कि यहां छावनी में कौन है जो कान छेदने में ‘अच्छा हाथ’ रखती हो। पर पिताजी टालते हुए कहते, ‘‘नाक-कान कभी न कभी छिदवायेंगे। नहीं भी छिदे तो क्या बिगड़ेगा,’’ ईजा जीभ को दांतों से दबाती हुई कहती, ‘‘बिना नाक, कान में पहनी हुई स्त्री भी कहीं शोभा देती है?’’ यह बहस मैं सुनती रही थी और खुश थी कि कोई छेदने वाली नहीं मिल रही है, क्योंकि मुझे छेदने में दर्द होगा, इसका डर था, परन्तु एक दिन दूसरी कॉलोनी में एक महिला के बारे में ईजा को पता चला और उन्होंने उसी दिन मुझे रास्ता बताकर वहां भेज दिया। मैं रास्ते में दर्द होने के डर से एक जगह बैठ भी गई। फिर ईजा की डांट का डर सताने लगा तो गई। महिला ने सुई की नोक पर तवे की कालिख ली और निशान लगाये।
(Childhood Memoirs of Radha Bhatt)

तब मेरा ध्यान गया कि उनका तवा उल्टी तरफ से चूल्हे पर रखा हुआ था। मैंने नाक व कान एक ही बार उसी दिन छिदवा लिए। वापस आई। तो तवे के उल्टे होने की जिज्ञासा मेरे मन में बनी हुई थी। मैं सबसे पूछती रही उलटा तवा क्यों? बाबूजी ने ड्यूटी से वापस आकर बताया कि वह मुसलमान परिवार था। वे तवे को उसी तरह उपयोग में लाते हैं, तुम्हारे लिए वह उल्टा है पर उनके लिए हमारा तरीका उल्टा हो सकता है। इसमें उल्टे या सीधे की कोई बात नहीं है। मुसलमान परिवार को देखना मेरे लिए इतनी नवीनता थी। मानो मैंने एक नई दुनियां देख ली थी। ऐसा ही कुछ मुझे कई दिनों तक लगता रहा था।

बचपन के कुछ वर्ष परिवार से बाहर पर दादाजी की स्नेह छाया में रामगढ़ में बीते। बाद में परिवार ही रामगढ़ आ गया तो उसके साथ ही बचपन ने किशोरावस्था में कब कदम रखा, पता ही न चला, बचपन के साथ ‘खेल’ सबसे आनन्दभरी प्रवृत्ति होती है जिसमें कभी ऊब नहीं आती। उससे मन कभी अघाता नहीं। मुझे याद नहीं पड़ता कि मैंने ‘दाणी’ खेलना किससे सीखा? परन्तु यह पक्की तौर पर याद है कि यह रामगढ़ में ही सीखा। मल्ला रामगढ़ स्थित प्रायमरी पाठशाला स्कूल में बरामदे के हर साफ चिकने भाग में हम चार लड़कियां मिलकर दाणी खेलने लगतीं। कई वर्षों तक यह खेल हम खेलती रहीं। ‘अड्डू’ एक दूसरा खेल था। जो लड़कियों व लड़कों में भी प्रचलित था। मुझे याद है कि रामगढ़ निवास के प्रारम्भ में, मैं चूंकि दाज्यू के साथ रहती थी और वे मुझे लेकर लड़कों के साथ खेलने जाते थे तो लड़कों के साथ गुल्ली डंडा और कबड्डी खेलने की याद मुझे खूब स्पष्टता से है।

खेल में लड़के-लड़कियां सभी कभी न कभी बेईमानी कर देते थे तो झगड़ा हो जाता और तुरन्त छोटी उंगली आगे बढ़ाकर हम कुट्टी कर लेतीं। बोलना भी बन्द हो जाता। मजेदार स्थिति तब होती जब जिससे अबोल होते और अनजाने में यदि उससे बोल पड़ते तब वह या तो मुंह बिचका लेतीं या कोई तो हलके से थूक भी देतीं। ‘दगड़िया’ (गहरी सहेली) बनाने का बड़ा शौक होता था, बिना ‘दगड़िया’ वाली लड़की मानो असफल इंसान होती। हम छोटी-छोटी 12 वर्ष से छोटी आयु की बच्चियों के बीच ऐसी लड़की की खूब टीका-टिप्पणी होती।

उस उम्र की एक घटना याद आती है। मेरे बाबूजी के मित्र थे अन्तीलाल साह, जो गांधी टोपी पहनते, खादी का कुर्ता भी शायद पहनते थे। पर यह पूर्णतया याद है कि हर समय उनके हाथ में कतुआ रहता था। वे कताई करते रहते थे, लोग उन्हें  गांधी का चेला या कांग्रेसी कहते थे, बाबूजी उनसे कहते, ‘‘अन्तीदा! कभी तुम्हें पुलिस पकड़ ले जाये तो कोई आश्चर्य नहीं।’’ सचमुच एक दिन स्कूल के ‘‘मध्याह्न’’ में हम पास की बाजार में एक डबल (पैसे) का काबुली चना खरीदने गई थीं तब देखा, अन्तीलाल साह जी जोर-जोर से ‘‘महात्मा गांधी की जय, भारत माता की जय’’ चिल्ला रहे थे और स्थानीय पटवारी तथा एक अन्य वर्दीधारी उनके हाथ बांधकर उन्हें ले जा रहे थे और बीच-बीच में एक डंडे से उनकी पीठ व टांगों में मार भी रहे थे। हर चोट पर साहजी ‘‘महात्मा गांधी की जय’’ का नारा  लगाते थे। लड़कियों की आंखों में आंसू आ गये और महात्मा गांधी के उस आदमी के प्रति सहानुभूति का दरिया उमड़ पड़ा। साह जी को लगने वाले डंडे हमारे बालमन के अनुसार मानो गांधी जी को ही लग रहे थे। ‘‘ये कैसे हैं जो गांधी जी के लिए निर्दयता करते हैं। छि, हम बच्चियां आपस में  कह रही थीं। साहजी को लेकर पुलिस गई और हम अपना दोपहर का नाश्ता चना चबाने लगीं। परन्तु कई दिनों तक हमारे मस्तिष्क में साह जी की गिरफ्तारी की सहानुभूति पूर्ण याद बनी रही।

बचपन में रामलीला देखना एक कौतुकपूर्ण घटना होती थी, जिन सामान्य से लड़कों को सड़क पर, घर पर या बस्ता पकड़े हुए स्कूल जाते देखती थी, उन्हें ही राम-लक्ष्मण व सीता की वेशभूषा में सजे-संवरे मंच पर उतरते देखकर मुझे विचित्र-सा ही लगता था। हमारे साथ पढ़ने वाली कमला के ताऊ दशरथ बनकर विलाप करते व उसके बाबूजी रावण के रूप में लगातार नाचते हुए अट्टहास करते थे। राम से युद्घ के पूर्व वे बड़े भाव भरे बुलन्द स्वर में गाते थे, ‘‘वह दिन भी कितने सुन्दर थे, जब इस जीवन में बचपन थाऽ’’.. ज्यों ही चौपाई का स्वर छिड़ता, ‘‘घन घमंड नभ गरजत घोरा, पियाहीन डरपत मन मोरा..’’ और राम के हाथ का रुमाल उसकी आंखों तक जाता हम लड़कियों के पलकों में बैठे हुए आंसू गालों पर बह निकलते। हमारे पीछे बैठी महिलाएं बोल उठती, शिबौऽऽ भगवान को भी रोना पड़ रहा है।’’

अपने घर से जो बोरा बैठने के लिए हम लाते थे, उसके नीचे से मक्का के खुमे चुभते रहते थे पर हम तो भवानीलाल के एकता नृत्य में मगन हुई रहतीं। पायलों की झंकार और चूड़ियों की खनखनाहट। भवानीलाल अविवाहित युवा था। बहुत ही स्त्री भाव वाला, इतना कि रामलीला के बारह दिनों तक अपनी कलाइयों को चूड़ियों से भरी रखता और हम बच्चों को अपनी सुन्दर चूड़ियां दिखाता फिरता था। मंच पर आता तो उसके होंठ लाल होते, माथे पर बड़ी-सी लाल बिन्दी होती और गालों व ठुड्डी पर चमकते सितारे चिपके होते थे। इस सौन्दर्यपूर्ण व कलापूर्ण दृश्य को देखने में हम संसार ही भूल जाती। एक ही परेशानी होती कि साथ बैठी लड़कियां बैठे-बैठे इतना धकियाती कि कभी-कभी मैं अपने बैठने के बोरे से ही बाहर डाल दी जाती। तब झगड़ा भी होता और मुझे लगता कि वे लड़कियां बहुत जबर्दस्त होती थीं। रामलीला के भावना ज्वार में सब कुछ सहज हो जाता। केवल बारह दिन ही नहीं, उसके बाद भी एकाध सप्ताह तक पूरे गांव में रामलीला की हवा तैरती रहती। उन दिनों हम बच्चे पइयां की डाली से धनुष व तीर बना लेते और राम-लक्ष्मण के हाथों में दे देते और फटे चिथड़ों से बनी एक गदा रावण के हाथों में, ‘‘अरे बालक क्यों बरबस मृत्यु के मुंह में जाना चाहता है।’’ एक बच्चा रावण अपनी कमर ठसकाकर कहता तो दूसरा बच्चा (राम) धनुष-बाण लेकर कहता, ‘दुष्ट रावण तेरे पापों का घड़ा भर गया, तेरा काल सामने आया है,’’ हम कभी कैकयी को मनाते, दशरथ बनते, समुखि, सुलोचनि पिकवयनी गाते हुए, तो कभी शूर्पणखा बने भवानीलाल की तरह नखरे करते हुए गाते… ‘‘मुझे वर लीजे..।’’ कितनी छोटी सरल सी बातों में हमारे जीवन का अद्भुत आनन्द समाया हुआ था? आज आश्चर्यपूर्ण मन से उसे याद करती हूं तो हृदय भर जाता है। सच ही है आनन्द हमारे अन्दर समाया होता है। वही बाहर छलकता है। बाहरी चीजें तो निमित्त बनती हैं।
(Childhood Memoirs of Radha Bhatt)

यों तो हमारे बचपन में कष्टों की भी कमी नहीं थी, परन्तु हमने उस समय उनको सामान्य जीवन की अनिवार्यता मान लिया था। था भी ऐसा ही कि हमारे आस-पास के सभी बच्चे कमोबेश वैसा ही जीवन जी रहे थे। शायद हम बहनें गांव की अन्य लड़कियों से कुछ ज्यादा श्रम करती थीं, करना ही होता था।

बांज (ओक) के पेड़ों पर चढ़कर चारे के लिए पत्तियां काटना मैंने कब प्रारम्भ किया, यह मुझे याद नहीं आता, पर मेरे बचपन का यह एक मुख्य कार्य बन गया था। मेरे साथ अधिकतर कान्ति रहती थी, वह उन टहनियों में से फुनागियां तोड़कर इकट्ठा करती व गट्ठर बनाती। तब हम दोनों बहनें भारी गट्ठर सिर पर उठाये चढ़ाई-उतार वाली पगडंडियों पर अपने पैर जमाती हुई घर को जातीं। वजन उठाना गर्दन, पीठ और कमर को ठस कर देता। पर हमें यह तो रोज ही करना था, जाड़ों में हरी पत्तियों के गट्ठर, चौमासे में हरी घास के गट्ठर और हमेशा ही सूखी लकड़ियों के गट्ठर ढोना। पहाड़ की नारी की निर्धारित किस्मत थी, वह हमें भी बचपन से ही विरासत में मिली थी।

जब तक बाबूजी ने हमारे आंगन में पानी नहीं पहुंचाया, तब तक पानी ढोना हमारे लिए एक और भी कष्टकारक (कष्टकारक आज की दृष्टि से लिख रही हूं) काम था। तब तो कष्ट नहीं लगता था। विभिन्न मौसमों में जल की उपलब्धता के अनुसार हम लगभग एक किमी़ की चढ़ाई में अथवा सर्दी के पाले से ठिठुरती उंगलियों के साथ, सिर पर पानी से भरे बरतन से छलकते पानी से भीगते कपड़ों के साथ पानी ढोती थीं। कपड़े धोने के लिए तो इससे भी दूर नीचे नदी में सप्ताह भर के गन्दे कपड़ों का गट्ठर लेकर जाती थीं। शौली के वन से सर्दियों की छुट्टियों में 5 किमी़ से अधिक दूरी से घास के भारी गट्ठर के साथ चलने का थोड़ा उल्लेख कहीं पहले हो चुका है, जब  मेरी उम्र 14 से 16 वर्ष के बीच रही होगी। तब पशुपालन जीवन का एक आवश्यक अंग था और सर्दियों में कहीं से भी हरी घास लाना व दुधारू गाय या भैंस को खिलाना जरूरी होता ताकि उसके दूध की मात्रा घटे नहीं, यह प्रयत्न हम जी-जान से करती थीं। हमारी गाय थी जमुना। बहुत चिकनी व सुन्दर और बड़ी सरल। जब मां उसका दूध निकालने की स्थिति में नहीं होती, तब हम दो-तीन बहनें एक साथ दूध दुहने जातीं। मैं एक हाथ से एक गिलास में उसका दूध निकालती। दूसरी बहन बाल्टी पकड़े रहतीं। उसमें मे गिलास का दूध डाल देती और फिर से दूसरे थन को गिलास में दुहने लगती पर कभी नहीं हुआ कि जमुना ने पैर भी उठाया हो। बस वह खड़ी रहती। हमारे अनगढ़ हाथों के खिलवाड़ सहती रहती, जमुना वास्तविक गऊ थी। उसको दुहने से ही मैंने दूध दुहना सीखा था परन्तु हमारी ऐसी प्यारी गौमाता एक दिन बीमार पड़ी क्योंकि उसने अंयार वृक्ष की ऐसी कोमल पत्तियां खा ली थीं जो जहरीली होती हैं। मुझे आज भी याद है, वह धरती पर चारों पैरों को फैलाकर पड़ी थी, उसके मुख से झाग निकल रहा था, ईजा ने अपनी जानकारी का सारा इलाज, जड़ी-बूटी आदि आदि घोल-पीसकर उसे पिला दिया था, पर वह तो मरण पथ पर ही जा रही थी।

हम सब बच्चे और हमारी ईजा उसको घेरे हुए बैठे थे। उसकी कोमल सुन्दर पीठ, गर्दन व चेहरे पर हम हाथ फिरा रहे थे और उसकी कजरारी आंखों से आंसू बहने लगे थे, विदा वेला आ गई थी। ईजा सहित हम आंसुओं में नहा रहे थे। तब पशु चिकित्सा केन्द्र शायद नहीं होगा। जमुना के गले से घर-घराहट की आवाज आने लगी। ‘‘बस अब नहीं बचेगी मेरी गइया,’’ कहकर रोती हुई ईजा गौशाला से बाहर चली गईं, मैं उनके पीछे-पीछे गई, ‘‘ईजा आपने जमुना को गोठ से बाहर खोला ही क्यों? वह गोठ में ही रहती तो अयांर की पत्ती नहीं खाती, हमारी जमुना…’’ मैं जमुना के बिना अपने घर-परिवार की कल्पना नहीं कर पा रही थी। ईजा ने किंकर्तव्यविमूढ़ सी होकर आकाश की ओर देखा और बोलीं, ‘‘देख, चील हमारे ऊपर मंडरा रहे हैं। उसे पता चल गया है कि यहां कोई पशु मर रहा है।’’ जमुना अपनी दस माह की बेटी और हमें रोता छोड़कर चली गई। जमुना की बछिया गोठ में रहती तो रंभाती रहती, इसलिए ईजा रसोई बनाते या घर के अन्य काम करते हुए उसे हमारे रहने के कमरों के पास की गलियों में ले आतीं। बछिया मेरी ईजा में ही अपनी ईजा का प्यार पाती हुई चुपचाप बैठी रहती।

एक शीतकाल की बात है, हमारी गोठ (गौशाला) में एक नई बछिया आई, उस जमाने में पर्वतीय क्षेत्र के बहुत सारे गांवों के निवासी रवि की फसल संभालकर गेहूं की बुआई हो जाने पर अपने पशुओं सहित पूरे परिवार के परिवार भाबर को चले जाते थे। तीन माह वहीं रहकर होली के बाद वापस पहाड़ को आते थे। अपने गांव से हल्द्वानी व उसके आसपास के इलाके में पहुंचने तक उन्हें कई पड़ाव रात्रि विश्राम के लिए करने पड़ते थे। तल्ला रामगढ़ उनका एक पड़ाव होता था। नदी के किनारे किसी खेत में वे रुक जाते थे। सुबह मुंह अंधेरे ही उठकर वे चल पड़ते। गायों-भैंसों के गलों में बंधी घंटियां बज उठतीं, घनमन.. घनमन..। सुबह की मीठी नींद में हम उनका यह संगीत सुनते थे। ईजा भी इसी संगीत का सहारा लेकर हमें उठाती, ‘‘उठो-उठो भबरिये चलने लग गये हैं, सुबह हो गई है।’’

एक दिन ईजा की नजर मुख्य पैदल सड़क से हमारे घर की ओर आने वाली पतली पैदल बटिया पर एक सफेद-सी चीज पर पड़ी। वह एक बछिया थी- पूरे दिन वह वहीं बैठी रही। शाम होने से पहले ईजा ने कहा- ‘‘गौमाता का पूत भूखा-प्यासा पड़ा है। मुझे लगता है उसके मालिक ने उसे छोड़ दिया है। मैं इन्तजार कर रही थी, उसे लेने कोई आयेगा। अब कोई नहीं आयेगा। चलो, हम उसे ले आते हैं। पानी पिलायेंगे, घास खिलायेंगे।’’
(Childhood Memoirs of Radha Bhatt)

हम दो-तीन बच्चे ईजा के साथ गये। बछिया उठाने पर भी अपनी टांगों पर खड़ी नहीं हो पाती थी, ‘‘थक गई है तभी इसका मालिक इसे छोड़ गया है।’’ ईजा ने अपनी बांहों में उठाते हुए कहा, हमने ईजा की बांहों में उठाई उस बछिया का एक ओर सिर थामा तो दूसरी ओर टांगों को पकड़ा। किसी तरह उसे घर लाये। ईजा ने उसे पानी दिखाया पर वह सिर ही नहीं उठाती थी तब ईजा ने उसका मुंह खोलकर उसमें धीरे-धीरे पानी डाला। बछिया की आंखों में कुछ तेज आया। उसे कुछ पुष्ट भोजन चाहिए था। अत: पानी की तरह ही उसके मुंह में दूध डाला, धीरे-धीरे बछिया में प्राण संचरित हो गया और अगले सालों में वह हमारी गौशाला की सुन्दर कलोड़ हो गई।

पशु-प्रेम बाबूजी में भी खूब था पर ईजा का तो विशेष आत्मीयता भरा प्रेम था। द्वितीय विश्वयुद्घ के बाद जब लोगों को राशन का अनाज, वह भी गेहूं-चावल नहीं, बाजरा और सड़ा-सा चावल सीमित मात्रा में मिलता था, तब भी ईजा अपनी भैंस व गाय के लिए प्रतिदिन ‘दौ’ पकाने का क्रम नहीं तोड़ती थी। परिवार के ही आटे-चावल से दो मुट्ठी अन्न निकालकर उसमें हमारे बाड़े की सब्जियां या बिच्छू घास डालकर ‘दौ’ की बड़ी कढ़ाही भरकर पशु आहार तैयार कर देती और जब उस कढ़ाही को सामने ले जाने पर भैंस अपनी गर्दन व सिर हिलाती हुई ‘‘हूं-फूं’’ करती तो ईजा को बड़ा आनन्द आता, रुक, तुझे देने के लिए लाई हूं। मैं भी उस छोटी-सी उम्र में इस आनन्द को, पशु और इंसान के इस प्यार को पहचान लेती थी। इसे देखने व इस आनन्द को अपने भीतर महसूस करने के लिए ही मैं ईजा के साथ पीछे-पीछे जाती थी, आज सोचती हूं, इस प्रकार बिना मौखिक शब्दों के भी हमको, यानी हमारे जीवन को ईजा से कितना मिला था? जिसने हमारे जीवन को गढ़ा? ये रोजमर्रा की छोटी दिखने वाली घटनाएं हमारे जीवन की बुनियाद गढ़ रही थीं।

क्रमश: …
(Childhood Memoirs of Radha Bhatt)

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