मानसिकता बदलने की जरूरत

Article by Bharti Joshi

-भारती जोशी

16 दिसम्बर की रात दिल्ली में पैरामेडिकल की छात्रा के साथ 6 लोगों ने चलती बस में दरिंद्गी की थी। गंभीर जख्मों के कारण 26 दिसंबर को सिंगापुर में इलाज के दौरान निर्भया की मौत हो गई थी। झकझोर देने वाली इस घटना को देखकर पूरे देश में जन आक्रोश फैल गया और पूरा देश दोषियों के फांसी की सजा की मांग करने लगा। 9 महीने के बाद यानी सितम्बर 2013 में निचली अदालत ने 5 दोषियों राम सिंह, पवन, अक्षय, विनय और मुकेश को फांसी की सजा सुनाई थी। मार्च 2014 में हाईकोर्ट और मई 2017 में सुप्रीम कोर्ट ने फांसी की सजा को बरकरार रखा था। निर्भया के दोषियों को फांसी की सजा तय हो जाने के बावजूद तमाम कानूनी पैंतरों के चलते अभी तक सजा नही मिली है, जिससे देश में न्याय प्रक्रिया के प्रति आक्रोश की भावना बढ़ रही है।  इन्हीं मुद्दों को ध्यान में रखते हुए अमर उजाला नैनीताल ने 6 फरवरी 2020 को एक परिचर्चा संवाद का आयोजन किया, जिसमें नगर की तमाम महिलाओं ने निर्भया और महिला मुद्दों पर विचार-विमर्श और बात-बहस की।
(Article by Bharti Joshi)

परिचर्चा में महिलाओं ने अलग-अलग विचार रखे। कुछ महिलाओं ने कहा कि निर्भया जैसे जघन्य अपराधों में अपराधियों के लिए न्याय व्यवस्था जैसा कोई प्रावधान होना ही नहीं चाहिए, दोषियों के लिए दया याचिका का प्रावधान कोई मायने नही रखता। निर्भया जैसे मामलों में जल्दी न्याय न मिलने की वजह से लोगों का न्याय व्यवस्था से विश्वास उठता जा रहा है। त्वरित न्याय के लिये फास्टट्रैक कोर्ट जरुरी है। न्याय व्यवस्था ऐसे अपराधों को शह देने का काम करती है, ऐसे जघन्य अपराधियों को बीच सड़क पर पेट्रोल डाल कर जला देना चाहिए। बहस को आगे बढ़ाते हुए कुछ महिलाओं ने कहा की न्याय और कानून व्यवस्था का अपना एक तरीका होता है, हम किसी भी दोषी को बिना उसका पक्ष सुने फांसी पर या पेट्रोल डालकर बीच सड़क पर नही जला सकते हैं, हम कानून व्यवस्था को अपने हाथ में नही ले सकते हैं, क्योंकि कभी-कभी पुलिस जन आक्रोश और मामला निपटाने के चलते जल्दबाजी में बेकसूर लोगों को भी पकड़ लेती है, जैसा कि गुरुग्राम के रयान इण्टरनेशनल स्कूल में हुए प्रद्युम्न ठाकुर मर्डर केस में देखने को मिला था, जिसमें पुलिस ने मामला जल्दी निपटाने के चलते निर्दोष बस कंडक्टर को मुख्य आरोपी बना दिया था जबकि बाद में सी़बी़आई ने जांच द्वारा यह साबित किया कि मुख्य आरोपी बस कंडक्टर नही बल्कि उसी स्कूल का ग्यारहवीं में पढ़ने वाला दूसरा छात्र है जिसने परीक्षा और पीटीएम को रद्द करने के लिए दूसरी कक्षा के छात्र प्रद्युमन की हत्या कर दी थी़ इसीलिए न्याय व्यवस्था के तहत संदिग्ध दोषियों को अपना पक्ष रखने का मौका दिया जाता है। हांलाकि निर्भया के दोषी किसी भी अदालत में यह साबित नही कर पाये हैं कि वे निर्दोष हैं। अदालत ने उन्हें फांसी की सजा सुनाई है। जल्द से जल्द उन्हें फांसी होना तय है।

सवाल यह उठता है कि हम कब तक देश में निर्भया जैसे जघन्य अपराध होने देते रहेंगे और फिर अपराधियों के लिए यूँ ही फांसी और मृत्युदंड की मांग करते रहेंगे? आखिर कब तक? हमें इस बात पर विचार करना होगा कि निर्भया जैसे अपराधों की जड़ को ही खत्म किया जाय। महिलाओं को गलत तरीके से छूना, उसे घूरना, महिला सम्बन्धी गालियों का इस्तेमाल करना, महिलाओं के लिए तमाम ऐसे दकियानूसी नियम बनाना जो महिलाओं को पुरुषों के सामने दोयम कर देतीं है, भी उतना ही बलात्कार के समान है जितना कि उसे शारीरिक उत्पीड़न देना। हमें अपने परिवार, अपने घर, अपने पड़ोस और अपने शहर से ही महिलाओं के साथ होने  वाले इन अलग-अलग तरीके के बलात्कारों को खत्म करने की शुरुआत करनी होगी। जिस तरह एक फूल का खिलना उसकी सिंचाई और उसके आस-पास के वातावरण पर निर्भर करता है, ठीक उसी प्रकार एक बच्चे की परवरिश और उसके आस-पास का माहौल उसे एक ऐसा इंसान बनाता है जो वह आज है। हमे अपने घरों में बच्चों के लिए ऐसा माहौल तैयार करना होगा जिसमें बच्चों को सेक्स जैसा शब्द हव्वा न लगे। जिसमें एक बच्चे को उसकी माँ, उसके पिता के सामने दोयम न नजर आये। एक लड़के को उसकी बहन खुद से कमजोर न लगे।
(Article by Bharti Joshi)

कुछ महिलाओं का कहना था कि, महिलाओं को पुरुषों से ज्यादा महिलाओं द्वारा ही शोषित किया जाता है, चाहे घर पर देख लीजिये या कार्य क्षेत्र में, महिलाएं ही महिलाओं को आगे नही बढ़ने देती हैं, जरुरत है कि महिलाओं को एक-दूसरे को शोषित करने की बजाय एक-दूसरे के पक्ष में खड़ा रहना चाहिए। बहस को बढ़ाते हुए महिलओं ने कहा कि ऐसा नही है कि कुछ महिलाएं या पुरुष महिलाओं का शोषण करते है, उनका कहना था कि शोषण हमेशा ही पुरुषवादी और पितृसत्तात्मक मानसिकता करती है़ उस सोच के दायरे में महिलाएं भी होती है और पुरुष भी, क्योंकि पितृसत्तात्मक सोच हमें हमारा समाज और हमारी कंडीशनिंग देती है।

अगर कुछ महिलाएं, अपने ही घर की दूसरी महिलाओं का शोषण कर रही है तो इसका मतलब यह होता है कि उनमें पुरुषवादी मानसिकता का वर्चस्व है, जो उन्हें समाज और परिवार ने ही दी है और उस मानसिकता और विचार के चलते जिसमें आदमी प्रथम होता है और औरत दोयम होती है, वह दूसरी माहिला का शोषण कर रही है। मसला पुरुष और महिला का है न कि सोच और विचार का है। हमें अपने समाज और परिवारों  की मानसिकता को बदलने की जरुरत है जो सिखा के नहीं बल्कि हमारे द्वारा की गई और बोली गई चीजों से बदलेगा।
(Article by Bharti Joshi)

मैं एक पंछी
दायरे से घिरे पिंजरे में
कभी कैद हुआ करती थी
नीले आकाश को देख
वहां उड़ने की अभिलाषा रखती थी
सालों आवाज उठाई, वक्त बदला
तब जाकर पिंजरे का द्वार खुला
आजाद हूँ मैं अब
ये देख मैं खुशी से चहक उठी
उसी वक्त पंखों से उड़ान भरकर
आकाश की और निकल पड़ी
नीचे नजर पड़ी तो देखा
मेरे जैसे कितने पंछी
शिकारी के जाल में फंसे है
कितने तो मर गए
जो बच गए अपनी जान की
दुहाई लगाये बैठे हैं
ये सब देख रूह कांप उठी
डरी सी, सहमी सी मैं
फिर वापस पिंजरे में आ गई
तब लगा आजादी तो सिर्फ पिंजरों से मिली थी
शिकारी जालों से नही।

शिकारी जालों से नहीं
उषा पाण्डे

कुछ महिलाओं ने कहा की हमें अपने घरों के लड़कों को अच्छे संस्कार देने चाहिए, हमें उन्हें सिखाना होगा कि उन्हें लड़कियों की इज्जत करनी चाहिए, हमे उन्हें बताना होगा कि जब आप बाहर जाते हैं तो आपको किसी लड़की को छेड़ना नही चाहिए, ये कोई दूसरा लड़का आपकी बहन के साथ भी कर सकता है। इस पर कुछ दूसरी महिलाओं का कहना था कि किसी लड़के को ये सिखाने की जरुरत नही होनी चाहिए कि वह दूसरी लड़कियों की इज्जत करे या लड़कियों को ना छेड़े। हमें बच्चों को ऐसा माहौल और परिवरिश देनी चाहिए की ये सब उनके व्यक्तित्व में खुद से ही आ जाये। अभिवावकों को जरुरत है कि वह अपने बच्चों के साथ दोस्त बन कर रहें, जिससे बच्चे उनसे खुलकर बात कर सकेंगे।

किशोरावस्था में अभिवावकों को अपने बच्चों का सबसे अच्छा दोस्त बन जाना चाहिए क्योंकि किशोरावस्था में ही बच्चों में हार्मोनल परिवर्तन आते हैं। हमारी सरकारें और शिक्षण संस्थान यौन शिक्षा को लेकर गंभीर नही है, उन्हें खुद इस विषय को स्कूल में लागू करवाने में झिझक है। यही वजह है कि आज भी देश के कई सारे स्कूलों में बच्चों के लिए यौन शिक्षा जैसा कोई प्रावधान नही है। शिक्षण संस्थानों को बच्चों के लिए यौन शिक्षा अनिवार्य करवानी चाहिए।
(Article by Bharti Joshi)

उत्तरा के फेसबुक पेज को लाइक करें : Uttara Mahila Patrika