एशियन गेम्स 2018 और महिलाएँ

गंगोत्री त्रिपाठी

2018 के एशियन गेम्स में महिलाओं के उत्कृष्ट प्रदर्शन के कई आयाम सामने आये। कई नये कीर्तिमान स्थापित हुए और इन सब से एक बात जो प्रत्यक्ष रूप से दिखाई दी, वह थी उनकी जिजीविषा, उत्कृष्ट को पाने की उनकी चाहत, कई विषम परिस्थितियों से लड़कर आने का उनका संघर्ष तथा हार न मानने का फौलादी इरादा। विभिन्न सामाजिक, आर्थिक कारण अभी भी हमारे देश में बालिकाओं को खेल से हतोत्साहित करते हैं। माता-पिता अमूमन पढ़ाई-लिखाई हेतु बालिकाओं को प्रोत्साहित करते हैं परन्तु खेल के साथ जुड़ी समय, धन तथा रोजगार से जुड़ी अनेक अनिवार्यताओं के चलते कई प्रतिभाएँ उभर नहीं पातीं। अभी भी जरूरी संसाधनों का अभाव हमारे विद्यालयों में बना हुआ है, पर इसका अर्थ यह नहीं कि स्थिति नैराश्यपूर्ण है जैसा कि एशियाड में दिखा। अधिकांश प्रतिभागी ग्रामीण पृष्ठभूमि की हैं। उनकी अदम्य जिजीविषा, खेल के प्रति उनकी लगन तथा परिवारजनों का सहयोग ही उन्हें उनकी मंजिल तक पहुँचा पाया।
(Asian Games 2018 and Womens)

एशियन गेम्स 2018 की उपलब्धियों को देखें तो यह न देखते हुए कि उन्होंने स्वर्ण पाया या रजत या महज काँस्य से ही संतोष किया, उन्होंने कई नये कीर्तिमान बनाये, कई मिथक तोड़े, कई नये खेलों में प्रदर्शन किया। कुछ उपलब्धियाँ ये हैं- 4×400 मीटर दौड़ में हिमा दास, एम.आर. पूवम्मा, वी. वेल्लुवा कोरोथ व सरिता बेन गायकवाड़ ने स्वर्ण पदक जीता। 2002 से लगातार जीत। पीयू चित्रा को दौड़ में काँस्य पदक (1500 मीटर), डिस्कस थ्रो में 35 वर्षीय सीमा पूनिया ने 62.26 मीटर की दूरी नापी। उनका 6 साल में यह सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन था और उन्होंने काँस्य पदक प्राप्त किया। कुराश में देश को एशियाई खेलों का पहला रजत पदक दिलाने वाली पिंकी बल्हारा, उम्र 19 वर्ष, ने तो विषम परिस्थितियों से जीतने की ऐसी मिशाल कायम की, जिसकी कोई तुलना नहीं। पहले चचेरे भाई की मृत्यु, फिर हृदयाघात से पिता की मृत्यु, पिता जो उन्हें प्रैक्टिस के लिये मुनीरका स्थित बाबा गंगानाथ अकादमी लेने और छोड़ने जाते थे और उनके साथ जकार्ता जाने वाले थे, और थोड़े ही दिनों में दादा की मृत्यु। ऐसे में अन्तर्राष्ट्रीय जुडो का माया समुंदर टोकस के प्रोत्साहन से, लोगों के ताने और नजरों से बचने के लिये उसने छुपकर प्रशिक्षण शुरू किया। इसी दौरान पिंकी को सीनियर नेशनल, जूनियर नेशनल और एशियाई खेलों का ट्रायल देना था। कुराश कुश्ती का एक प्रकार है जिसमें खिलाड़ी प्रतिद्वंद्वी को पकड़ने के लिये तौलिये का इस्तेमाल करता है और उसे नीचे गिराने की तैयारी करता है। इस खेल को पहली बार एशियाई खेलों में शामिल किया गया है। कुराश में ही मालाप्रभा यलप्पा जाधव ने काँस्य पदक जीता, डिस्कस थ्रोअर सीमा पूनिया ने 62.26 मीटर डिस्कस फेंक काँस्य पदक जीता। सीमा लगातार चार राष्ट्रमण्डल खेलों, दो एशियाड और तीन ओलंपिक में खेलने वाली देश की पहली खिलाड़ी बन गई। सीमा ने जो सोनीपत के गाँव खेवड़ा की है, राष्ट्रमण्डल खेलों में 2006 में रजत, 2010 में काँस्य, 2014 में रजत और 2018 में रजत जीता है। 2014 में इंचियोन एशियाड में स्वर्ण जीता था।
(Asian Games 2018 and Womens)

दुतीचंद: एक ऐसा नाम जिसने 100 मीटर की फर्राटा दौड़ में 11.32 सेकेंड के साथ रजत पदक जीता। फोटोफिनिश में स्वर्णपदक से चूंकीं। 20 वर्ष बाद दुती ने 100 मीटर में रजत पदक दिलाया। इसके अतिरिक्त उन्होंने 200 मीटर दौड़ में भी रजत प्राप्त किया। ओडिशा के बुनकर दम्पति की बेटी ने ट्रैक पर वापसी के लिये कड़ा संघर्ष किया है। पिछले एशियाई खेलों की टीम से इंटरनेशनल एथलेटिक फेडरेशन की हायपरएंड्रोजेनिज्म (पुरुषत्व के लक्षण, पुरुष हारमोन टेस्टोस्टेशन की अधिकता) की पालिसी के तहत दुती प्रतिबंधित हो गई थी। उसके खिलाफ कानूनी लड़ाई लड़ने वाली उनकी वकील मित्र पायुषनी मित्रा को दुती ने कहा कि अगर वे नहीं होतीं तो शायद वह इन खेलों में नहीं होती। उन्होंने हैदराबाद में कोच एन. रमेश के साथ चार के बजाय दिन में आठ-आठ घंटे तैयारी की। महिला तीरंदाजों- सुरेखा ज्योति वैत्रम, मुस्कान किरार, मधुमिता को रजत पदक, 56 साल में बैडमिंटन फाइनल में पहुँचने वाली पहली शटलर बनीं पी.वी. सिन्धू रजत पदक प्राप्त किया। वे दुनिया की तीसरे नम्बर की खिलाड़ी हैं। साइना नेहवाल ने 36 साल बाद बैडमिंटन की व्यक्तिगत स्पर्धा में पदक दिलाया। केरल के मजदूर की बेटी बी.बीना ने लम्बी कूद में 6.51 मीटर की कुदान भर रजत पदक जीता। उनका एशियाई खेलों में यह पहला पदक है। उन्होंने सीजन का अपना श्रेष्ठ स्थान हासिल किया। महिला हाकी टीम ने रजत पदक जीता। र्सेंलग में 49 ई.आर.एफ.एक्स. में वर्षा-श्वेता की जोड़ी को रजत, ओपन लेजर 4.7 में र्हिषता तोमर को काँस्य पदक मिला। टेबिल टेनिस में मनिका-शरत कमल मिक्स डबल में काँस्य पदक मिला।
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महिला कबड्डी टीम की कप्तान पायल चौधरी के सपनों को साकार करने में पति का अहम योगदान रहा। भारतीय महिला टीम को कबड्डी में रजत पदक मिला। कुश्ती में सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करते हुए विनेश फोगाट ने स्वर्णपदक जीता। उनका व उनके परिवार का नाम अब किसी के लिये अनजाना नहीं। ‘दंगल’ फिल्म ने कुश्ती व उनके परिवार के संघर्ष को घर-घर में स्थापित किया व प्रेरणा दी, उन अनेक प्रतिभावान बालिकाओं को जो इन मिथकों को तोड़ना चाहती हैं कि कुछ खेल पुरुषों के लिये ही हैं। निशानेबाज हीना सिद्धू ने दस मीटर एयर पिस्टल स्पद्र्धा में काँस्य पदक जीता। यह एशियाड का पहला व्यक्तिगत पदक था। टेनिस में अंकिता रैना ने काँस्य जीता। एक और उल्लेखनीय उपब्धि 21 वर्षीय स्वप्ना वर्मन जो एक रिक्शा चालक पिता तथा चाय बागान में मजदूरी करने वाली माँ की सुपुत्री है, ने हेप्टाथेलेक में स्वर्ण पदक पाकर पहली इंडियन हेप्टाविलीट होने का गौरव प्राप्त किया। उनके दोनों पैरों में 6-6 उंगलियाँ होने के कारण उन्हें जूते पहनने में बहुत दिक्कत होती है। खेल के दिन दाँत में दर्द होने के बावजूद उन्होंने इस कारनामे को अंजाम दिया। इसके अतिरिक्त ईरान की कबड्डी टीम की कोच एक भारतीय महिला शैलजा हैं जिनके प्रयासों से ईरान को कबड्डी में स्वर्ण पदक मिला।

यह सम्भव है कि एशियाड 18 में महिलाओं की उपलब्धियों में कुछ नाम मुझसे छूट गये हों, कुछ वे भी होंगी जो भरसक कोशिश के बावजूद मेडल न ले पाई हों, इससे उनका संघर्ष या काबिलियत कम नहीं होती। उत्तराखण्ड के ग्रामीण इलाकों में रहने वाली बालिकाओं को अगर पर्याप्त प्रोत्साहन मिले तो उनमें से भी अनेक खेल प्रतिभाएँ निखर कर आ सकती हैं क्योंकि उन्हें अपनी रोजमर्रा की जिन्दगी में कठिन परिश्रम करना पड़ता है। हम महिलाएँ इतना तो कर ही सकती हैं कि यदि किसी बालिका में आरम्भ से ही ऐसी प्रतिभा दिखे तो उसके पर्याप्त प्रशिक्षण, पोषण की व्यवस्था हेतु प्रयास करें। कैसे आकाश में सुराख नहीं हो सकता, एक पत्थर तो तबियत से उछालो यारो।
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