अलेक्जेन्द्रा कोलन्ताई : एक व्यक्तित्व

चन्द्रकला

अलेक्जेन्द्रा कोलन्ताई (9 मार्च 1872-7 मार्च 1952) के विचारों पर आधारित, कैथी पार्टर द्वारा लिखित व लाल बहादुर वर्मा द्वारा हिन्दी में अनूदित, संवाद प्रकाशन मेरठ से प्रकाशित पुस्तक’समाजवाद में स्त्री-पुरुष समता का संघर्ष’ पढ़ने को मिली। यह पुस्तक पढ़ते हुए आज के दौर में कोलन्ताई के विचारों की प्रासंगिकता शिद्दत से महसूस हुई। हमारे देश में आज स्त्रियों की स्थिति और उनके साथ किये जाने वाला भेदभाव उस दौर के रुसी समाज से काफी मिलता-जुलता है। भले ही भारतीय समाज सतह पर पूँजीवादी नीति-नियमों के अनुरूप संचालित होता दिखता हो लेकिन वास्तविकता यही है कि आज भी हमारा समाज परम्परागत मान्यताओं, सामन्ती मानसिकता व पितृसत्तात्मक मूल्यों से ही संचालित होता है। राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक व सांस्कृतिक व्यवहार व विचारों में यह मानसिकता गहरे धँसी हुई है और स्त्रियों का जीवन इनसे सबसे अधिक प्रभावित होता है।

‘‘मेरे जीवन के विभिन्न काल इतने भिन्न रहे हैं कि मुझे लगता है कि मैंने एक नहीं अनेक जीवन जिये हैं। मेरा जीवन आसान नहीं रहा, कभी भी फूलों की सेज नहीं रहा- पर मेरे जीवन में सब कुछ था, उपलब्धियाँ, बेहद कठिन श्रम, मान्यता, लोकप्रियता, उत्पीड़न, घृणा, कैद, असफलताएँ और नारी समस्या तथा यौनिक मुद्दों के प्रति सही समझ की कमी, मित्रों से दुखदायी संबंध-विच्छेद, उनसे झड़पें पर अंतत: पार्टी में लम्बे समय तक दोस्ताना कामकाज़…..”। ये पंक्तियां रूसी क्रान्ति की तपिश में लौह बनी अलेक्जेन्द्रा कोलन्ताई की हैं। उन्होंने अपनी ही पार्टी के साथियों के साथ कई तरह के वैचारिक अवरोधों का सामना किया था। अलेक्जेन्द्रा कोलन्ताई रूसी समाज-क्रान्ति पूर्व समाज व क्रान्ति के बाद का समाज, के सर्वोत्तम का प्रतिनिधित्व करती थी। सामाजिक सरोकार, सौंदर्य, प्रखरता और प्रभावशाली व्यक्तित्व का ऐसा असाधारण समन्वय किसी भी समाज में दुर्लभ है। वह रूसी समाज की सामन्ती पितृसत्तात्मक मूल्यों व नीतियों के बरक्स ताजिन्दगी महिलाओं की स्वतन्त्रता और अधिकारों को रूस के समाजवादी समाज में ही नहीं बल्कि विश्व के तमाम देशों में जहाँ भी वह गईं, स्थापित करने के लिए संघर्षरत रहीं।

सौ वर्ष पूर्व जार की सत्ता में रूसी समाज में स्त्रियाँ सामन्ती व पितृसत्तात्मक मानसिकता की शिकार थीं। अलेक्जेन्द्रा इस व्यवस्था को बदलने के लिए क्रान्ति के संघर्ष में शामिल हुईं, इस उम्मीद से कि समाजवाद में एक ऐसे समाज का निर्माण होगा जहाँ स्त्री-पुरुष मिलकर सामाजिक उत्पादन में मिलकर भागीदारी करेंगे। साथ ही घरेलू कामों में भी बराबर का बँटवारा होगा और औरत के श्रम को महत्व मिल सकेगा, ताकि समाज में महिलाओं को बराबरी व स्वतंत्रता मिले। रूस की जनता के संघर्षों व बलिदानों के परिणामस्वरूप 1917 में सम्पन्न हुई रूस की समाजवादी क्रान्ति से महिलाओं को कई अधिकार हासिल हुये। जिन पर पूरी दुनिया में उससे पहले कभी सोचा ही नहीं गया था। लेकिन इसके बावजूद इस समाज में भी स्त्री-पुरुष समानता पूरी तरह संभव नहीं हो पाई। इस विषय में अलेक्जेन्द्रा का मानना था कि स्त्री-पुरुष संबंधों में अतीत की परम्पराओं का भाव रहता है। जब तक पितृसत्तात्मक मानसिकता के भौतिक आधार को समाप्त नहीं किया जायेगा, तब तक स्त्रियों को समानता व स्वतन्त्रता नहीं मिल सकती।
(Alexandra Kollontai : A personality)

एक मार्क्सवादी चिन्तक होने के नाते वह नारी की मुक्ति को पूँजीवाद से मुक्ति के अभिन्न अंग के रूप में मानती थीं। कोलन्ताई का मानना था कि नारी और पुरुष नये समाजिक संबंधों और एक न्यायपूर्ण समाज के निर्माण में लगें। वह सोचती थीं कि रूस में चल रहे संघर्ष में समाजवाद की सीमाओं का विस्तार हो और नारियों के विशेष दल को उसमें शामिल किया जाय।

9 मार्च 1872 को जन्मी अलेक्जेन्द्रा कोलन्ताई अपनी बड़ी बहन जेनी से प्रभावित थीं जो कि रूस के शुरूआती विद्रोहियों में थीं। कोलान्ताई पर क्रान्तिकारी विचारों का प्रभाव महज ग्यारह वर्ष की उम्र में पड़ गया था और वह युद्घ और गरीबी को समझने का प्रयास करने लगी थीं। उन्नीसवीं सदी के सातवें दशक में रूस की नारियों ने कहानियाँ व उपन्यास लिखना शुरू किया। वे अपनी नैसर्गिक इच्छाओं को बचाये रखने के लिए लिखतीं। अलेक्जेन्द्रा ने इससे आगे जाकर समाज में मौजूद दोहरी नैतिकता पर प्रहार करने की हिमाकत की थी। अलेक्जेन्द्रा कार्ल माक्र्स के शुरूआती कामों से प्रभावित थी, जिन्होंने 1844 में लिखा था कि औरतों की दशा बुरी होने से सारे मानवीय सम्बन्धों की दशा बुरी हो जाती हैं। मानव समाज जिस पतनशील स्थिति में है वह स्त्री और पुरुष के बीच के संबंधों से अभिव्यक्त होता है।

1896 में महिलाओं का अन्तर्राष्ट्रीय समाजवादी आन्दोलन संभव लगने लगा था। क्योंकि जर्मनी की क्लारा जेटकिन और लिलि ब्रान ने मजदूरों के अन्तर्राष्ट्रीय सम्मेलन में नारियों और पुरुषों के समान वेतन की मांग उठाई और कहा कि संतानोत्पत्ति के बाद महिलाओं को काम पर लौट आने तक सरकारी सहायता मिलनी चाहिए। क्लारा जेटकिन का भी कहना था कि’‘नारियों की पूर्ण मुक्ति तभी संभव होगी जब श्रम की पूँजी से मुक्ति संभव होगी।” इसी दौर में अलेक्जेन्द्रा समाज की बेहतरी की खातिर घर से निकल पड़ी और क्रान्तिकारी आन्दोलन में शामिल होने के साथ-साथ महिलाओं को अपने अधिकारों को हासिल करने के लिए संगठित करती रहीं।

1904 में पूरे रूस में जार के खिलाफ आन्दोलन हो रहे थे। अधिकांश पुरुष युद्ध में झोंक दिए गये थे, महिलाएँ किसानी से घर चलाने में असमर्थ हो रहीं थीं। वे शहर में मजदूरी के लिए 18-18 घंटे काम करने को मजबूर थीं और मजदूरी न मिल पाने के कारण कईं महिलाएँ वेश्यावृत्ति को मजबूर थीं। अलेक्जेन्द्रा लिखती हैं कि इसी दौरान महिलाएँ अपनी भीरुता से उबरने लगी थीं और उनके संघर्ष भी आगे बढ़ रहे थे। 3 जून 1905 को मास्को के पास कपड़ा मिल में हड़ताल के दौरान 28 औरतों व बच्चों को बर्बरतापूर्वक मार दिया गया था। इस घटना से रूस की जनता में आक्रोश उत्पन्न हुआ। उत्पीड़कों के खिलाफ उपजे आक्रोश में शामिल होने के दौरान ही अलेक्जेन्द्रा ने क्रान्ति के प्रति समग्र समर्पण का निर्णय लिया। यह वह समय था जब रूसी कम्युनिस्ट पार्टी के पास महिलाओं के लिए कोई स्पष्ट कार्यक्रम नहीं था। साहित्य की कमी थी। उस दौर में क्रूप्सकाय की गैर कानूनी पुस्तिका’महिला मजदूर’ महत्वपूर्ण मानी गई लेकिन अधिकांश मजदूर अशिक्षित थे और जो साहित्य था वह केवल संगठनकर्ताओं के ही काम आ सकता था। उस दौरान अलेक्जेन्द्रा के भाषणों की पक्तियाँ यह थीं-‘‘विश्वास कीजिए, वह दिन दूर नहीं जब हम अपने पिता, पति और भाई की तरह इस देश के शासन में भागीदारी करेंगें। आज हमारे सामने मुख्य काम यह है कि हम अकेले न पड़ें, हमारे मन में जो भी प्रश्न व शंकाएं हैं, उन्हें एक-दूसरे से छिपायें न और मिलजुलकर उनका हल ढूँढें। हमारी एकता ही हमारी शक्ति है।”
(Alexandra Kollontai : A personality)

जर्मनी की समाजवादी नेत्री रोजा लक्जम्बर्ग और क्लारा जेटकिन से अलेक्जेन्द्रा प्रभावित थीं। महिलाओं के मताधिकार के लिए जर्मनी की पार्टी ने अन्तर्राष्ट्रीय समाजवादी महिला कांग्रेस की योजना बनाई थी, जिसका पहला मुद्दा महिलाओं के मताधिकार का था। इस कांग्रेस में रूस के प्रतिनिधि के तौर पर अलेक्जेन्द्रा ने शिरकत की। इसके बाद अलेक्जेन्द्रा ने महसूस किया कि जर्मनी व रूस के वातावरण में महिलाओं के सवाल पर भिन्नता है। महिलाओं के अलग संगठन बनाने की आवश्यक्ता भी उन्होंने इसी दौरान महसूस की। जब अलेक्जेन्द्रा महिलाओं के अलग संगठन की बात उठाने लगीं तो रूस की पार्टी में इस विचार को एक खतरनाक नारीवादी भटकाव माना गया और इसका विरोध किया गया। इसी समय  अलेक्जेन्द्रा की पुस्तक’नारी प्रश्न का सामाजिक आधार’ रूस में प्रकाशित हुई। निर्वासन के दौरान जर्मनी में रहते हुए अलेक्जेन्द्रा ने देखा कि जर्मनी की कम्युनिस्ट पार्टी महिला स्वतंत्रता तथा उसके व्यक्तिगत मुद्दों के प्रति रूस की अपेक्षा अधिक उदार थी। वह ऐजेंल्स और बेबेल के उन विचारों से सहमत नहीं थी कि सम्पत्ति संबधों से मुक्त होते ही मेहनतकश वर्ग बेहतर यौनिक संबंध विकसित कर लेगा और वेश्यावृत्ति तथा जीवन के दोहरेपन का अंत हो जायेगा। उन्होंने लेनिन के नैतिकता के अन्य विचारों को भी सवालों के घेरे में खड़ा किया।

1911 में अलेक्जेन्द्रा ने स्त्री-पुरुष सम्बन्धों के साथ-साथ आम महिलाओं और मजदूर महिलाओं के विषय पर अनेक लेख लिखे। 1913 में अपने नये निबन्ध ‘नई नारी’ में उन्होंने लिखा,’‘कठिन वास्तविकता का जितना ही कम सामान्यीकरण होगा, जितना ही समकालीन महिला के मनोविज्ञान का सच्चाई से चित्रण होगा, उसके सारे दुख: दर्दों के साथ, सारे संघर्ष, सारी समस्याएँ, सारे अंतर्विरोध, उसकी जटिलताएँ, उसकी लालसाएँ, उतनी ही समृद्ध होंगी सामग्री, जिससे हम नई नारी की आत्मिक छवि गढ़ पाएंगे”।  

क्रान्ति के बाद भी रूस में किसान के घर पर बेटा होने का जश्न मनाया जाता था, जबकि बेटी होने पर शोक ही होता था। वह सभा में नहीं बोल सकती थी, वह विरासत में कुछ पाने की अधिकारिणी नहीं थी। खेतों में पुरुषों की तरह मेहनत करती, लेकिन उसकी कोई सामाजिक हैसियत नहीं थी। उनको किसी प्रकार का आर्थिक मुआवजा भी नहीं मिलता था। एक कहावत के अनुसार’मुर्गी चिड़िया नहीं होती और औरत व्यक्ति नहीं’। रूस में कारखानों में काम करने वाली महिलाएँ बन्दी मानी जाती थीं और उनकी मजदूरी पुरुषों से आधी या दो तिहाई मानी जाती थी। उन्हें गर्भावस्था में भी काम करना पड़ता था। कभी-कभी काम करने के दौरान ही सन्तान का जन्म हो जाता था। बच्चों की हत्या कर देना या लावारिस छोड़ देना आम बात थी।
(Alexandra Kollontai : A personality)

रूसी क्रान्ति के बाद पार्टी के भीतर वैचारिक मतभेद तीव्र हो गये थे। किसी भी तरह के नारीवाद को गलत समझा जाने लगा। महिलाओं को अलग से संगठित करना सर्वहारा के लिए विभाजक माना जाने लगा। इस समय अलेक्जेन्द्रा को समाज कल्याण विभाग की जिम्मेदारी सौंपी गई थी। अलेक्जेन्द्रा का मत था कि महिलाओें को उनके अधिकार प्लेट में रखकर नहीं दिये जायेंगे, उन्हें अपने अधिकारों के लिए स्वयं संघर्ष करना पड़ेगा। अलेक्जेन्द्रा चाहती थीं कि कामगार महिलाएँ संघर्ष के लिए तैयार हों और जैसे ही युद्ध थमे, सोवियतें उनकी मांगों पर ध्यान दें। अपनी पुस्तक ‘कामगार महिला और माँ’ के माध्यम से उसने हर कामगार माँ को 16 हफ्ते का सवेतन अवकाश मिलने तथा बच्चों को दूध पिलाने के लिए महिलाओं को छुट्टी मिलने की वकालत की। कामगार महिलाओं के बच्चों की निगरानी और देखभाल के लिए ‘क्रेश’ की व्यवस्था की वकालत की।

1918 में उनके एक लेख में नारी की छवि थी- जो दिनभर दफ्तरों और कारखानों में काम करती और रात को बिना विवाह के ही अपने कमरे में जीवन से जूझती है- मुक्त, जुझारू, संयत और आत्मनिर्भर। पूँजीवाद द्वारा रची ऐसी स्त्री ने परिस्थितिवश पहले पूँजीवादी नैतिकता को चुनौती दी थी और बाद में नकार दिया। इस नई स्त्री को पता था कि वह अपना सामाजिक व्यक्तित्व भावना से नहीं काम से ही विकसित कर सकती थी। इस तरह वह अपने व्यक्तिगत संघर्ष को वर्ग संघर्ष से जोड़ने लगी। उसके लिए प्यार की अभिव्यक्ति में पुरुष की अधीनता संभव नहीं थी। वह पुरुष की छाया नहीं एक ‘सम्पूर्ण मानव नारी’ बनती जा रही थी।

अलेक्जेन्द्रा ने यूरोप के विभिन्न देशों की मजदूर माँओं को दी जाने वाली सहायता का अध्ययन किया। अपनी पुस्तक ‘समाज व मातृत्व’ में वह लिखती हैं, ‘‘हर माँ को यह विश्वास हो जाना चाहिए कि वह जैसे ही मातृत्व के प्राकृतिक दायित्व को पूरा कर समुदाय को एक नया सदस्य देती है, तब यह समुदाय का दायित्व हो जाता है कि वह माँ व बच्चे की प्यार से परवरिश करे।” माँ अपने मातृत्व का लाभ समुदाय के सभी बच्चों को दे और अपने बच्चे को वह ‘क्रैश’ को सौंपकर अपने काम पर लौट सकती है। उसको यह विश्वास होना चाहिए कि समुदाय बच्चे का प्यार से पालन-पोषण करेगा। इस पुस्तिका के तैयार होने पर अलेक्जेन्द्रा का भरोसा था कि मातृत्व के सम्बन्ध में इन विचारों से समाज का दृष्टिकोण बदलेगा। उन्होंने स्त्रियों के मुक्ति संघर्षों को न्यायोचित ठहराते हुए तर्क दिया कि बच्चों के लिए ‘क्रैश‘ और महिलाओं के लिए सामुदायिक लान्ड्री जैसे काम औरतों की पारिवारिक बोरियत को कम करने के लिए जरूरी ही नहीं हैं बल्कि उन्हें नारी मुक्ति के गंभीर मुद्दे से जोड़कर देखा जाना चाहिए।

16 नवम्बर 1918 को पूरे देश की महिलाओं के सम्मेलन में उन्होंने कहा कि महिलाओं को अपने बच्चों का पालन-पोषण करने के साथ अपने सामाजिक व्यक्तित्व को उठाने के लिए भी संघर्ष जारी रखना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि राज्य को प्रत्येक स्त्री की जिम्मेदारी लेनी चाहिए।
(Alexandra Kollontai : A personality)

रूस में क्रान्ति के बाद भड़के गृहयुद्ध के कारण महिलाओं की समस्याएँ बढ़ रहीं थी और महिलाएँ क्रान्ति की हिरावल बनकर आन्दोलनों को आगे बढ़ा रहीं थी। अलेक्जेन्द्रा महिलाओं के लिए कहती हैं कि जब तक महिलाओं के श्रम का सामूहिकरण नहीं होता, उन्हें काम का समान अधिकार नहीं मिल पायेगा और वे निजी परिवार की गृहस्थी के उन श्रमसाध्य झंझटों में फंसी रहेंगी, जिनका सामाजिक उत्पादन के क्षेत्र में कोई महत्व नहीं समझा जाता। ‘कम्युनिस्ट वीमन’ नामक अपने पर्चे में वह लिखती हैं, ‘‘जब तक महिलाओं के हालात बेहतर नहीं होते, तब तक देश की उत्पादकता बढ़ाने की बात निरर्थक होगी।” उन्होंने महिलाओं की विभिन्न प्रकार की समस्याओें को गहराई से समझने का प्रयास किया। विशेषकर रूस में बड़े पैमाने पर महिलाओं के वेश्यावृत्ति में शामिल होने की समस्या का हल करने पर उनका विचार था कि नई नैतिकता नई अर्थव्यवस्था से जन्म लेगी और नई अर्थव्यवस्था तब जन्म लेगी, जब पुरुष व नारी बराबरी के साथ काम करेंगे। उनका मत यह भी था कि दैनन्दिन जीवन की नई संस्कृति के लिए संघर्ष करने के लिए महिलाओं को पहल करनी होगी और इस प्रक्रिया में वे धीरे-धीरे समानता का एहसास करेंगी। राज्य के निर्माण में वह तभी भागीदारी कर सकती हैं, जब वह अज्ञान व रसोई की दासता से मुक्त हों।

रूस के पूर्वी भाग में जहाँ अधिसंख्यक मुस्लिम आबादी थी, महिलाएँ पर्दा करने को मजबूर थीं। 1921 के बसंत में जब इस क्षेत्र की 45 महिलाएँ मॉस्को आयीं तो उनका प्रमुख उद्देश्य था औरतों को बुर्का (परांजा) से निजात दिलवाना। इस क्षेत्र में जब महिलाएँ बिना परांजा के बाहर निकलने लगीं, नौकरी में जाने लगीं तो उन्हें पुरुषों का विरोध सहना पड़ा। उन पर उबलता पानी डाला जाता, कुत्ते छोड़ दिये जाते। एक 18 साल की उजबेक लड़की को कुएँ में फेंक दिया गया। एक औरत ने स्वीमिगं सूट पहन लिया तो उसके शरीर के टुकड़े-टुकड़े कर दिये गये। परिणामस्वरूप लड़कियों और औरतों ने पढ़ाई और नौकरी की खातिर घर छोड़ना शुरू कर दिया। इस सम्मेलन में महिलाओं ने कहा़, ‘हम तो खामोश गुलाम हैं, ‘‘हमें परांजा से निजात चाहिए।” इस तरह सभी महिलाओं ने अपनी समस्याओं को सबके सामने रखा।

‘महिलाओं का श्रम और अर्थव्यवस्था का विकास’ में उन्होंने आर्थिक उत्पादन व पारिवारिक पुनरुत्पादन (बच्चे का जन्म व पालन-पोषण) तथा नारी-पुरुष के बीच यौनिक संबंधों का विश्लेषण किया। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि घरेलू कार्यों में यंत्रों के इस्तेमाल से नारी-पुरुष के कामों के प्रति दृष्टिकोण में बदलाव आने लगेगा। औरतों की दासता की शुरूआत इसी से हुई थी। प्राथमिक उत्पादन श्रम पुरुष के हिस्से था और द्वितीयक घरेलू श्रम महिलाओं के सुपुर्द किया गया था। उनका यह विचार था कि घर में किये जाने वाले काम को मान्यता मिले, जैसे कि अन्य प्रकार के श्रम को, जैसे फैक्ट्रियों में काम को, प्राप्त है। इस तरह श्रम करने वाले परिवार के रूप में स्थित उपभोक्ता इकाई में नारी श्रम को भी वास्तव में महत्व मिलेगा, केवल शब्दों में नहीं।
(Alexandra Kollontai : A personality)

1917 में रूसी महिलाओं को वोट देने का अधिकार मिल गया। 1920 में रूस में भ्रूण हत्या को कानूनी रूप देने वाला बिल पास हो गया था। दुनिया में पहली बार स्त्री को गर्भधारण करने या न करने का अधिकार प्राप्त हो गया था।

बोल्शेविक क्रान्ति के बाद रूस में एक कानून बनाया गया, जिसमें विवाह के लिए एक सामान्य पंजीकरण अनिवार्य बना दिया गया, जिसमें नारियों को तलाक और तलाक के बाद भरण-पोषण का अधिकार था। 1922 के भूमि कानून के अनुसार परिवार की संपत्ति उसके हर पुरुष, नारी और बच्चों की मिलीजुली संपत्ति मानी गई। यह माना जा रहा था कि यह कानून बनाकर, पुरुषों को कानूनी व आर्थिक रूप से नारियों के प्रति और अधिक जिम्मेदार बनाकर, वैवाहिक संबंधों को और अधिक मजबूत बनाया जा सकता है। किन्तु अलेक्जेन्द्रा का मानना था कि यह कानून समाजवादी नहीं है और औरतों की बराबरी की बात नहीं करता। क्योंकि इसमें विवाह के महज आर्थिक आधार पर जोर दिया गया है और भरण-पोषण की पूरी बात अपेक्षतया धनी पुरुषों पर लागू हो सकती थी। उनका यह कहना था कि भरण-पोषण की पूरी विचारधारा इस पर निर्भर है कि नारी अपेक्षतया कमजोर है। भरण-पोषण की मांग करना अपमानजनक है। कोई भी न्यायाधीश उस व्यक्ति से भरण-पोषण दिला भी नहीं सकता जो दे पाने में असमर्थ हो। संबंध-विच्छेद के बाद पुरुष को स्त्री की आर्थिक जिम्मेदारी देना गलत है। औरत जिसने समाज की सेवा की है, उसे बच्चे दिये हैं, राजकीय सहायता पाने की हकदार है। वह इस पूरी व्यवस्था को समाप्त कर एक जनरल इश्योरेंस फण्ड स्थापित करने के पक्ष में थीं।

अपने एक लेख में वह लिखती हैं,’‘अकेले-अकेले हम तिनके हैं, जिसे हमारे मालिक जला सकते हैं, पर संगठित होकर हम एक ऐसी शक्ति बन सकते हैं, जिसे कोई नष्ट नहीं कर सकता’। वह महिलाओं से यह अपील भी करतीं,’‘पूरे अधिकार जीत लेना ही पर्याप्त नहीं है, हमें पुरुषों के बराबर ही अपनी अंतरात्मा को विकसित करना है।”

खुलकर अपने विचार रखने के कारण उन पर अनुशासन हीनता के आरोप भी लगे। अपने जीवन के बारे में उनके दो लेख एक ‘यौनिक संबंधों, और दूसरा’कम्युनिस्ट नैतिकता के बारे में’ उनका शोध प्रबन्ध और भाषण युवाओं में बहुत र्चिचत हुआ। उन्होंने अपने भाषणों में यह भी बताया कि कैसे उनकी पीढ़ी की स्त्रियों को ‘डाल्स हाउस’ की नायिका नोरा ने प्रभावित किया था, जब वह समानता के लिए संघर्ष में पति का घर छोड़कर चली जाती हैं। 1934 में अलेक्जेन्द्रा लीग ऑफ नेशन्स की सदस्य बनीं। उन्होंने नार्वे में रूस के राजदूत के बतौर भी अपनी भूमिका निभाई। ग्यारह भाषाओं का ज्ञान होने के कारण भी वह विश्व स्तर पर रूस का प्रतिनिधित्व करती थीं। अलेक्जेन्द्रा इतिहास के उन महान विचारकों में हैं, जिन्होंने स्त्री मुक्ति, रूसी क्रान्ति व समाज के पुनर्निर्माण पर अपने बेबाक विचारों को रखा। यह सच है कि यदि अलेक्जेन्द्रा किसी विकसित देश में पैदा हुईं होती तो उनके महिलाओं संबंधी विचार वास्तव में स्त्री-पुरुष समानता को व्यवहार में उतार पाते। यही नहीं, वह सिमोन द बोउआर की पूर्ववर्ती मानी जातीं। अलेक्जेन्द्रा के जीवन की विडम्बना यह रही कि रूस के पिछडे़ समाज में उनके विचारों को ठीक से समझा ही नहीं गया। यही नहीं, समाजवादी समाज में भी एक स्त्री होने के कारण उनके विचारों को कार्यान्वित करने में कोताही बरती गई।

1945 में अलेक्जेन्द्रा ने अपनी डायरी में लिखा,’‘लिखना जरूरी है अपने लिए ही नहीं, उन तमाम महिलाओं, अज्ञात महिलाओं के लिए, जो बाद में जियेंगी। वे जानेंगी कि हम कोई नायक और नायिकाएँ नहीं थे। बस यह था कि हम अपनी बातों में बहुत शिद्दत के साथ विश्वास करते थे। हम अपने लक्ष्यों पर विश्वास करते थे और पूरा करने में लगे रहते थे। ऐसा करने में हम कभी बहुत मजबूत होते थे, तो कभी बहुत कमजोर”।

8 मार्च 1952 को अपने अस्सीवें जन्मदिन के एक दिन पहले अलेक्जेन्द्रा ने इस दुनिया को अलविदा कह दिया। उन्होंने अपने दोस्तों को लिखा था-‘मैं इतिहास के जीवंत पृष्ठों को आत्मसात कर रहीं हूँ। संसार कभी रुकता नहीं। वह लगातार गतिमान है। जीवन के नए-नए रूप आते रहते हैं। मानवता द्वारा की गई यात्रा को देखना मुझे बहुत अच्छा लगता है। इसी तरह मनुष्य के सुंदर और आश्चर्यजनक भविष्य पर नज़र डालना भी अच्छा लगता है, जब मानवता अपने पंख फैलाकर कहेगी, आनंद, हर व्यक्ति के लिए आनंद।’
(Alexandra Kollontai : A personality)

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